गंगा की सूखती असंख्य धाराएं
पंकज चतुर्वेदी
भारतीय उपमहाद्वीप के भू-पारिस्थितिकी और जनजीवन की नियंता रही गंगा नदी का अस्तित्व आज एक अभूतपूर्व और अदृश्य संकट के दौर से गुजर रहा है। यह संकट केवल मुख्य नदी के जल स्तर के घटने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस विशाल और जटिल जलतंत्र की आंतरिक संरचना से जुड़ा है जो सदियों से इस नदी को जीवन देता आया है। आईआईटी धनबाद (आईआईटी-आईएसएम) के पर्यावरण विज्ञान इंजीनियरिंग विभाग के एक नवीनतम और व्यापक शोध ने इस कड़वी हकीकत को वैज्ञानिक प्रामाणिकता के साथ देश के सामने रखा है। इस अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि पिछले 50 वर्षों के भीतर गंगा नदी बेसिन की करीब 18 लाख छोटी जलधाराएं (स्ट्रीम्स) पूरी तरह से विलीन हो चुकी हैं। डराने वाली बात यह है कि हम हर दिन औसतन 99 प्राकृतिक जलधाराओं को स्थायी रूप से खो रहे हैं। जलविज्ञान के नजरिए से देखें तो यह केवल पानी की कुछ बूंदों का कम होना नहीं है, बल्कि गंगा के उस वृक्षाकार जालतंत्र (डेंड्रिटिक ड्रेनेज पैटर्न) का धीरे-धीरे ध्वस्त होना है, जो इसके जलग्रहण क्षेत्रों की सेहत तय करता था। यह शोध झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठारी व मैदानी इलाकों में फैली सात छोटी नदियों और उनके 56 वाटरशेड्स के गहन विश्लेषण पर आधारित है, जो अंततः गंगा के महाप्रवाह का हिस्सा बनती हैं।
इस संकट की गहनता को समझने के लिए बुंदेलखंड और मध्य भारत के पठारी तंत्र का उदाहरण देखना जरूरी है। इस शोध में शामिल जिन सात प्रमुख छोटी नदियों की शिनाख्त की गई है, उनमें बुंदेलखंड अंचल की जीवनरेखा मानी जाने वाली यमुना की सहायक नदियां—खुदार, उर्मिल और बोदला (जो केन व बेतवा की उप-सहायक धाराएं हैं) प्रमुख हैं। इसके अलावा झारखंड और मगध क्षेत्र की कतरी, खुदिया, बांकी और दानरो जैसी नदियां भी इस अध्ययन का मुख्य केंद्र हैं, जो क्रमशः दामोदर, सोन और उत्तरी कोयल के माध्यम से गंगा व हुगली तंत्र को पोषित करती हैं। बुंदेलखंड जैसे पहले से ही जल-तनाव (वॉटर स्ट्रेस) से जूझ रहे इलाके में खुदार, उर्मिल और बोदला जैसी नदियों के वाटरशेड्स का सिकुड़ना बेहद चिंताजनक है। इन नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में हुए बदलावों का सीधा असर केन और बेतवा के प्रवाह पर पड़ रहा है, और अंततः यह कमी गंगा की मुख्य धारा तक पहुंच रही है। यह वैज्ञानिक सच है कि किसी भी बड़ी नदी की अविरलता उसकी मुख्य धारा से नहीं, बल्कि उसकी इन सूक्ष्म शिराओं से तय होती है। जब ये शिराएं ही सूख जाएंगी, तो मुख्य नदी का सूखना अपरिहार्य हो जाता है। आंकड़ों के आईने में देखें तो पहले देश के कुल भूभाग का लगभग 9 से 10 प्रतिशत हिस्सा ‘रिवर बेसिन’ के प्राकृतिक जलग्रहण प्रभाव में आता था, जो अब घटकर महज 0.5 से 3 प्रतिशत के संकुचित दायरे में सिमट गया है।
शोध के अनुसार, जल-निकास घनत्व (ड्रेनेज डेंसिटी) में आई इस भारी गिरावट के पीछे अनियोजित और अंधाधुंध भूमि उपयोग, बुनियादी ढांचे का अनियंत्रित निर्माण, कोयला-खनिज खनन और नदियों के सीने को छलनी करता अवैध रेत खनन सबसे प्रमुख वजहें हैं। लेकिन इसके साथ ही एक और घातक पहलू इन जलधाराओं के ठीक किनारे (रिपेरियन ज़ोन) पर होने वाला अंधाधुंध कृषि विस्तार और रासायनिक खेती है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों और किनारों की ज़मीन पर कब्ज़ा करके वहां व्यावसायिक खेती की जा रही है। इस खेती में उपयोग होने वाले कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक (जैसे यूरिया और फॉस्फेट) सीधे इन सूक्ष्म जलधाराओं में घुलकर पानी को जहरीला बना रहे हैं। यह रासायनिक प्रदूषण पानी में ऑक्सीजन के स्तर को कम करके उसके प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मार रहा है। इतना ही नहीं, किनारों पर वनस्पतियों और प्राकृतिक घास-झाड़ियों को साफ करके की जाने वाली इस खेती के कारण मिट्टी की पकड़ बेहद कमजोर हो गई है। इसके परिणामस्वरूप भारी मानसून के दौरान तीव्र गति से भूमि कटाव (सॉइल इरोजन) हो रहा है। मिट्टी कटकर इन छोटी नदियों के तल में जमा हो रही है, जिससे उनकी गहराई खत्म हो गई है और गाद (सिल्टेशन) भरने से जलधाराओं का दम घुट रहा है।
इस भू-आकृतिक नुकसान और अनियंत्रित इंसानी गतिविधियों के बीच जब जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव जुड़ते हैं, तो यह संकट कई गुना गहरा हो जाता है। वाटरशेड्स के वृक्षाकार जालतंत्र की बनावट बिगड़ने के कारण पहाड़ों और पठारी ढलानों पर पानी के ठहरने और ज़मीन के भीतर रिसने के प्राकृतिक रास्ते पूरी तरह बंद हो गए हैं। यही वजह है कि वैश्विक तापमान और जलवायु असंतुलन के चलते अब मानसून के दौरान पानी का समान वितरण होने के बजाय कम समय में अत्यधिक बारिश हो जाती है। यह पानी रुकने के बजाय तीव्र वेग से मिट्टी का कटाव करते हुए बह जाता है, जिससे मैदानी इलाकों में अचानक बाढ़, पहाड़ों में भूस्खलन और अचानक बादल फटने जैसी अप्रत्याशित आपदाओं में तेजी आई है। इसके विपरीत, गैर-मानसूनी महीनों में इन जलधाराओं में पानी की एक बूंद न होने के कारण आसपास की मिट्टी की नमी पूरी तरह खत्म हो रही है, जिससे तेजी से मरुस्थलीकरण (डेजर्टिफिकेशन) का खतरा बढ़ रहा है। जलधाराओं के लुप्त होने और भूमि कटाव का सीधा खामियाजा भूजल स्रोतों को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि ये धाराएं ही भूजल को रिचार्ज करने का मुख्य जरिया थीं। अब भूजल स्तर के पाताल में जाने और सतह पर नदियों के सूखने का एक ऐसा दुष्चक्र बन चुका है, जो सीधे तौर पर देश की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने लगा है।
समय रहते यदि इस गंभीर स्थिति को नहीं बदला गया, तो ‘नमामि गंगे’ जैसी महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय योजनाएं भी अपने पूर्ण उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकेंगी। आईआईटी धनबाद के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक नीतिगत और साहसिक नीतिगत हस्तक्षेप का सुझाव दिया है। उनका मानना है कि जैसे औद्योगिक और ढांचागत परियोजनाओं के लिए सरकारें बड़े पैमाने पर भूमि का अधिग्रहण करती हैं, ठीक उसी तरह अब वक्त आ गया है जब नदियों के प्राकृतिक स्वरूप, उनके रिपेरियन ज़ोन और पुराने प्रवाह मार्गों (राइट ऑफ वे) को पुनर्जीवित करने के लिए ‘नदी भूमि अधिग्रहण’ की नीति अपनाई जाए। नदियों के किनारों पर रासायनिक खेती को पूर्णतः प्रतिबंधित कर वहां केवल प्राकृतिक वानिकी को बढ़ावा देना होगा ताकि भूमि का कटाव रुक सके। केंद्र सरकार के पास वर्तमान में नदी बेसिनों के इस सूक्ष्म नुकसान का कोई एकीकृत राष्ट्रीय डेटा उपलब्ध नहीं है। इसलिए, जल जीवन मिशन और नमामि गंगे जैसी योजनाओं में नीतिगत संशोधन कर इन छोटी जलधाराओं के रासायनिक प्रदूषण और कटाव से संरक्षण को बुनियादी शर्त बनाना होगा। इसके साथ ही, नदियों के सिकुड़ने की दर, उनकी लंबाई और प्रवाह घनत्व के आधार पर एक ‘नदी लाल सूची’ (रेड लिस्ट फॉर रिवर्स) तैयार करना बेहद जरूरी है, ताकि बुंदेलखंड से लेकर छोटानागपुर तक की गंभीर रूप से संकटग्रस्त नदियों को प्राथमिकता के आधार पर बचाया जा सके। एक समर्पित ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की स्थापना इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है, जो उपग्रह आंकड़ों और जमीनी हकीकत के जरिए इन 18 लाख खोई हुई कड़ियों को दोबारा ढूंढने और उन्हें पुनर्जीवित करने का वैज्ञानिक ब्लूप्रिंट तैयार करे।