डॉ. स्वप्निल व्यास
पर्यावरणविद, लेखक एवं प्राध्यापक इंदौर
तेजी से बढ़ते शहरीकरण, कंक्रीट के फैलते जंगल, घटते हरित क्षेत्र और प्रदूषित होते जलस्रोतों के बीच आज महानगरों को विकास की ऐसी अवधारणा अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें प्रकृति को केवल सजावट का माध्यम नहीं, बल्कि शहरी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना जाए। शहरों में सड़कों, फ्लाईओवरों, आवासीय परिसरों और व्यावसायिक भवनों का विस्तार हो रहा है, लेकिन इनके बीच मिट्टी, जल, हरियाली और जैव विविधता के संरक्षण को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है। ऐसे समय में बायो-फेंसिंग अर्थात जैविक बाड़बंदी को महानगरों की पर्यावरण संरक्षण नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
बायो-फेंसिंग एक ऐसी प्राकृतिक व्यवस्था है, जिसमें लोहे की जाली, तारों अथवा कंक्रीट की दीवारों के स्थान पर उपयुक्त पौधों, घास, झाड़ियों और देशी वृक्षों की सहायता से जीवित सुरक्षा सीमा विकसित की जाती है। यह केवल किसी क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करने की एक उपयोगी तकनीक है। उचित योजना के साथ विकसित जैविक बाड़ मिट्टी के कटाव को कम करने, पक्षियों और छोटे जीवों को आश्रय देने, धूल के कुछ कणों को रोकने तथा संवेदनशील हरित क्षेत्रों को अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप से बचाने में सहायता कर सकती है।
आज देश के अनेक महानगर जल संकट, वायु प्रदूषण, बढ़ते तापमान, घटती जैव विविधता और वर्षाजल के अनियंत्रित बहाव जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। कंक्रीट और डामर से ढकी भूमि वर्षाजल को मिट्टी में समाने का अवसर कम कर देती है। दूसरी ओर, प्राकृतिक जलमार्गों और जलग्रहण क्षेत्रों में बाधाएं आने से वर्षाजल का प्रबंधन कठिन होता है। ऐसे में शहरों के विकास की योजनाओं में बायो-फेंसिंग को शामिल करना पर्यावरणीय सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
महानगरों के तालाब, झीलें, नदियां और आर्द्रभूमियां केवल जल संग्रहण के स्थान नहीं हैं। वे भूजल पुनर्भरण, स्थानीय तापमान के संतुलन, जैव विविधता और वर्षाजल प्रबंधन की महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रणालियां हैं। इनके किनारों पर उपयुक्त देशी वनस्पतियों की पट्टियां विकसित करने से मिट्टी के कटाव को कम करने, कुछ प्रदूषकों को जलस्रोतों तक पहुंचने से पहले रोकने और पक्षियों सहित अन्य जीवों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में मदद मिल सकती है। इसलिए जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन की परियोजनाओं में बायो-फेंसिंग को एक महत्वपूर्ण सहायक उपाय के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।
इसी प्रकार शहरों के पार्कों, सार्वजनिक उद्यानों, सड़क किनारे उपलब्ध उपयुक्त भूमि, औद्योगिक क्षेत्रों, विद्यालयों, महाविद्यालयों और सरकारी परिसरों में भी जैविक बाड़ विकसित की जा सकती है। इससे हरित क्षेत्रों की सुरक्षा के साथ-साथ देशी वनस्पतियों को बढ़ावा मिलेगा। आवासीय कॉलोनियों और बड़े निर्माण परिसरों में भी जहां परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां कंक्रीट की दीवारों के साथ या उनके विकल्प के रूप में हरित सुरक्षा पट्टियां विकसित की जा सकती हैं। इससे शहरों में हरियाली का विस्तार होगा और प्रकृति से जुड़ाव बढ़ेगा।
बायो-फेंसिंग को प्रभावी बनाने के लिए केवल पौधरोपण पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक महानगर की जलवायु, मिट्टी, उपलब्ध भूमि और स्थानीय जैव विविधता के अनुरूप पौधों का चयन करना होगा। नीम, करंज, करौंदा, अर्जुन, जामुन और स्थानीय घासों जैसी प्रजातियां कुछ परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन उनका चयन स्थान की जरूरतों के अनुसार वैज्ञानिक सलाह से किया जाना चाहिए। जलस्रोतों के किनारे ऐसी प्रजातियां लगाई जाएं, जो वहां के जलस्तर और मौसमी परिस्थितियों के अनुकूल हों। साथ ही प्राकृतिक जलप्रवाह, बाढ़ के मार्ग और सार्वजनिक आवागमन बाधित नहीं होने चाहिए।
इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों तथा पर्यावरण संबंधी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। शहरी विकास की नई परियोजनाओं, जलस्रोतों के पुनर्जीवन और सार्वजनिक हरित क्षेत्रों के निर्माण में बायो-फेंसिंग के लिए उपयुक्त प्रावधान किए जा सकते हैं। जहां यह तकनीकी और पर्यावरणीय दृष्टि से उपयोगी हो, वहां इसे निर्माण स्वीकृति, हरित क्षेत्र प्रबंधन और पर्यावरणीय कार्ययोजनाओं से जोड़ा जा सकता है। पुराने शहरों में भी उपलब्ध भूमि और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार चरणबद्ध तरीके से इसे अपनाया जा सकता है। इसके साथ पौधों की देखभाल, नियमित निगरानी और जीवित रहने की दर सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा।
नागरिकों, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी इस अभियान को व्यापक बना सकती है। यदि प्रत्येक शहर अपने तालाबों, हरित क्षेत्रों और संवेदनशील प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण को सामूहिक जिम्मेदारी माने, तो जैविक बाड़बंदी केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित पर्यावरण आंदोलन बन सकती है।
वास्तव में, महानगरों का भविष्य केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक परिवहन व्यवस्था से तय नहीं होगा। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वहां स्वच्छ हवा, सुरक्षित जलस्रोत, जीवंत हरित क्षेत्र और जैव विविधता कितनी बची हुई है। विकास की योजनाओं में कंक्रीट की दीवारों के साथ प्रकृति की जीवित दीवारों को भी स्थान देना समय की आवश्यकता है।
यदि बायो-फेंसिंग को वैज्ञानिक योजना, प्रभावी नीतियों और नागरिक सहभागिता के साथ महानगरों की पर्यावरणीय व्यवस्था का अनिवार्य अंग बनाया जाए, तो यह जलस्रोतों की सुरक्षा, हरित क्षेत्रों के संरक्षण और शहरी पारिस्थितिकी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। प्रकृति की रक्षा के लिए बनाई गई यह जीवित दीवार आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुरक्षित, हरित और संतुलित शहरों की आधारशिला बन सकती है।