पंकज चतुर्वेदी
पश्चिमी घाट की धुंध में लिपटी कुद्रेमुख की पहाड़ियाँ इन दिनों नीले-बैंगनी रंग में रंगी हैं। गंगडिकल्लु, चिट्कलगुड्ड और कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान की शोला घासभूमियों में नीलकुरिंजी खिली है और प्रकृति-प्रेमी उसे देखने पहुँच रहे हैं। यह पौधा सामान्यतः बारह वर्ष में एक बार सामूहिक रूप से खिलता है। इस क्षेत्र में पिछला बड़ा पुष्पन 2018 में दर्ज हुआ था, इसलिए अगले की उम्मीद 2030 के आसपास थी। फूल चार साल पहले ही आ गए, और वनस्पति वैज्ञानिक इसी से हैरान हैं।
पहले यह जान लें कि यह पौधा क्या है। नीलकुरिंजी पश्चिमी घाट की स्थानीय प्रजाति है, यानी प्राकृतिक रूप से दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यह लगभग तेरह सौ से छब्बीस सौ मीटर की ऊँचाई पर शोला घासभूमियों में उगती है। केरल के मुन्नार और इडुक्की, तमिलनाडु की नीलगिरि और पलनी की पहाड़ियाँ तथा कर्नाटक का कुद्रेमुख इसके प्रमुख ठिकाने हैं। यह झाड़ी अपने जीवन में एक ही बार फूलती है। फूल और बीज बनने के बाद पूरा पौधा सूखकर खत्म हो जाता है। वैज्ञानिक ऐसे पौधों को एकबारी प्रजनन वाला कहते हैं।
सवाल यह है कि सब पौधे बारह साल चुपचाप बढ़ते रहकर एक साथ क्यों खिलते हैं। सबसे प्रचलित व्याख्या जीवित रहने की रणनीति की है। अगर हर पौधा अलग साल फूलता, तो बीज खाने वाले पक्षी और कीट थोड़े-थोड़े बीजों को आसानी से चट कर जाते। सब साथ खिलें तो बीज इतने बनते हैं कि खाने वाले सब नहीं खा पाते, और जो बचते हैं वे अगली पीढ़ी बनते हैं। एक साथ खिलने से मधुमक्खियों और तितलियों को भरपूर पराग मिलता है और अलग-अलग पौधों के बीच परागण की संभावना बढ़ती है।
फिर भी पूरा रहस्य खुला नहीं है। पौधों के भीतर वह कौन-सी घड़ी है जो बारह वर्ष गिनती है, और पहाड़ों पर दूर-दूर फैले पौधे आपस में तालमेल कैसे बिठाते हैं, इसका पक्का जैविक या आनुवंशिक तंत्र अब तक स्थापित नहीं हुआ है। तापमान, वर्षा और मिट्टी की नमी की भूमिका का अनुमान लगाया जाता है, पर वह अनुमान ही है।
इस अनिश्चितता के बीच इस बार का जल्दी खिलना खड़ा है। पहली प्रतिक्रिया यह कहने की होती है कि यह जलवायु परिवर्तन का असर है। पर कुद्रेमुख के इस पुष्पन के लिए जलवायु परिवर्तन को सीधे ज़िम्मेदार ठहराने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण अभी नहीं है। वनस्पतिशास्त्रियों की सलाह भी यही है कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे सीधे जलवायु से जोड़ना उचित नहीं होगा।
एक और संभावना पर ध्यान देना चाहिए। इस क्षेत्र में पिछले करीब एक महीने से कहीं-कहीं ही फूल खिल रहे हैं। हो सकता है कि यह पूरी प्रजाति का बड़ा सामूहिक पुष्पन न होकर किसी स्थानीय समूह या पौधों की अलग पीढ़ी का फूलना हो, जो 2018 में नहीं खिली थी। एमईएम कॉलेज की वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष श्रुति नायक के अनुसार सीमित स्तर पर पुष्पन इस स्थानीय पौध समुदाय के चक्र में विविधता का संकेत हो सकता है। केरल के इडुक्की जिले के पीरुमेड में भी हाल में सीमित क्षेत्र में फूल आने की खबर आई थी, जो बताती है कि अलग-अलग समूहों के फूलने का समय हर जगह एक-सा नहीं होता। अगर ऐसा है तो बारह साल की लय उतनी कठोर नहीं, जितनी हम मानते आए हैं।
इस पौधे पर शोध हुआ है, पर उसमें बड़ा खालीपन है। हाल के एक खुली पहुँच वाले समीक्षा-पत्र में इसके वर्गीकरण, पारिस्थितिकी, फूलने के ढर्रे, औषधीय गुणों और संरक्षण का उपलब्ध साहित्य एक जगह जुटाया गया है। उसमें अठारह सौ अड़तीस से 2018 तक के पुष्पन-अभिलेखों का उल्लेख है। इस बार का जल्दी खिलना उस अधूरी समझ में एक नया और कीमती आँकड़ा है, बशर्ते उसे ठीक से दर्ज किया जाए।
दर्ज करने का काम यहीं से शुरू होता है। पिछले दो दशकों के तापमान, वर्षा और नमी के रिकॉर्ड खंगालने होंगे। यह मिलान करना होगा कि 2018 में किन ढलानों पर फूल आए थे और अब किन पर आए हैं। पश्चिमी घाट के स्थानीय समुदायों के पास पुष्पन की पीढ़ियों पुरानी स्मृतियाँ हैं, जो उनके लिए समय गिनने का साधन रही हैं। इन्हें भी शोध का हिस्सा बनाना चाहिए।
इस फूल की चिंता केवल सुंदरता की नहीं है। शोला घासभूमियाँ पहाड़ों पर पानी को थामने और धीरे-धीरे छोड़ने वाले स्पंज का काम करती हैं। नीलकुरिंजी के फूल मधुमक्खियों, तितलियों और दूसरे परागण करने वाले जीवों के लिए भोजन और पराग का बड़ा स्रोत हैं। पर इसका घर सिकुड़ रहा है। साल 2024 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में इसे पहली बार वैश्विक स्तर पर आकलित कर असुरक्षित श्रेणी में रखा गया। चाय और चीड़-यूकेलिप्टस जैसे बागानों, बसावट के फैलाव और बाहर से आई आक्रामक झाड़ियों ने इसके आवास को काटा है। जिस पौधे को जीवन में एक ही बार बीज बनाने का मौका मिलता है, उसके लिए हर कुचला हुआ पौधा पूरी एक पीढ़ी का नुकसान है।
इसीलिए इस समय सबसे ज़रूरी सबक संयम का है। कुद्रेमुख वन्यजीव प्रभाग के उप वन संरक्षक रुथ्रेन ने पर्यटकों से अपील की है कि वे दुर्लभ फूलों को निहारें, पर छूने, तोड़ने या पौधों को नुकसान पहुँचाने से पूरी तरह बचें। उनके अनुसार क्षेत्र की लगातार निगरानी हो रही है और नियम तोड़ने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। ढलानों पर पड़ने वाला हर कदम उस बीज को कुचल सकता है, जिससे अगली पीढ़ी उगनी है। प्रशासन को भीड़ को तय रास्तों तक सीमित रखना होगा और सैलानियों को प्लास्टिक का एक टुकड़ा भी पीछे नहीं छोड़ना चाहिए।
नीलकुरिंजी का समय से पहले खिलना हमें सीधा उत्तर नहीं, एक सवाल देता है। प्रकृति की घड़ियाँ उतनी सटीक नहीं हैं जितनी हमने मान ली थीं, और उन्हें समझने के लिए धैर्य, आँकड़े और विनम्रता चाहिए। इसे जलवायु संकट का प्रमाण घोषित कर देना भी जल्दबाज़ी होगी और एक सुंदर संयोग कहकर टाल देना भी। सही रास्ता यही है कि फूलों का आनंद लें, उन्हें बचाएँ और इस पहेली को वैज्ञानिक कसौटी पर सुलझने दें।