ओडिशा के कोरापुट जिले के बाल्डा गांव के दुकानदार रघुनाथ खारा जब अपने अंगूठे का निशान एक सरकारी कागज़ पर देखकर चौंके, तो उनके पास कहने को बस एक बात थी।

पवित्र पहाड़ और फर्जी अंगूठे: बाल्डा की लड़ाई

यह कहानी सिर्फ एक दुकानदार की नहीं है। यह उन सैकड़ों आदिवासियों की कहानी है, जिनके जंगल, पहाड़ और देवी-देवताओं के स्थान अब अडानी समूह की कंपनी कलिंगा एल्युमिना लिमिटेड की प्रस्तावित खदान के नीचे आने वाले हैं। करीब 2.4 करोड़ डॉलर की इस परियोजना में बाल्डा पहाड़ी का बड़ा हिस्सा लिया जाना है, जो आसपास के कम से कम दस गांवों के लिए पवित्र है। इसके जंगल, घास के मैदान और गुफाएं उनकी आस्था का हिस्सा हैं। खनन के लिए करीब 157 हेक्टेयर वन भूमि उजाड़ी जानी है।

भारतीय कानून की मंशा साफ है कि आदिवासियों की पारंपरिक ज़मीन किसी और काम के लिए तभी ली जा सकती है जब ग्राम सभा सहमति दे। प्रस्ताव तभी वैध माना जाता है जब गांव के कम से कम आधे वयस्क लिखित रूप से उसके पक्ष में हों, और बैठक की सूचना दो हफ्ते पहले दी जानी चाहिए।

सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक 9 अक्टूबर 2025 को बाल्डा और बन्नूर की ग्राम सभाओं में सभी 580 वयस्कों ने ज़मीन देने पर सहमति दी। पर दोनों गांवों के निर्वाचित मुखिया कहते हैं कि इन बैठकों में कोई हस्ताक्षर लिए ही नहीं गए और उन्होंने इन्हें अवैध बताया है। ग्रामीणों की खींची तस्वीरों में दोनों बैठकों में मिलाकर करीब सौ लोग दिखते हैं, जो कोरम से बहुत कम हैं। सूचनाएं भी बैठक से एक दिन पहले चिपकाई गईं, जबकि उन पर तारीख सितंबर के अंत की थी।

अल जज़ीरा की पड़ताल में जो ब्योरे मिले, वे हैरान करते हैं। रामा हंतल कई साल से लकवाग्रस्त हैं और बोल नहीं सकते, फिर भी दस्तावेज़ में उनके ओड़िया हस्ताक्षर हैं। गुरुबारी खारा नाम की तीन महिलाओं के अंगूठे दर्ज हैं, जिनमें से एक की मृत्यु बैठक से आठ महीने पहले हो चुकी थी। उनका बेटा पूछता है कि मरी हुई मां की मौजूदगी कैसे दर्ज हो गई। बन्नूर में कम से कम तीन मृतकों के अंगूठे सहमति में गिने गए। नकुल अलंग की मां चार साल पहले गुज़र चुकी हैं, पर क्रम संख्या 108 पर उनका नाम है, और नकुल का नाम भी दर्ज है, जबकि वे उस दिन विशाखापत्तनम में मज़दूरी कर रहे थे। अल जज़ीरा बीस से ज़्यादा लोगों से मिला, पर कम से कम 67 हस्ताक्षरकर्ताओं का पता नहीं लगा पाया।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि दस्तखत शायद किसी और बहाने से लिए गए। बन्नूर के किसान सुनाधर मुदुली ने प्रस्ताव का दसवां पन्ना देखा तो उसमें तेरह नाम एक ही हाथ से लिखे थे और उनके आगे अंगूठों की कतार थी। वह उनकी अपनी लिखावट थी। उनके अनुसार राजस्व कार्यालय के संविदा कर्मचारी रामनाथ पुंगी ने दिसंबर में आकर कहा था कि पारंपरिक ज़मीन को सरकारी मान्यता दिलाने के लिए नाम लिखने हैं। सबको बुलाने की ज़रूरत नहीं, दस्तखत वे खुद कर सकते हैं। दोनों ने बारी-बारी से अंगूठे लगाए। जून में मुदुली ने देखा कि वही पन्ना खनन की सहमति में जोड़ दिया गया है। पुंगी ने भी माना कि उसे हर गांव से दस्तावेज़ जुटाने के तीन हज़ार रुपये मिले थे और उसे नहीं पता था कि इनका इस्तेमाल अडानी की परियोजना में होगा। उसने कहा कि वह खुद खनन के खिलाफ है। इलाके में ज़मीन के पट्टों के वादे आम हैं, इसलिए ऐसे कागज़ पर दस्तखत मांगना किसी को खटकता नहीं। जो बैठक में गए, उन्हें सड़क, नौकरी और स्कूल के सपने दिखाए गए, और माधव कुंतिली जैसे जिसने जंगल के बदले दस्तखत से मना किया, उससे कागज़ ही छीन लिया गया।

प्रक्रिया की जल्दबाज़ी भी सवाल खड़े करती है। फरवरी 2023 में सरकार ने अडानी एंटरप्राइजेज़ को पसंदीदा बोलीदाता घोषित किया और विरोध तभी शुरू हो गया। मार्च 2025 की जन सुनवाई में ग्रामीणों ने भारी संख्या में खनन का विरोध किया, फिर भी कुछ ही महीनों में पर्यावरण मंजूरी मिल गई। आसपास के समुदायों ने करीब 2,500 हेक्टेयर वन भूमि पर अधिकार के दावे किए थे, जिनका बड़ा हिस्सा खनन क्षेत्र से टकराता था। जनवरी में ग्राम सभाओं को बताए बिना दावे निपटा दिए गए, पूरे खनन क्षेत्र को बाहर रखा गया और ग्रामीणों के अनुसार दो अपील समितियों ने उन्हें अपील का वक्त दिए बिना तीन दिन में फैसला बहाल कर दिया।

बैठकों के तुरंत बाद ग्रामीणों ने दोबारा बैठक की मांग की थी, फिर भी 15 अक्टूबर को ये प्रस्ताव आधिकारिक फाइल में जोड़ दिए गए। अब तक पचास से ज़्यादा लोग शपथ पत्र देकर कह चुके हैं कि उनके दस्तखत जाली हैं। उन्होंने अदालत, प्रशासन और पुलिस के पास शिकायतें की हैं और जांच मांगी है। मार्च में दस प्रभावित गांवों ने पुराने प्रस्तावों को खारिज कर विरोध दोहराया। मई में उनके प्रतिनिधि अजय मुदुली अदालत पहुंचे, पर तब तक देर हो चुकी थी। 7 मई को कंपनी को सारी मंजूरियां मिल गईं और रिफाइनरी के साथ पचास साल की लीज़ पर वन भूमि सौंप दी गई, बिना किसी मुआवज़े के वादे के।

अडानी समूह, कोरापुट के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने अल जज़ीरा के सवालों का जवाब नहीं दिया। जब तक उनका पक्ष सामने नहीं आता, ये आरोप ही हैं, पर इनके साथ जो नाम, तारीखें और शपथ पत्र हैं, वे इन्हें टालने लायक नहीं छोड़ते। और यह अकेला मामला नहीं है। वासर कॉलेज की अर्पिता कोडिवेरी चेताती हैं कि सहमति के प्रावधान को दरकिनार करना कई जगह अवैध प्रशासनिक चलन बनता जा रहा है। लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच ने 2003 से अब तक सहमति से जुड़े कम से कम 28 विवाद दर्ज किए हैं। सीएजी की 2024 की रिपोर्ट में 136 उल्लंघन मिले, जिनमें 73 में ग्राम सभा की बैठक ही नहीं हुई। 2023 में सिजीमाली में वेदांता की खदान के लिए भी ऐसी ही फर्जी सहमति के आरोप लगे, और वहां के विरोध अप्रैल में हिंसा तक पहुंचे, जिसमें सत्तर लोग घायल हुए।

सर्वोच्च न्यायालय की वकील शोमोना खन्ना के अनुसार, अगर ग्राम सभा ने सहमति दी ही नहीं, तो वन मंजूरी अवैध है और उसे रद्द किया जाना चाहिए। वे याद दिलाती हैं कि वनवासी को उसके वन अधिकार से वंचित करना कानून में अपराध है, जिसे अत्याचार कहा गया है। यानी सवाल सिर्फ विकास बनाम पर्यावरण का नहीं, कानून के पालन का भी है।

बाल्डा के लिए जंगल सिर्फ रोज़ी नहीं, आस्था का घर है। यहां छोटे मंदिर, मूर्तियां और पवित्र गुफाएं हैं। 70 वर्षीय पुजारी रघुनाथ हंथल कहते हैं कि जंगल उनके लिए सब कुछ है, उनकी माता यहीं रहती हैं। उनका नाम भी सहमति की सूची में क्रम संख्या 171 पर दर्ज है, जबकि वे उस दिन धरने पर थे। ग्रामीणों को डर है कि खनन से धान को सींचने वाली धाराएं सूख जाएंगी और फल, फूल, छाल, जलावन व औषधियां देने वाला जंगल उजड़ जाएगा।

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