झेलम नदी इन दिनों घाटी और जम्मू में तबाही मचाए है । यह नदी  अभी कुछ हफ्ते पहले तक समय से पहले जल स्तर गिरने के लिए चिंता का कारण थी , अचानक इसके रौद्र रूप लेने का असल कारण कुदरती नहीं , मानवीय  दखल है । यह आलेख इसी मसले पर है । 

आखिर क्यों  बिगड़ैल हो जाती है झेलम?

पंकज चतुर्वेदी

जो नदी अभी कुछ हफ्तों  पहले तक सुस्त , उदास सी थी, अचानक पहली बरसात में ही इतनी उग्र हो गई कि अपने किनारों पर बीएसई शहर-गाँव के लिए तबाही बन गई । कश्मीर की वादी में जब झेलम शांत बहती है, तो ऐसा लगता है जैसे सदियों का सुकून उसकी लहरों में उतर आया हो। लेकिन मौसम का थोड़ा-सा मिजाज क्या बदलता है, सदियों से इंसानी सभ्यता को दुलारने वाली यह नदी अचानक विकराल रूप धारण कर लेती है। पानी का स्तर चढ़ते ही किनारे बसे शहरों और बस्तियों में चीख-पुकार मच जाती है। आसमान में बादल घिरते ही प्रशासन अलर्ट जारी करता है, स्कूल बंद कर दिए जाते हैं, कंट्रोल रूम सक्रिय हो जाते हैं और उपग्रहों से लेकर डॉपलर रडार तक सब चालू हो जाते हैं। तकनीकी मोर्चे पर हमारे पास हर सेकंड की खबर होती है, फिर भी पानी घरों, दुकानों और खेतों को लील लेता है। सवाल उठता है कि आखिर जिस नदी के किनारे पीढ़ियों से बस्तियां आबाद रहीं, वह अब जरा-सी बारिश में इतनी हिंसक क्यों हो जाती है?

झेलम नदी (वितस्ता) कश्मीर की प्रमुख बारहमासी नदी है। इसका उद्गम अनंतनाग जिले के वेरीनाग स्रोत से होता है। यह श्रीनगर से होकर बहती हुई पाकिस्तान में प्रवेश करती है और अंततः चिनाब नदी में मिल जाती है।इसका कड़वा सच किसी आसमानी आफत में नहीं, बल्कि इंसानी हवस और कागजी तरक्की के नीचे दबा हुआ है। सच यह है कि झेलम का कुदरती गुस्सा बाद में आता है, पहले इंसान का लालच नदी का गला घोंटता है। बीते कुछ दशकों में हमने जिस बेरहमी से झेलम, उसकी सहायक नदियों, नालों और आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स का दायरा समेटा है, उसने एक स्वाभाविक कुदरती तंत्र को तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। सौ साल पुराने राजस्व रिकॉर्ड गवाही देते हैं कि यह वादी एक वक्त में कैसे सांस लेती थी। नदियां चौड़े पाट में बहती थीं, कुदरती ड्रेनेज सिस्टम बिना रुकावट काम करता था, और जब भी भारी बारिश होती थी, तो आसपास के खुले मैदान और विशाल दलदली इलाके स्पंज की तरह उस अतिरिक्त पानी को खुद में सोख लेते थे। बारिश तब भी होती थी, लेकिन पूरे शहर जलमग्न नहीं होते थे, क्योंकि इंसान नदी के दायरे की इज्जत करना जानता था।

आज वह संतुलन पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। बढ़ती आबादी, बेतरतीब शहरीकरण और कानून के कमजोर डंडे का फायदा उठाकर हमने नदी के पेट में ही बस्तियां बसा दीं। बाउंड्री वॉल, पक्के मकान, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, सड़कें और दुकानें—सब कुछ नदी के बहाव क्षेत्र को निगल गए। श्रीनगर से लेकर वादी के तमाम छोटे-बड़े शहरों में हमने जिस विकास का ढिंढोरा पीटा, उसने झेलम के कुदरती निकास को ही बंद कर दिया। नदी को संकरा कर दिया गया, उसके किनारों पर शहर का कचरा और कंक्रीट का मलबा उड़ेल दिया गया। जो नाले और छोटी नदियां अतिरिक्त पानी को झेलम तक ले जाती थीं या उससे अलग होकर पानी का दबाव कम करती थीं, वे अनधिकृत निर्माणों के नीचे गायब हो गईं। जब कुदरती रास्ते ही बंद हो जाएंगे, तो बारिश का पानी बस्तियों में नहीं घुसेगा तो और कहां जाएगा?

 सारा दोष जलवायु परिवर्तन के सिर मढ़कर अपना पल्ला झाड़ लेना आसान है । बेशक ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण अब बेमौसम बारिश, बादल फटने और ग्लेशियर पिघलने की घटनाएं बढ़ी हैं। लेकिन सच यह है कि जलवायु परिवर्तन तो केवल आग में घी डालने का काम करता है, माचिस तो हमारी अपनी करतूतों ने जलाई है। जब हम नदी के कुदरती स्पंज यानी वेटलैंड्स को पाटकर कॉलोनियां काट देंगे, तो पानी को सोखने वाली जमीन ही नहीं बचेगी। फिर चाहे बारिश मध्यम ही क्यों न हो, संकरी हो चुकी नदी उस पानी को संभाल नहीं पाती और तबाही का मंजर सामने आ जाता है।

विडंबना देखिए कि आज हमारे पास अत्याधुनिक तकनीक है। उपग्रहों की तस्वीरें, जीआईएस मैपिंग और रियल-टाइम डेटा हमें समय रहते चेतावनी दे देते हैं। सरकारें सतर्कता बरतती हैं, लोगों को सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाती हैं—ये कदम यकीनन जानें बचाते हैं, लेकिन यह सिर्फ लक्षणों का इलाज है, बीमारी का नहीं। तकनीक आपको भागने का वक्त दे सकती है, लेकिन वह नदी की खोई हुई जलधारण क्षमता वापस नहीं ला सकती। जब तक नदी को उसका दायरा वापस नहीं मिलेगा, तब तक हर चेतावनी सिर्फ आने वाली तबाही का कैलेंडर भर बनकर रह जाएगी।

जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय ने कई बार जल निकायों से अवैध कब्जे हटाने के सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत का साफ रुख रहा है कि जनहित और पारिस्थितिकी की सुरक्षा से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वोट बैंक, प्रशासनिक ढिलाई और व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते इन आदेशों की फाइलें धूल फांकती रहती हैं। जब कोई व्यक्ति अपने फायदे के लिए नदी के किनारे दीवार खड़ी करता है या नाले में मलबा फेंकता है, तो उसे लगता है कि उसने छोटी सी जमीन हासिल कर ली। लेकिन जब ऐसे हजारों छोटे-छोटे अपराध आपस में मिलते हैं, तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। यह धारणा ही आत्मघाती है कि नदी का गला घोंटकर किया गया निर्माण ही ‘विकास’ है। असल में यह विकास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए तबाही का अग्रिम भुगतान है।

इस पूरे तंत्र की विफलता का आर्थिक और सामाजिक मूल्य बेहद भयानक है। हर बाढ़ के बाद सड़कें टूटती हैं, पुल बह जाते हैं, फसलें बर्बाद होती हैं और लोगों की जीवन भर की कमाई एक झटके में डूब जाती है। पर्यटन ठप पड़ जाता है और पुनर्निर्माण पर सरकार को अरबों रुपये बहाने पड़ते हैं। यह पूरी कवायद उस लागत से कहीं ज्यादा महंगी पड़ती है, जो हमें नदी के अतिक्रमण हटाने और उसके संरक्षण पर खर्च करनी चाहिए। इसके अलावा, इस अंधाधुंध तबाही में स्थानीय जैव विविधता का जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई तो किसी कीमत पर मुमकिन नहीं है। प्रवासी पक्षियों के ठिकाने छीन चुके हैं और नदियों का पानी गंदा होने से जलीय जीवन दम तोड़ रहा है।

अगर इस वादी को बचाना है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि झेलम कोई केवल पानी का जरिया नहीं, बल्कि इस पूरी सभ्यता की जीवनरेखा है। दुनिया भर के तमाम देशों ने अपनी गलतियों से सीखा है। यूरोप और कई अन्य हिस्सों में नदियों के कुदरती बहाव को दोबारा बहाल किया गया है, अतिक्रमण हटाकर वहां पार्क और बफर जोन बनाए गए हैं। कश्मीर को भी इसी मॉडल पर काम करना होगा। कड़े कानूनों का पालन, ड्रोन और जीआईएस के जरिए नई अवैध निर्माण गतिविधियों पर तत्काल रोक, और सबसे बढ़कर, जो बस्तियां नदी का रास्ता रोके खड़ी हैं, उन्हें पारदर्शी और मानवीय तरीके से स्थानांतरित करना ही एकमात्र स्थायी समाधान है।

झेलम को किसी एहसान की जरूरत नहीं है; उसे बस अपनी वही जगह वापस चाहिए जो कुदरत ने उसे दी थी। हम चेतावनी दर चेतावनी जारी करके आपदा प्रबंधन का ढोंग तो कर सकते हैं, लेकिन जब तक नदी के सीने से इंसानी लालच का बोझ नहीं हटेगा, तब तक थोड़ी सी बारिश भी इस वादी के लिए मातम का पैगाम लाती रहेगी। वक्त आ गया है कि हम तय करें कि हमें कंक्रीट के मुर्दा शहर चाहिए या फिर अपनी जीवनदायिनी झेलम की आजाद रवानी।

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