सुरक्षित बिजली के रूप में  सौर ऊर्जा को बढ़ावा देते समय हम भूल जा रहे हैं कि आने वाले सालों में इसके संयत्रों से निकलने वाला कचरा सर दर्द बनेगा । अभी तक इसके कचरे के निबटारे के कोई भी वैश्विक उपाय नहीं खोजे जा सके । यह लेख इसी मसले पर हैं 

स्वच्छ ऊर्जा की खोज में कहीं भारी न पड़ जाए यह कचरा

पंकज चतुर्वेदी

सौर  ऊर्जा को लंबे समय से जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में एक अचूक और पूर्णतः स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जाता रहा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही दुनिया के लिए सूर्य की किरणों से बिजली बनाना एक जादुई समाधान की तरह उभरा। दुनिया भर की सरकारों ने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बड़े पैमाने पर सौर पार्कों और छतों पर सोलर पैनल लगाने की नीतियों को बढ़ावा दिया। भारत ने भी इस दिशा में असाधारण कदम उठाते हुए अपने अक्षय ऊर्जा लक्ष्यों को बहुत तेजी से आगे बढ़ाया है। परंतु जैसे-जैसे यह हरित क्रांति अपनी प्रौढ़ता की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसका एक अनदेखा, स्याह और खतरनाक पहलू भी सामने आने लगा है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की एक व्यापक रिपोर्ट ‘द डार्क साइड ऑफ सोलर पावर’ इस बात की ओर गंभीर इशारा करती है कि जिस सौर ऊर्जा को हम पर्यावरण के रक्षक के रूप में देख रहे हैं, वह भविष्य में कचरे के एक विशाल और जहरीले संकट में बदल सकती है।

सोलर पैनलों की इस समस्या का मूल कारण उनकी जीवन अवधि और उपभोक्ता व्यवहार में छुपा है। सामान्यतः माना जाता है कि एक सोलर पैनल लगभग पच्चीस से तीस वर्ष तक कुशलता से काम करता है। इस आधार पर प्रारंभिक अनुमानों में यह मान लिया गया था कि सौर कचरे का संकट इस सदी के मध्य यानी वर्ष 2050 के आसपास आएगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे तीव्र नवाचारों और लगातार गिरती कीमतों के कारण लोग अपने पुराने पैनलों को तीस साल पूरा होने से बहुत पहले ही बदल रहे हैं। नया और अधिक कुशल पैनल बाजार में आते ही आर्थिक रूप से सक्षम उपभोक्ता या बड़े सौर पार्क पुराने पैनलों को हटा देते हैं, क्योंकि नए पैनल कम जगह में कहीं अधिक बिजली पैदा करते हैं। इस असमय प्रतिस्थापन यानी प्री-मैच्योर रिप्लेसमेंट ने कचरे के आगमन की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि सोलर कचरे का जो सैलाब हम 2045 या 2050 में देखने की उम्मीद कर रहे थे, वह उम्मीद से कहीं पहले हमारे दरवाजों पर दस्तक दे चुका है। यदि इस रफ्तार पर अंकुश न लगाया गया, तो वर्ष 2050 तक दुनिया भर के लैंडफिल में छह करोड़ टन से अधिक फोटोवोल्टिक पैनलों का कचरा जमा हो जाएगा।

यह संकट केवल कचरे की भारी मात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि इस कचरे की रासायनिक प्रकृति इसे अत्यधिक डरावनी बनाती है। फोर्ब्स पत्रिका में प्रकाशित माइकल शेलनबर्गर के शोध बताते हैं कि सोलर पैनलों के निर्माण में सीसा, कैडमियम, एंटीमनी और क्रोमियम जैसी बेहद जहरीली भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है। जब इन पैनलों का जीवनकाल समाप्त हो जाता है और इन्हें बिना किसी वैज्ञानिक उपचार के खुले मैदानों या सामान्य लैंडफिल में फेंक दिया जाता है, तो समय के साथ वर्षा जल के प्रभाव से ये भारी धातुएं रिसकर मिट्टी में समा जाती हैं। वहां से ये जहरीले तत्व भूजल स्रोतों तक पहुंच जाते हैं, जो अंततः मानव आबादी के पेयजल और कृषि तंत्र को प्रदूषित करते हैं। कैडमियम और सीसा जैसी धातुएं इंसानी शरीर में पहुंचकर कैंसर, तंत्रिका तंत्र की बीमारियां और गुर्दे की विफलता जैसी जानलेवा समस्याओं का कारण बन सकती हैं। विज्ञान और नीति से जुड़ी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साइंस डायरेक्ट’ (एल्सेवियर) में प्रकाशित एक शोध पत्र भी इस बात की पुष्टि करता है कि फोटोवोल्टिक कचरे का अनियंत्रित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक खतरा पैदा कर रहा है और इसके प्रभावी पुनर्चक्रण के लिए वैज्ञानिक तंत्र विकसित करना अनिवार्य हो गया है।

भारत के संदर्भ में यह चुनौती और भी अधिक संवेदनशील और गंभीर हो जाती है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ (एनर्जी वर्ल्ड) की एक रिपोर्ट ‘द रिस्की साइड ऑफ सोलर एनर्जी’ के अनुसार, भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो सौर ऊर्जा का सबसे तेजी से विस्तार कर रहे हैं, लेकिन सौर कचरे के प्रबंधन के मामले में देश की तैयारी बेहद चिंताजनक है।  भारत ने सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तो निर्धारित कर लिए, लेकिन इन पैनलों के जीवन के अंत की योजना यानी ‘एंड-ऑफ-लाइफ’ नीति को तैयार करने में एक बड़ी चूक रह गई।  देश में वर्तमान में इस इलेक्ट्रॉनिक और सौर कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए कोई सख्त कानूनी ढांचा या देशव्यापी बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं है।  फर्स्टपोस्ट की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट चेतावनी देती है कि भारत में बिना किसी ठोस अपशिष्ट निपटान योजना के चल रहा यह सौर ऊर्जा कार्यक्रम देश की अनमोल जैव विविधता के लिए भारी नुकसानदेह साबित हो सकता है।  भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जहां विशाल सौर पार्क स्थापित किए जा रहे हैं, वहां अनुपयोगी पैनलों को खुले में छोड़ देने या अनौपचारिक कबाड़ बाजार के हवाले कर देने की पूरी संभावना है, जहां इन्हें असुरक्षित तरीके से तोड़ा-फोड़ा जाएगा जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो सकता है।

सोलर पैनलों के पुनर्चक्रण यानी रिसाइक्लिंग की राह में सबसे बड़ी बाधा वित्तीय व्यवहार्यता की कमी है। ग्रीनमैच जैसी वैश्विक संस्थाओं के अध्ययन बताते हैं कि सोलर पैनल की रिसाइक्लिंग की तकनीकें उपलब्ध हैं और उनसे मूल्यवान सामग्री जैसे सिलिकॉन, एल्युमीनियम और उच्च गुणवत्ता वाला कांच प्राप्त किया जा सकता है।  सिलिकॉन-आधारित पैनलों को विघटित करके लगभग पच्चीस प्रतिशत कांच और पचासी प्रतिशत सिलिकॉन को फिर से प्राप्त करना तकनीकी रूप से संभव है, जिससे नई सौर सेल निर्माण प्रक्रिया में कच्चे माल और ऊर्जा दोनों की भारी बचत हो सकती है।  परंतु इस तकनीकी संभावना के सामने अर्थशास्त्र की एक दीवार खड़ी है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में एक सोलर पैनल को रिसाइकिल करने की लागत बीस से तीस डॉलर के बीच आती है, जबकि उस पैनल से रिसाइकिल होने के बाद निकलने वाले माल की बाजार कीमत महज तीन से चार डॉलर होती है।  इस भारी आर्थिक नुकसान के कारण कोई भी निजी कंपनी या विनिर्माण इकाई स्वेच्छा से रिसाइक्लिंग के व्यवसाय में कदम नहीं रखना चाहती।  जब तक रिसाइक्लिंग की लागत कम नहीं होती या सरकारों द्वारा इस पर कोई सब्सिडी नहीं दी जाती, तब तक बाजार की ताकतें इन पैनलों को डंपिंग ग्राउंड में फेंकना ही सबसे सस्ता और आसान विकल्प मानेंगी।

इस वैश्विक पर्यावरणीय दुविधा से बाहर निकलने का रास्ता केवल कड़े नीतिगत हस्तक्षेप और उत्तरदायित्व के निर्धारण से ही निकल सकता है। ग्रीनमैच और अन्य अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, सरकारों को तुरंत ऐसे कानून बनाने होंगे जो सौर विनिर्माताओं के लिए ‘विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व’ यानी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी को अनिवार्य बनाएं, जैसा कि यूरोपीय संघ ने किया है।  इसका अर्थ यह है कि जो कंपनी सोलर पैनल बना रही है और बेच रही है, उसी की यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वह पच्चीस साल बाद या समय से पहले खराब होने पर उस पैनल को उपभोक्ता से वापस ले और उसका सुरक्षित पुनर्चक्रण सुनिश्चित करे।  इसके साथ ही, शोध और विकास में निवेश बढ़ाकर रिसाइक्लिंग की नई और सस्ती तकनीकों को खोजना होगा ताकि यह प्रक्रिया आर्थिक रूप से आकर्षक बन सके।  यदि हम आज इस समस्या की अनदेखी करते रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद रखेंगी जिसने एक प्रदूषण को मिटाने के चक्कर में उससे भी अधिक स्थायी और जहरीला कचरा धरती को सौंप दिया। स्वच्छ ऊर्जा की हमारी खोज तब तक वास्तव में स्वच्छ नहीं कहलाएगी जब तक कि उसका आदि से लेकर अंत तक का पूरा चक्र पर्यावरण के अनुकूल न हो। समय आ गया है कि हम सौर ऊर्जा के इस स्याह पक्ष को स्वीकार करें और समय रहते सुधारात्मक कदम उठाएं ताकि भविष्य की हरित क्रांति अपनी ही विफलता के मलबे के नीचे न दब जाए।

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