पंकज चतुर्वेदी
देश में एक अजीब विरोधाभास खुलकर सामने आया है। केंद्र सरकार की खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने एनालॉग पनीर को कभी गैरकानूनी नहीं ठहराया, बल्कि उसे बनाने और बेचने की छूट दी, बस इतनी शर्त रखी कि पैकेट पर साफ-साफ लिखा हो कि यह असली दूध से नहीं बना है। इसके बावजूद महाराष्ट्र, गुजरात के बाद अब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने इस पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है, जबकि दूसरे सबसे बड़े दूध उत्पादक राज्य राजस्थान में इसके निर्माण और बिक्री पर आज भी कोई रोक नहीं है। यही उलझन अब उपभोक्ताओं से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की चिंता का विषय बन गई है।
एनालॉग पनीर देखने, स्वाद और बनावट में बिल्कुल असली दूध के पनीर जैसा लगता है, लेकिन इसे बनाने में दूध की चर्बी या दूध के प्रोटीन की जगह वनस्पति तेल, स्टार्च, सोया या मटर के प्रोटीन और चिपकाने वाले पदार्थ इस्तेमाल किए जाते हैं। कहीं-कहीं तो सोडा और वनस्पति घी से नकली दूध और फ्रेंच चॉक यानी सेलखड़ी से नकली मावा तक तैयार किया जा रहा है। इसकी लागत असली पनीर से कहीं कम आती है, इसलिए होटल, ढाबों, रेस्तरां और खानपान के बड़े कारोबार में इसका खुलकर इस्तेमाल हो रहा है। समस्या तब पैदा होती है जब इसे उसी कीमत पर, बिना किसी सूचना के, असली दूध के पनीर के नाम पर बेचा जाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते आए हैं कि इस तरह के उत्पादों में मिलने वाली औद्योगिक चर्बी हृदय रोग का खतरा बढ़ाती है और इससे शरीर को कोई पोषण संबंधी लाभ नहीं मिलता। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि इस तरह की औद्योगिक चर्बी का कोई ज्ञात स्वास्थ्य लाभ नहीं है। इसके नियमित सेवन से पेट में संक्रमण, अम्लता, यकृत पर बुरा असर और खराब वसा का स्तर बढ़ने जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। साथ ही इसमें असली दूध के मुकाबले प्रोटीन और कैल्शियम कम, जबकि सोडियम और शोधित स्टार्च की मात्रा ज्यादा होती है, जिससे उपभोक्ता कीमत तो दूध के पनीर जितनी चुकाता है, लेकिन पोषण उतना नहीं पाता।
केंद्र सरकार का रुख शुरू से ही सतर्क रहा है। उसने इसे पूरी तरह हानिकारक मानने से इनकार किया है, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इसके उत्पादन पर कभी रोक नहीं लगाई गई। महाराष्ट्र की पहल के बाद केंद्रीय प्राधिकरण ने एक परिपत्र जरूर जारी किया, जिसमें होटलों को अपने भोजन-सूची में यह बताना अनिवार्य किया गया कि इस्तेमाल हो रहा पनीर असली है या एनालॉग। लेकिन व्यवहार में यह नियम बाजार में बहुत कम ही लागू होता दिखा, क्योंकि खुले बाजार में बिना किसी सूचना के यह उत्पाद खपता रहा।
यही वजह रही कि कई राज्य सरकारों ने केंद्र के नरम रुख से आगे बढ़कर सख्त कदम उठाए। छत्तीसगढ़ में तीस जुलाई को स्वास्थ्य मंत्री ने एनालॉग पनीर के इस्तेमाल और बिक्री पर सीधी रोक की घोषणा की। मध्य प्रदेश सरकार ने भी कहा कि सेहत से कोई समझौता नहीं होने दिया जाएगा और राज्य में इसके निर्माण-बिक्री पर पाबंदी लगाई जाएगी, साथ ही प्राकृतिक दूध उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे पहले गुजरात और महाराष्ट्र भी एनालॉग पनीर, चीज और मक्खन के खिलाफ कार्रवाई कर चुके हैं। इन राज्यों का कहना है कि जब तक निर्माण पर ही रोक नहीं लगेगी, तब तक अकेले सूचना अंकन का नियम बेईमान कारोबारियों को धोखाधड़ी से नहीं रोक पाएगा।
इसके उलट राजस्थान में तस्वीर बिल्कुल अलग है। देश के कुल दूध उत्पादन में लगभग पंद्रह प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ यह दूसरा सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य है, फिर भी यहां पनीर, मावा, घी जैसे एनालॉग उत्पादों के निर्माण-बिक्री पर अलग से कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है। यहां केवल सामान्य मिलावट जांच के दायरे में ही इसकी निगरानी हो रही है। पिछले वर्ष राज्य में हजारों खाद्य नमूनों की जांच हुई और इनमें से बड़ी संख्या में नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे, लेकिन इनमें दूध और मावा से जुड़ी मिलावट का अलग ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया।
इसी बीच अंकन को लेकर बरती जा रही ढिलाई सर्वोच्च न्यायालय की नाराजगी का कारण भी बनी। अदालत ने साफ कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और खासकर बच्चों के स्वास्थ्य से किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता, और केंद्र सरकार से इस पर जवाब मांगा है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि कानून की नजर में सही ढंग से सूचित करके बेचा गया एनालॉग पनीर आज भी गैरकानूनी नहीं है, क्योंकि केंद्र सरकार ने इसे प्रतिबंध की बजाय पारदर्शिता के दायरे में रखा है। लेकिन बाजार की हकीकत कुछ और बताती है, जहां यह उत्पाद अक्सर बिना किसी सूचना के, असली दूध के पनीर के भाव पर बेचा जा रहा है। यही अंतर है जिसने कई राज्य सरकारों को केंद्र से आगे बढ़कर सीधी पाबंदी लगाने पर मजबूर किया, जबकि राजस्थान जैसे राज्य अभी भी पुराने ढांचे पर ही भरोसा जताए हुए हैं। उपभोक्ता के लिए फिलहाल सबसे भरोसेमंद तरीका यही बचता है कि खरीदते समय पैकेट पर लिखी सामग्री ध्यान से पढ़ें और किसी जाने-पहचाने विश्वसनीय स्रोत से ही दूध उत्पाद खरीदें।