यह लेख नागालेंड में अमूर बाज के लिए एक इलाके को सायलेंट जॉन घोषित करने के शानदार पहल पर है , किस तरह एक विदेशी पक्षी हामरे पर्यावरण की रक्षा करता है और उसका आगमन जरूरी है , इस बात को समझने के बाद स्थानीय समाज ही अब इस पहल पर अमल करता है ।

मेहमान परिंदों के लिए खामोशी का पहरा

अमूर बाज बाज परिवार का छोटा-सा पक्षी है। इसके पंखों का फैलाव 63 से 71 सेंटीमीटर और वजन लगभग 120 ग्राम होता है, यानी हथेली में समा जाने लायक। फिर भी यह दुनिया में सबसे लंबी यात्रा करने वाले शिकारी पक्षियों में गिना जाता है। हर साल यह साइबेरिया और उत्तरी चीन के प्रजनन क्षेत्रों से उड़ान भरकर दक्षिणी अफ्रीका के शीतकालीन ठिकानों तक पहुंचता है, जो लगभग 22 हजार किलोमीटर की महायात्रा है। नर का रंग गहरा भूरा-स्लेटी होता है, जबकि मादा और किशोर पक्षी अलग रंग के दिखते हैं। आंखों के चारों ओर नारंगी घेरा इसकी खास पहचान है। यह बहुत सामाजिक पक्षी है और इतने बड़े झुंडों में चलता है कि दूर से आसमान में बादल उमड़ने का भ्रम होता है।

इस सफर में भारत, और खासकर नगालैंड, निर्णायक पड़ाव है। अक्तूबर-नवंबर में लाखों अमूर बाज यहां से गुजरते हैं। वे कुछ हफ्ते रुककर लंबी उड़ान की थकान उतारते हैं और अरब सागर के ऊपर बिना रुके होने वाली अगली लंबी उड़ान के लिए ताकत जुटाते हैं। वोखा जिले में दोयांग जलाशय के आसपास का इलाका इनके सबसे बड़े सालाना जमावड़े के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इसी वजह से नगालैंड को दुनिया की फाल्कन राजधानी कहा जाने लगा है। इन परिंदों की मौजूदगी बताती है कि यहां के जंगल, जलाशय और घास के मैदान अब भी जीवन को सहारा देने लायक बचे हैं।

इस साल की तैयारी पर नजर डालें तो डोयांग वन्यजीव प्रभाग ने बुधवार को फिर साफ किया कि वन्य पशुओं और पक्षियों का शिकार करना, उन्हें फंदे में फंसाना और उनका व्यापार करना सख्त मना है। आदेश वोखा, मोकोकचुंग और जुन्हेबोटो जिलों पर लागू है। अमूर बाज वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित प्रजाति है। अधिनियम की धारा 9 और 51 के तहत इन्हें मारने, फंसाने या बेचने पर सात साल तक की सजा, 25 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। वन्यजीव वार्डन ने चेतावनी दी है कि उल्लंघन करने वाले किसी व्यक्ति या समूह पर कानूनी कार्रवाई होगी। भारत प्रवासी प्रजातियों पर कन्वेंशन (सीएमएस) का हस्ताक्षरकर्ता भी है, इसलिए यह जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय भी है।

कानून के साथ कुछ अनोखे इंतजाम भी हुए हैं। पांगती में बसेरा स्थल के तीन किलोमीटर के दायरे को प्रवास के मौसम में अस्थायी मौन क्षेत्र घोषित किया गया है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि तेज आवाजें जंगली पक्षियों में भय पैदा करती हैं। वे अपना ठिकाना छोड़ सकते हैं, और उनके बीच होने वाला जरूरी संवाद भी बाधित होता है। जिस परिंदे को अगले ही दिन समंदर पार करना हो, उसके लिए डर में उड़ जाना जानलेवा हो सकता है। इसलिए पटाखे, लाउडस्पीकर और ऊंची आवाज वाले आयोजन ऐसे इलाकों में रोके जाते हैं।

सबसे असरदार कदम शायद वह है, जो समाज की नब्ज को छूता है। आदेश में चेतावनी दोहराई गई है कि शिकार या नुकसान पहुंचाने में शामिल गांवों को मिलने वाले सरकारी अनुदानों की समीक्षा होगी और उन्हें रोका भी जा सकता है। यानी एक के किए की जवाबदेही पूरे गांव की होगी। इन इलाकों में एयर गन पर भी पाबंदी है, जो यहां लगभग हर घर में मिल जाती है। जिला प्रशासन ने नागरिकों, समुदायों और आगंतुकों से अपील की है कि वे इस अनूठी पारिस्थितिक घटना को बचाने में सहयोग करें और नगालैंड की वैश्विक प्रतिष्ठा बनाए रखें।

इस सहयोग की जड़ें एक कड़वे अतीत में हैं। साल 2012 में नगालैंड में कुछ ही दिनों के भीतर हजारों अमूर बाज मार डाले गए। स्थानीय लोग भोजन के लिए पेड़ों पर जाल लगाकर इन्हें फंसाते थे। उस साल आबादी पर गंभीर संकट आ गया। बताया जाता है कि अफ्रीका में इन बाजों का पसंदीदा भोजन दीमक है, और जब बाज मारे गए तो पांगती के आसपास दीमकों ने खूब नुकसान किया। यह एक जीव के गायब होने से पूरी खाद्य श्रृंखला के डगमगाने की सीख थी।

तभी दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार में इसकी खबर छपी। पर्यावरण पर लिखने वाली नेहा सिन्हा पांगती पहुंचीं और ग्रामीणों से कहा कि ये पक्षी आपके मेहमान हैं, जो खेती को नुकसान पहुंचाने वाले कीट खाकर आपकी मदद करते हैं। उन्होंने राजनेताओं, धर्मगुरुओं और शिक्षकों को साथ जोड़ा, और लोगों को समझाया कि दुनिया में घटती इस प्रजाति को देखने पर्यटक आएंगे और इससे उनकी आमदनी बढ़ेगी। बात असर कर गई। अगले साल वहां एक भी पक्षी का शिकार नहीं हुआ। जहां कल तक फंदे लगते थे, वहां अब इंतजार होता है। लोग अब भी इन परिंदों की शूटिंग करते हैं, पर बंदूक से नहीं, कैमरे से।

बदलाव अब स्कूलों तक पहुंच चुका है। नगालैंड के कई स्कूलों में अमूर बाज को बचाने के लिए क्लब बन गए हैं, जहां बच्चे अपने गांव के मेहमानों की उड़ान और उनके महत्व के बारे में सीखते हैं। इसी कड़ी में मणिपुर के तामेंगलोंग जिले में हर साल अमूर फाल्कन महोत्सव आयोजित होता है, जो इन पक्षियों को सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में मनाता है। शिकार के मैदान को दुनिया के सबसे बड़े पक्षी संरक्षण स्थलों में बदल देना सामुदायिक संरक्षण की चमकदार मिसाल है।

फिर भी चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। हर साल सख्त आदेश दोहराने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि निगरानी ढीली पड़ी तो पुरानी आदतें लौट सकती हैं। पर्यटन बढ़ेगा तो भीड़ और शोर का दबाव भी बढ़ेगा, और संरक्षण की सफलता का बोझ उसी जगह पर पड़ेगा जिसे बचाना है। जलवायु परिवर्तन से प्रवास के रास्ते और मौसम बदल रहे हैं, जिनका असर इन परिंदों के ठहराव पर पड़ सकता है। सबसे जरूरी यह है कि जो ग्रामीण शिकार छोड़ चुके हैं, उन्हें संरक्षण से ठोस और स्थायी आर्थिक लाभ मिलता रहे, वरना उनका भरोसा टूट सकता है।

फिर भी पांगती का अनुभव एक बड़ी बात कहता है। संरक्षण कानून की धाराओं से शुरू जरूर होता है, पर टिकता तभी है जब समाज उसे अपना बना ले। जिस गांव ने कभी जाल बिछाए थे, वही आज परिंदों के लिए खामोशी बुनता है। इस बार भी जब आसमान में बादल-सा झुंड उतरेगा, तो वह सिर्फ पक्षियों का नहीं, एक समाज के बदले हुए मन का भी उत्सव होगा।

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