इटली के पीडमॉन्ट इलाके में अल्बा की पहाड़ियों पर हर साल एक अक्टूबर को एक पुरानी परंपरा शुरू होती है। 'ट्रिफोलाऊ'

जब ट्रफल भी जलवायु परिवर्तन की चपेट में आ गए

इटली के पीडमॉन्ट इलाके में अल्बा की पहाड़ियों पर हर साल एक अक्टूबर को एक पुरानी परंपरा शुरू होती है। ‘ट्रिफोलाऊ’ कहे जाने वाले ट्रफल-शिकारी अपने प्रशिक्षित कुत्तों के साथ सुबह-सुबह जंगलों में उतरते हैं और ज़मीन के नीचे छिपे दुनिया के सबसे महँगे फफूंद की तलाश करते हैं। इस साल भी यह सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन शिकारियों के चेहरे पर पहले जैसी उम्मीद नहीं थी। उनके सामने ऐसी चुनौती खड़ी है जो ज़मीन के ऊपर से आई है, यानी जलवायु परिवर्तन।

अक्टूबर का पूरा महीना बारिश की कमी की भेंट चढ़ गया। इससे पहले जुलाई और अगस्त में तेज़ गर्मी पड़ चुकी थी। इटली के नेशनल सेंटर फॉर ट्रफल स्टडीज़ के अध्यक्ष एंटोनियो देजियाकोमी के मुताबिक़ इस मौसम की पैदावार कमज़ोर रही है और ट्रफलों की शेल्फ लाइफ भी कम निकली है। सूखी और सख़्त हो चुकी मिट्टी ने ट्रफलों का आकार भी छोटा कर दिया है। यह तब हो रहा है जब अल्बा और आसपास की लांगे पहाड़ियाँ अंतरराष्ट्रीय सफेद ट्रफल मेले के लिए सैलानियों का स्वागत कर रही हैं। दस अक्टूबर से छह दिसंबर तक चलने वाला यह मेला इटली के सबसे नामी खान-पान आयोजनों में गिना जाता है।

सफेद ट्रफल की कहानी समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि यह कोई साधारण उपज नहीं है। यह एक फफूंद है जिसे न खेत में बोया जा सकता है, न कारखाने में उगाया जा सकता है। यह ठंडी, नम मिट्टी में पेड़ों की जड़ों के साथ एक नाज़ुक रिश्ता बनाकर पनपता है। पेड़ फफूंद को शर्करा देता है और फफूंद पेड़ को पानी और खनिज। इस रिश्ते के लिए मिट्टी में नमी, एक ख़ास तापमान और सही किस्म के पेड़ चाहिए। इनमें से एक कड़ी भी टूटे तो पूरा तंत्र लड़खड़ा जाता है। यही वजह है कि सबसे सबसे प्रीमियम माना जाने वाला सफेद ट्रफल चार हज़ार यूरो यानी लगभग साढ़े चार हज़ार डॉलर प्रति किलो तक बिक जाता है, और यही वजह है कि उसकी पैदावार मौसम की हर करवट के प्रति इतनी संवेदनशील है।

यह संकट इटली तक सीमित नहीं है। एड्रियाटिक सागर के उस पार क्रोएशिया में भी ट्रफल-शिकारी और वैज्ञानिक कमोबेश यही चुनौतियाँ गिना रहे हैं। ज़ाग्रेब के बाहर ओक के जंगलों में काम करने वाले शिकारी पेटार आलेबिच बताते हैं कि पिछले सात-आठ सालों में हर साल पिछले साल से बदतर साबित हुआ है। सूखे की वजह से ट्रफल छोटे होते जा रहे हैं और उन्हें खोजना कठिन हो रहा है। उनका अनुमान है कि इस साल की फसल सामान्य से करीब तीस प्रतिशत कम है। आमदनी की भरपाई के लिए वे अब सैलानियों को ट्रफल-शिकार की सैर कराने लगे हैं। यानी जिस चीज़ से रोज़ी चलती थी, उसकी कमी ने पेशे का स्वरूप ही बदल दिया है।

क्रोएशिया के रुजेर बोस्कोविच इंस्टीट्यूट के कवक-विज्ञानी आर्मिन मेसिच का कहना है कि सूखा, बारिश की कमी और ऊँचा तापमान ट्रफलों की मात्रा और गुणवत्ता, दोनों पर गहरा असर डाल रहे हैं। उनके शब्दों में पैदावार घट रही है और वह भौगोलिक क्षेत्र भी सिकुड़ रहा है जहाँ सफेद ट्रफल उगते हैं। क्रोएशिया में ट्रफल की लगभग एक दर्जन प्रजातियाँ पाई जाती हैं, पर सबसे क़ीमती सफेद ट्रफल पर ही मार सबसे ज़्यादा है।

इसका यह मतलब नहीं कि सब हार मान चुके हैं। पीडमॉन्ट के विशेषज्ञ इस धारणा को ख़ारिज करते हैं कि सफेद ट्रफल का अंत तय है। शोधकर्ता ऐसे उपाय खोज रहे हैं जिनसे ट्रफल के आवास को बदलती परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा सके। इनमें जंगलों का बेहतर प्रबंधन और लंबे सूखे के दौरान प्रयोग के तौर पर सिंचाई शामिल है। वैज्ञानिक मिट्टी के सूक्ष्मजीवों की भूमिका को भी समझ रहे हैं और पेड़ों की ऐसी किस्में तलाश रहे हैं जो अधिक गर्म और शुष्क हालात को झेल सकें। यह आशा की किरण है, मगर यह भी याद दिलाती है कि जब किसी प्रकृति-निर्भर उपज को बचाने के लिए सिंचाई और प्रयोगशालाओं की ज़रूरत पड़ने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि संकट कितना गहरा है।

अब सवाल उठता है कि सुदूर यूरोप की इस ख़बर का हमसे क्या वास्ता। वास्ता गहरा है। ट्रफल एक चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ़ पिघलते ग्लेशियरों, बढ़ते समुद्र और भीषण तूफ़ानों के रूप में नहीं आता। वह चुपचाप उन नाज़ुक रिश्तों को तोड़ता है जिन पर किसी इलाके की खेती, खान-पान, संस्कृति और रोज़गार टिके होते हैं। भारत में भी ऐसे उदाहरण सामने हैं। दार्जिलिंग और उत्तर-पूर्व के चाय बागानों में पत्तियों की गुणवत्ता और स्वाद पर मौसम के बदलाव का असर चिंता का विषय बन चुका है। हिमाचल और कश्मीर के सेब बागानों में बर्फ़बारी और ठंड के घंटे घटने से फूल और फल का चक्र गड़बड़ा रहा है। कश्मीर का केसर बेमौसम सूखे और बारिश की मार झेलता रहा है। इन सबमें एक बात साझा है। ये उपज किसी ख़ास जगह की ख़ास जलवायु से जुड़ी हैं और उस जगह की पहचान भी हैं।

ट्रफल की तरह ही इनकी भी सबसे बड़ी ताक़त उनकी विशिष्टता है, और वही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी। जब तापमान कुछ डिग्री बढ़ता है या बारिश का समय कुछ हफ़्ते खिसकता है, तो पैदावार ही नहीं, पूरा बाज़ार, पूरा रोज़गार और पूरी सांस्कृतिक पहचान दाँव पर लग जाती है। अल्बा का ट्रफल मेला या दार्जिलिंग की चाय की चुस्की, दोनों ही उस भौगोलिक और जलवायु संयोग की देन हैं जो हमेशा के लिए गारंटीशुदा नहीं है।

इस ख़बर में एक और सबक छिपा है। ट्रफल की ज़िंदगी पेड़ों से जुड़ी है। ओक जैसे पुराने जंगल सिर्फ़ लकड़ी या छाया नहीं देते, वे मिट्टी के नीचे फफूंद, सूक्ष्मजीवों और जड़ों का पूरा संसार सँभालते हैं। जब हम जंगल की जगह केवल पौधारोपण से हरियाली गिनवाने लगते हैं, तो इस अदृश्य संसार को भूल जाते हैं। जलवायु अनुकूलन की कोई भी नीति यदि मिट्टी, नमी और स्थानीय पारिस्थितिकी की इस बुनियादी समझ से शुरू नहीं होगी, तो वह काग़ज़ों तक सिमटकर रह जाएगी।

यह भी साफ़ है कि अनुकूलन की कीमत हमेशा सबसे कमज़ोर को चुकानी पड़ती है। ट्रफल-शिकारी आलेबिच के पास कम से कम सैलानियों को सैर कराने का विकल्प है। लेकिन भारत के छोटे चाय उत्पादक, सेब और केसर के किसान, या मधुमक्खी पालक के पास ऐसे विकल्प सीमित हैं। उन्हें मौसम की जानकारी, फसल बीमा, बाज़ार तक पहुँच और स्थानीय स्तर पर शोध की मदद चाहिए। यूरोप में सिंचाई के प्रयोग और पेड़ों की नई किस्मों की खोज हो रही है। हमें भी अपने इलाकों के हिसाब से ऐसे शोध और उनके लाभ को किसानों तक पहुँचाने की व्यवस्था चाहिए।

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