उत्तराखंड का हिमालय…

अजय सहाय

उत्तराखंड का हिमालय आज जलवायु परिवर्तन, पीछे हटते हिमनदों, बढ़ती हिमनदीय झीलों, अत्यधिक वर्षा, बादल फटने, भूस्खलन और मलबा-प्रवाह जैसे कई खतरों का एक साथ सामना कर रहा है। भविष्य में किसी अस्थिर हिमनदीय झील से अचानक भारी मात्रा में पानी निकलने—अर्थात हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ (GLOF)—या ऊपरी हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र से अचानक जल-मलबा प्रवाह आने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह कहना सही नहीं होगा कि किसी निश्चित दिन या “कल” ही उत्तराखंड में ग्लेशियर फटने वाला है। आम बोलचाल में इसे “ग्लेशियर फटना” या “वॉटर बम” कहा जाता है, जबकि वास्तविक आपदा हिमनदीय झील के टूटने, चट्टान-बर्फ के ढहने, अत्यधिक वर्षा, हिम-पिघलाव, भूस्खलन अथवा इन कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न हो सकती है।

केदारनाथ 2013, चमोली 2021 और धराली 2025 जैसी घटनाएँ हिमालय के अलग-अलग प्रकार के खतरों की गंभीर चेतावनी हैं। इनका संदेश स्पष्ट है—पानी, बर्फ, चट्टान और मलबे का अचानक प्रवाह कुछ ही मिनटों में घाटी की बस्तियों, बाजारों, सड़कों, पुलों, स्कूलों, होटलों और दूसरी सार्वजनिक परिसंपत्तियों के लिए विनाशकारी बन सकता है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि “अगला जलप्रलय कब आएगा?” बल्कि प्रश्न यह है— “यदि उत्तराखंड में किसी हिमनदीय झील, हिमनद क्षेत्र या ऊपरी जलग्रहण से अचानक विनाशकारी जल-मलबा प्रवाह आया, तो क्या हम लोगों को समय रहते अलार्म देकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचा पाएँगे?”

1. हिमनदीय झीलों पर लगातार निगरानी

इसरो के उपग्रह अध्ययन में भारतीय हिमालय की हिमनदीय झीलों में महत्वपूर्ण बदलाव सामने आए हैं। 1984 से 2023 के बीच लगातार देखी गई 676 हिमनदीय झीलों में 89 प्रतिशत से अधिक का विस्तार दर्ज किया गया।

उत्तराखंड में भी संवेदनशील हिमनदीय झीलों की निगरानी की जा रही है। अब उच्च जोखिम वाली झीलों पर उपग्रह + ड्रोन + स्वचालित कैमरा + जलस्तर सेंसर + मौसम केंद्र को एकीकृत करने की जरूरत है।

2. अंतरिक्ष से खतरे की पहचान

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी अंतरिक्ष तकनीक है। इसरो की 2025–26 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में एक हेक्टेयर या उससे बड़ी 2,024 हिमनदीय झीलों की 2025 के मानसून महीनों में निगरानी की गई।

अब लक्ष्य होना चाहिए— “उपग्रह पर खतरा दिखाई देने से लेकर घाटी में सायरन बजने तक का समय न्यूनतम हो।”

3. वर्षा से नदी तक स्वचालित अलार्म

हर अत्यधिक संवेदनशील हिमालयी घाटी में स्वचालित वर्षामापी, नदी जलस्तर सेंसर, मलबा-प्रवाह सेंसर, कैमरा और सायरन का नेटवर्क होना चाहिए।

ऊपरी जलग्रहण में असामान्य वर्षा अथवा नदी-नाले के जलस्तर में अचानक वृद्धि दर्ज होते ही सूचना नियंत्रण कक्ष तक पहुँचे। खतरे की निर्धारित सीमा पार होने पर चेतावनी मोबाइल + सायरन + स्थानीय आपदा दल तक स्वतः पहुँचनी चाहिए।

4. मोबाइल अलार्म के बाद निकासी का रास्ता

NDMA का SACHET और Cell Broadcast जैसी प्रणालियाँ भू-लक्षित चेतावनी लोगों तक पहुँचाने की क्षमता देती हैं। लेकिन मोबाइल पर अलार्म मिलने के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होगा—लोग जाएँगे कहाँ?

हर गाँव, होटल, स्कूल, बाजार और पर्यटन स्थल पर सरल आपदा निकासी मानचित्र होना चाहिए। कम-से-कम दो वैकल्पिक निकासी मार्ग पहले से चिन्हित हों तथा रात में दिखाई देने वाले संकेतक लगाए जाएँ।

आपदा के समय रास्ता खोजने का समय नहीं होता; रास्ता पहले से लोगों की स्मृति में होना चाहिए।

5. ऊँचाई पर स्थायी ‘हिमालय आपदा-आश्रय केंद्र’

संवेदनशील घाटियों के पास वैज्ञानिक जोखिम अध्ययन के आधार पर सुरक्षित ऊँचे स्थानों पर स्थायी हिमालय आपदा-आश्रय केंद्र बनाए जाने चाहिए।

इनमें कम-से-कम शुरुआती 72 घंटे के लिए पेयजल और सूखा भोजन, प्राथमिक उपचार, आवश्यक चिकित्सा सामग्री, कंबल, सौर ऊर्जा, बैटरी बैकअप, रेडियो/सैटेलाइट संचार, टॉर्च, रस्सियाँ, हेलमेट, लाइफ जैकेट, स्ट्रेचर और खोज-बचाव उपकरण उपलब्ध हों।

लेकिन केवल ऊँचाई सुरक्षा की गारंटी नहीं है। केंद्र नदी-बाढ़, पहाड़ी नाले, पुराने मलबा-पंख, भूस्खलन, चट्टान गिरने और हिमस्खलन मार्ग से भी बाहर होना चाहिए।

6. हर संवेदनशील गाँव में ‘हिमालय वॉरियर’

जलप्रलय के शुरुआती मिनटों में NDRF या SDRF का हर स्थान पर पहुँचना संभव नहीं होगा। इसलिए स्थानीय समुदाय को प्रथम प्रतिक्रिया की क्षमता देनी होगी।

हर संवेदनशील गाँव और पर्यटन क्षेत्र में स्थानीय युवाओं का प्रशिक्षित “हिमालय वॉरियर” दल बनाया जा सकता है। उन्हें प्राथमिक उपचार, रस्सी बचाव, सायरन संचालन, वायरलेस संचार, पर्यटक निकासी तथा बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने का प्रशिक्षण मिले।

आधुनिक तकनीक + स्थानीय अनुभव = हिमालय की मजबूत सुरक्षा।

7. स्कूल, बाजार, होटल और कॉलोनी कहाँ बनें—जोखिम मानचित्र तय करे

पुराने बाढ़ क्षेत्र, सक्रिय नदी-तल, पहाड़ी नालों के मुहाने, पुराने मलबा-पंख और अस्थिर ढलानों पर महत्वपूर्ण सार्वजनिक परिसंपत्तियाँ बनाने से बचना होगा।

स्कूल, अस्पताल, बाजार, होटल और प्रशासनिक भवन बनाने से पहले बाढ़ + भूस्खलन + भूकंप + मलबा-प्रवाह + हिमस्खलन का संयुक्त स्थल-विशेष जोखिम अध्ययन होना चाहिए।

केवल नदी से एक निश्चित दूरी या ऊँचाई निर्धारित कर देना पर्याप्त नहीं है।

“गलत स्थान पर मजबूत भवन बनाने से बेहतर है सही स्थान पर आपदा-रोधी भवन बनाना।”

8. तकनीक के साथ नियमित मॉक ड्रिल

करोड़ों रुपये के सेंसर और चेतावनी उपकरण भी तब अधूरे हैं जब सायरन सुनकर लोगों को यह पता ही न हो कि उन्हें क्या करना है।

हिमालयी राज्यों में जापान की तरह स्कूलों, गाँवों, बाजारों, होटलों और पर्यटन स्थलों पर नियमित आपदा प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल होनी चाहिए।

बच्चों को स्कूल स्तर से सिखाया जाए कि अचानक नदी बढ़ने, मलबा आने या सायरन बजने पर किस दिशा में जाना है।

होटल में आने वाले पर्यटक को कमरे की चाबी के साथ आपदा निकासी मानचित्र भी दिया जाना चाहिए।

9. पर्यटक और स्थानीय लोग ‘आपातकालीन किट’ लेकर निकलें

उत्तराखंड सहित संवेदनशील हिमालयी राज्यों में यात्रा करने वाले पर्यटकों और जोखिम वाले क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय लोगों को व्यक्तिगत आपातकालीन किट तैयार रखने की आदत विकसित करनी होगी।

विशेष रूप से दूरस्थ घाटियों, ट्रेकिंग मार्गों, हिमनद क्षेत्रों और अत्यधिक संवेदनशील पर्यटन स्थलों में प्रशासन न्यूनतम आपातकालीन सुरक्षा-किट को यात्रा नियमों से जोड़ने पर विचार कर सकता है।

आपातकालीन किट में प्रमुख रूप से— पेयजल, 24–72 घंटे का हल्का सूखा भोजन, प्राथमिक उपचार सामग्री, आवश्यक व्यक्तिगत दवाएँ, टॉर्च, सीटी, पावर बैंक, गर्म कपड़े, आपात थर्मल कंबल, वर्षा से बचाव की सामग्री, पहचान-पत्र की सुरक्षित प्रति और स्थानीय आपात संपर्क जानकारी होनी चाहिए।

स्थानीय परिवारों के घर में हमेशा एक तैयार “ग्रैब-एंड-गो आपदा बैग” होना चाहिए, जिसे चेतावनी मिलते ही उठाकर तुरंत निकला जा सके।

होटल, होम-स्टे, बस अड्डे, टैक्सी स्टैंड, ट्रेकिंग प्रवेश केंद्र और तीर्थयात्रा पंजीकरण केंद्र पर भी आपातकालीन किट और निकासी मार्ग की जानकारी उपलब्ध हो।

“अलार्म बजने के बाद सामान इकट्ठा नहीं करना है—किट पहले से तैयार रखनी है और तुरंत सुरक्षित स्थान की ओर निकलना है।”

भविष्य का मॉडल—’अलार्म से आश्रय तक’

उत्तराखंड ही नहीं, पूरे हिमालय के लिए एक एकीकृत सुरक्षा श्रृंखला विकसित करनी होगी—

उपग्रह → हिमनदीय झील/हिमनद → वर्षा व जलस्तर सेंसर → नियंत्रण कक्ष → मोबाइल/सायरन अलार्म → आपातकालीन किट → हिमालय वॉरियर → निकासी मार्ग → सुरक्षित ऊँचा आपदा-आश्रय केंद्र

भारत आज 2013 की तुलना में कहीं अधिक सक्षम है। हमारे पास उपग्रह निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, बाढ़ पूर्वानुमान, SACHET, Cell Broadcast, NDRF-SDRF और सामुदायिक आपदा प्रबंधन कार्यक्रम जैसी महत्वपूर्ण क्षमताएँ हैं।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हमारी कोई तैयारी नहीं है। लेकिन असली परीक्षा तकनीक की संख्या नहीं, बल्कि अंतिम गाँव, अंतिम परिवार और अंतिम पर्यटक तक समय पर चेतावनी पहुँचाकर उसकी जान बचाने की क्षमता है।

हिमालय किसी घटना की तारीख बताकर चेतावनी नहीं देगा।

“वॉटर बम को हमेशा रोक पाना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन खतरे को पहचानना, समय पर अलार्म बजाना, आपातकालीन किट तैयार रखना, लोगों को प्रशिक्षित करना और उन्हें सुरक्षित आश्रय तक पहुँचाना हमारे हाथ में है।”

संकल्प—”आपदा आने का इंतजार नहीं, आपदा से पहले तैयारी।”

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