पारंपरिक  ‘जल-तिजोरियां’  ही बचा सकती हैं बेपानी होने सेपारंपरिक  ‘जल-तिजोरियां’  ही बचा सकती हैं बेपानी होने से

पारंपरिक  ‘जल-तिजोरियां’  ही बचा सकती हैं बेपानी होने से

पंकज चतुर्वेदी

इस साल मौसम ने  होली से पहले ही तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं । गहने जंगलों से आच्छादित उड़ीसा और झारखंड जैसे राज्यों में  मार्च के तीसरे हफ्ते में तापमान 41 से पार हो गया । महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना में तो लू के विकत हालात हो रहे हैं । जितनी अधिक गर्मी होगी, उतनी ही जल की मांग बढ़ेगी- पीने के लिए, स्नान यदि के लिए खेत के लिए भी और कारखाने को भी । समझना होगा कि धरती पर पानी की जरूरत या तो बरसात से पूरी होती है या फिर ग्लेशियर से ।

 गर्मी के अनियंत्रित होने से इन  दोनों जल-स्रोतों का गणित भी डगमगा रहा है । सबसे बड़ी  बात जलवायु परिवर्तन की तीखी मार  मौसम के सभी पूर्वानुमानों को गड़बड़ा डटे है सो पानी के लिए बरसात के भरोसे बैठना भी अब अनिश्चित सा हो गया है । अभी से अधिकांश छोटी नदियां सूख गई है और इसका सीधा असर तालाब-कुओं-बावड़ियों पर दिख रहा है। ऐसे में एक तो समझ को हर समय जल संकट के लिए तैयारी करना  होगा – तैयारी का कोई  रॉकेट विज्ञान है नहीं । बस अपने पुरखों ने पानी की हर बूंद को सहेजने के जो जंतर दिए थे, उन्हें सिद्ध कर रखना होगा।  

भारत में विश्व की कुल आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है, जबकि देश में  पीने योग्य जल संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत भाग ही उपलब्ध है। देश में अत्यधिक जल दोहन तथा अकुशल प्रबंधन के कारण भू-जल स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। इसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में देश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। वैसे देश की जल कुंडली देखें तो वह बहुत निर्मल और नीली दिखती है लेकिन यह बात सरकारी आँकड़े भी मानते हैं कि जल संसाधन मंत्रालय के एकीकृत जल संसाधन विकास के लिये राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च उपयोग परिदृश्य में वर्ष 2050 तक जल की आवश्यकता 1,180 अरब घन मीटर होने की संभावना है।

देश में जल की उपलब्धता वर्तमान में 1,137 अरब घन मीटर है। वर्ष 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने योग्य स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होगा। जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120 वें स्थान पर है और देश के लगभग 70 प्रतिशत जल स्रोत प्रदूषित हैं।

हमारे देश  की  नियति है कि थोड़ा ज्यादा बादल बरस जाएँ तो उसके समेटने के साधन नहीं बचते और कम बरस जाए तो ऐसा रिजर्व स्टॉक नहीं दिखता जिससे काम चलाया जा सके। अनुभवों से यह तो स्पष्ट है कि भारीभरकम बजट, राहत, नलकूप जैसे शब्द  जल संकट का निदान नहीं है। करोड़ों-अरबों की लागत से बने बाँध  सौ साल भी नहीं चलते, जबकि हमारे पारंपरिक ज्ञान से बनी जल संरचनांए ढेर सारी उपेक्षा, बेपतवाही के बावजूद आज भी पानीदार हैं।

यदि भारत का ग्रामीण जीवन और खेती बचाना है तो बारिश की हर बूंद को सहेजने के अलावा और कोई चारा नहीं है। यही हमारे पुरखों की रीत भी थी। देश के बहुत बड़े हिस्से के लिए अल्प वर्षा नई बात नही है और ना ही वहां के समाज के लिए कम पानी में गुजारा करना, लेकिन बीते पांच दशक के दौरान आधुनिकता की आंधी में दफन हो गए हजारों चंदेल-बुंदेला कालीन  तालाबों  और पारंपरिक जल प्रणालियों के चलते यह हालात बने।

मप्र के तीन लाख की आबादी वाले बुरहानपुर शहर में कोई अठारह लाख लीटर  पानी प्रतिदिन एक ऐसी प्रणाली के माध्यम से वितरित होता है जिसका निर्माण सन 1615 में किया गया था। यह प्रणाली जल संरक्षण और वितरण की दुनिया की अजूबी मिसाल है, जिसे ‘भंडारा’ कहा जाता है।  जिस जलवायु परिवर्तन के वैश्विक संकट के सामने  आधुनिक तकनीक बेबस दिखती है, हमारे  पुरखे हजारों साल पहले इससे वाकिफ थे और उन्होंने देश -काल-परिस्थिति के अनुसार बारिश  को समेट कर रखने की कई प्रणालियां विकसित व संरक्षित की थीं।

 घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिए मीठे पानी का साधन कुआं कभी घर-आंगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएं बनवाते थे। हरियाणा से मालवा तक जोहड़ या खाल जमीन की नमी बरकरार रखने की प्राकृतिक संरचना हैं। ये आमतौर पर वर्षा -जल के बहाव क्षेत्र में पानी रोकने के प्राकृतिक या कृत्रिम बांध के साथ छोटा तालाब की मानिंद होता है। तेज ढलान पर तेज गति से पानी के बह जाने वाले भूस्थल में पानी की धारा को काटकर रोकने की पद्धति ‘‘पाट’’ पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रही है।

एक नहर या नाली के जरिये किसी पक्के बांध तक पानी ले जाने की प्रणाली ‘‘नाड़ा या बंधा’’ अब देखने को नहीं मिल रही है। कुंड और बावड़िया महज जल संरक्षण के साधन नहीं, बल्कि हमारी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना रहे हैं। इनडोर में एक ऐसी ही जल युक्त बावड़ी पर अवैध निर्माण कर बने मंदिर के धंसने से 50 से अधिक लोग क्या मरे, शासन ने उस बावड़ी को ही मिटटी से भर दिया. जबकि   आज जरूरत है कि ऐसी ही पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की ही हो।

यह देश -दुनिया जब से है,  तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और कम बरसात , मरूस्थल, जैसी विषमताएं प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी  घरों- पिंडों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर तरह की जल-विपदा का हल रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आंगन, गांव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएं गायब हुए हैं। बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ।  हमारा आदि-समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था।

वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती-संरचना, पानी की मांग व आपूर्ति का गणित भी जानता था ।  उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कंठ तर हो जाएगा। आज भी देश के कस्बे-शहर में बनने वाली जन योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आंक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था।

राजस्थान में तालाब, बावड़ियां, कुई और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नगालेंड में जोबो तो लेह-लद्दाक में जिंग, महाराष्ट्र  में पैट, उत्तराखंड में गुल, हिमाचल प्रदेश  में कुल और और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारंपरिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आंधी में कहीं गुम हो गए और अब आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बांध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है।

 गुजरात के कच्छ के रण में पारंपरिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिष की बूंदों के मीठे पानी को ‘विरदा’ के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिश  भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाक में सुबह बरफ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो शाम को बहता है। वहां के लोग जानते थे कि शाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाए।

तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई कई तालाबों की श्रंखला में मोड़कर हर बूंद को बड़ी नदी व वहां से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परंपरा थी।

उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिले में पलार एनीकेट के जरिए इस ‘‘पद्धति तालाब’’ प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं। पानी के कारण पलायन के लिए बदनाम बुंदेलखंड में भी पहाडी के नीचे तालाब, पहाडी पर हरियाली वाला जंगल और एक  तालाब के ‘‘ओने’’(अतिरिक्त जी की निकासी का मुंह) से नाली निकाल कर उसे उसके नीचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोड़ने व ऐसे पांच-पांच तालाबों की कतार बनाके की परंपरा 900वीं सदी में चंदेल राजाओं के काल से रही है।

 वहां तालाबों के आंतरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बंधान फोड़े गए, तालाबों पर कालोनी या खेत के लिए कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिए गए। इसके कारण जब जल देवता रूठे तो  पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किए गए। सभी उपाय जब हताश  रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है। जल को सोच समझ कर खर्च करना तो जरुरी है ही, आकाश से गिरी हर बूँद को सहेजने  के लिए हमारी पारम्परिक जल संरक्ष्ण प्रणालियों को जिलाना भी अनिवार्य है ये प्रणालियाँ महज पानी नहीं सहेजती , धरती के बढ़ते तापमान को भी नियंत्रित करती हैं . हरियाली, मवेशी के लिए चारा , भोजन के लिए मछली व अन्य  जल- फल के रूप में  तो इनका आशीष  मिलता ही है.

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