जैव ईंधन : स्वच्छ ऊर्जा और आत्मनिर्भर भारत की नई राह।(10 अगस्त दिवस विशेष आलेख)

सुनील कुमार महला

हर वर्ष 10 अगस्त को विश्व जैव ईंधन दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों के विकल्प के रूप में जैव ईंधन के महत्व तथा स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस जैव ईंधन के विकास और उपयोग को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में प्रयासों को गति देने का संदेश देता है। जैव ईंधन ऐसे ईंधन हैं, जो पौधों, कृषि अवशेषों, जैविक कचरे और अन्य जैविक पदार्थों से तैयार किए जाते हैं। एथेनॉल, बायोडीजल, बायोगैस और बायो-सीएनजी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इनका महत्व इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि दुनिया लंबे समय से पेट्रोलियम, कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर रही है, जिनके अत्यधिक उपयोग से वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी पर्यावरणीय चुनौतियाँ बढ़ी हैं।

विश्व जैव ईंधन और इसका इतिहास:-

विश्व जैव ईंधन दिवस का संबंध जर्मन आविष्कारक सर रुडोल्फ डीजल से भी जोड़ा जाता है। वर्ष 1893 में उन्होंने वनस्पति तेल, विशेष रूप से मूंगफली के तेल से इंजन चलाने का प्रयोग किया था। उनके इस प्रयोग ने यह संभावना सामने रखी कि वनस्पति स्रोतों से प्राप्त तेल भविष्य में पारंपरिक ईंधनों के विकल्प के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं। भारत में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा 10 अगस्त 2015 से इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। 10 अगस्त 2015 को भारत में बायोडीजल के खुदरा मिश्रण की शुरुआत भी की गई थी। इसलिए यह दिवस केवल किसी ऐतिहासिक प्रयोग को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने, पर्यावरण संरक्षण, कृषि अवशेषों के बेहतर उपयोग, कचरा प्रबंधन और रोजगार सृजन की दिशा में जागरूकता पैदा करने का अवसर भी है।

जैव-ईंधन और एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम:-

भारत में जैव ईंधन के क्षेत्र में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम पर विशेष जोर दिया जा रहा है। गन्ने, मक्का और अन्य उपयुक्त कृषि उत्पादों तथा जैविक स्रोतों से एथेनॉल तैयार किया जाता है और इसे पेट्रोल में मिलाने से पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने तथा देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है। भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत औसत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल किया है। सरकार ने पहले इस लक्ष्य को वर्ष 2030 तक हासिल करने का लक्ष्य रखा था, जिसे बाद में इथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 तक आगे कर दिया गया। वास्तव में, यह उपलब्धि भारत के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और इससे किसानों, डिस्टिलरी उद्योग तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकता है।

जैव-ईंधन और संभावनाएं:-

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जैव ईंधन की संभावनाएँ बहुत अधिक हैं। हमारे देश में कृषि अवशेष, धान की पराली, गन्ने के अवशेष, मक्का, गोबर, खाद्य प्रसंस्करण से निकलने वाला जैविक कचरा और अन्य बायोमास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यदि इन पदार्थों को कचरा समझकर जलाने या फेंकने के बजाय वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीके से ऊर्जा के स्रोत के रूप में उपयोग किया जाए, तो इससे कचरा भी कम होगा, किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा और देश का घरेलू ऊर्जा स्रोत मजबूत होगा। गन्ने, मक्का और अन्य उपयुक्त जैविक स्रोतों से एथेनॉल, जबकि गोबर तथा अन्य जैविक कचरे से बायोगैस और बायो-सीएनजी तैयार की जा सकती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-बड़े उद्योगों और जैव ईंधन संयंत्रों के माध्यम से रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। साथ ही कृषि अवशेषों के उचित उपयोग से पराली जलाने जैसी समस्या को कम करने में भी सहायता मिल सकती है। इस दृष्टि से जैव ईंधन कृषि, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के बीच एक मजबूत सेतु बन सकता है। किसानों के लिए यह केवल फसल पैदा करने तक सीमित आय का माध्यम नहीं, बल्कि कृषि अवशेषों से अतिरिक्त आर्थिक मूल्य प्राप्त करने का अवसर भी बन सकता है।

पर्यावरण संरक्षण में जैव-ईंधन की भूमिका:-

जैव ईंधन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। टिकाऊ तरीके से उत्पादित जैव ईंधन जीवाश्म ईंधनों की तुलना में जीवन-चक्र के आधार पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में योगदान दे सकता है। साथ ही कृषि और जैविक कचरे का उपयोग ऊर्जा उत्पादन में होने से खुले में कचरा तथा कृषि अवशेष जलाने की आवश्यकता को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, जैव ईंधन को हर परिस्थिति में पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल मानना उचित नहीं होगा। यदि जैव ईंधन उत्पादन के लिए खाद्य फसलों, भूमि और जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जाए, तो इससे खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण, भूमि उपयोग और जैव विविधता से जुड़ी नई चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं। इसलिए खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण, भूमि उपयोग, जैव विविधता और जीवन-चक्र उत्सर्जन को ध्यान में रखते हुए टिकाऊ तरीके से जैव ईंधन का उत्पादन और उपयोग करना आवश्यक है।भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयातित पेट्रोलियम से पूरा करता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर उपलब्ध कृषि अवशेषों और अन्य जैविक संसाधनों से ऊर्जा तैयार करना ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। जैव ईंधन के बढ़ते उपयोग से पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और रोजगार के अवसर बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के माध्यम से कच्चे तेल के आयात में कमी, विदेशी मुद्रा की बचत और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी जैसे लाभ भी सामने आए हैं। इस प्रकार जैव ईंधन केवल ऊर्जा का वैकल्पिक स्रोत नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं से जुड़ा महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है।

निष्कर्ष:-

अंत में यह कहना उचित होगा कि जैव ईंधन केवल पेट्रोल और डीजल का विकल्प नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, किसान कल्याण, कचरा प्रबंधन, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाला महत्वपूर्ण माध्यम है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए इसकी संभावनाएँ और भी व्यापक हैं। आवश्यकता इस बात की है कि जैव ईंधन के उत्पादन में आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और टिकाऊ संसाधन प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए तथा कृषि अवशेषों और जैविक कचरे का अधिक से अधिक उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जाए। साथ ही खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और पर्यावरणीय संतुलन का भी ध्यान रखा जाए। इसलिए जैव ईंधन केवल वैकल्पिक ईंधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर, स्वच्छ, सुरक्षित और हरित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार।

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