256 मौतें, एक सवाल: आखिर कब बचेंगे ओडिशा के गजराज?

ओडिशा में 22 सितंबर 2026, मंगलवार को विधानसभा में जब राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री गणेश राम सिंहखुंटिया ने एक लिखित सवाल के जवाब में यह आंकड़ा पेश किया कि 2023-24 से 2025-26 के बीच राज्य में कुल 256 जंगली हाथियों की मौत हो चुकी है, तो सदन में सन्नाटा छा गया। इनमें से 13 हाथियों को शिकारियों ने सीधे मार गिराया, बाकी भोजन-पानी की कमी, बीमारी और मानव-हाथी संघर्ष का शिकार बने। यह आंकड़ा अपने आप में इतना बड़ा और ताज़ा है कि यह सवाल उठाना लाज़िमी हो जाता है — आखिर ओडिशा के जंगल हाथियों के लिए कब्रगाह क्यों बनते जा रहे हैं। राज्य में बी जे पी  की सरकार आने के बाद हाथियों की मौत  न केवल एक लुप्त हो रही  प्रजाति पर संकट है, बल्कि  यह उजड़ते जंगलों और जंगल पर निर्भर आदिवासियों के अस्तित्व का भी प्रश्न बनता जा रहा है ।

इसी सवाल का सबसे शर्मनाक जवाब कुछ महीने पहले कंधमाल जिले में मिला था। बालिगुडा वन प्रभाग में एक हाथी की करंट लगने से संदिग्ध मौत हुई, लेकिन जो हुआ उसके बाद वह किसी भी सभ्य वन-प्रशासन के मुंह पर तमाचा है। विभागीय कार्रवाई और जांच से बचने के लिए वन अधिकारियों ने बिना किसी उच्च अधिकारी को सूचित किए शव का निपटान करने की ठानी, और उसे आसानी से ढोने के लिए 32 टुकड़ों में काटकर कंधमाल और कालाहांडी के अलग-अलग हिस्सों में दफना दिया। जिस विभाग की ज़िम्मेदारी हाथियों को बचाना है, वही उनकी मौत के सबूत मिटाने में जुट जाए, तो समझ आता है कि संकट सिर्फ जंगल में भोजन की कमी का नहीं, बल्कि तंत्र की नीयत का भी है। कुछ ही महीने बाद ढेंकानाल के हिंदोल क्षेत्र में एक फार्महाउस मालिक ने अपनी ज़मीन की सुरक्षा के नाम पर सोलर फेंसिंग में करंट दौड़ा दिया, जिसकी चपेट में आकर एक दंतैल हाथी मारा गया, और मामले को दबाने के लिए शव को खेत में ही दफना दिया गया। और अगस्त में, जिस दिन दुनिया विश्व हाथी दिवस मना रही थी, ठीक उसी दिन संबलपुर के मुंडेर जंगल से एक हथिनी का सड़ा-गला शव बरामद हुआ, जिसकी मौत की वजह आज तक साफ नहीं हो पाई। ये तीनों घटनाएं बताती हैं कि हाथियों की मौत अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक तयशुदा सिलसिला बन चुकी है, जिस पर पर्दा डालना प्रशासन की आदत में शुमार हो गया है।

इस सिलसिले की जड़ में तीन वजहें साफ नज़र आती हैं, और तीनों एक-दूसरे को बढ़ावा देती हैं। पहली, जंगल में प्राकृतिक भोजन और पानी की लगातार घटती उपलब्धता, जिसकी वजह से हाथी मजबूरन खेतों और बस्तियों की ओर रुख करते हैं और वहीं टकराव में या ज़हरीले पदार्थों की चपेट में आकर जान गंवाते हैं। दूसरी, खनिज संपदा से भरपूर ओडिशा के जंगलों में खनन के लिए होने वाले लगातार धमाके, जो न सिर्फ हाथियों के सदियों पुराने आवागमन गलियारों को तोड़ते हैं बल्कि उनकी सुनने की क्षमता और सामान्य व्यवहार को भी बिगाड़ देते हैं, जिससे भ्रमित झुंड अनजान इलाकों में भटककर मुसीबत में फंसते हैं। तीसरी, सघन जंगलों का लगातार सिकुड़ना — चाहे वह विकास परियोजनाओं की वजह से हो, अवैध कटाई से या अतिक्रमण से — जिसने हाथियों के परंपरागत विचरण क्षेत्र को टुकड़ों में बांट दिया है। इन्हीं वजहों का असर है कि ओडिशा के गुस्सैल और भूखे हाथी अब पड़ोसी राज्यों का रुख करने लगे हैं। हाल ही में झारखंड के चंपुआ वन क्षेत्र में हाथी के हमले में एक किसान की जान गई, तो छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में जान बचाकर भाग रही एक बुजुर्ग महिला को हाथी ने पटककर मार डाला। यानी यह संकट अब ओडिशा की सीमा में सिमटा नहीं रह गया, बल्कि पूरे मध्य-पूर्वी भारत की समस्या बन चुका है।

यह पहलू आदिवासी इलाकों के संदर्भ में और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि ओडिशा के जिन जिलों में हाथियों की मौतें सबसे ज़्यादा हो रही हैं — क्योंझर, ढेंकानाल, कंधमाल, कालाहांडी, संबलपुर — ये सभी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र हैं, जहां जंगल सिर्फ पर्यावरण का हिस्सा नहीं बल्कि आदिवासी समाज की पूरी जीवन-पद्धति की रीढ़ है। सदियों से आदिवासी समुदाय जंगल पर ही जलाऊ लकड़ी, वनोपज, दवा-जड़ी-बूटियों और आजीविका के लिए निर्भर रहे हैं, और हाथी को इन समुदायों की लोक-परंपरा और मान्यताओं में देवत्व तथा समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन जब खनन के लिए यही जंगल उजाड़े जाते हैं, तो सबसे पहली और सबसे गहरी चोट आदिवासी समुदायों पर ही पड़ती है — उनकी ज़मीन छिनती है, आजीविका के साधन खत्म होते हैं, और साथ ही हाथियों के भटकते झुंड उन्हीं की बस्तियों में घुसकर तबाही मचाते हैं। यानी जंगल के उजड़ने की कीमत आदिवासी समाज दोहरी चुका रहा है — एक तरफ अपनी परंपरागत जीवनशैली और संसाधनों की, और दूसरी तरफ हाथियों के हमलों में अपनी जान और घर-बार की। इस नज़रिए से देखें तो हाथी और जंगल का संरक्षण सिर्फ वन्यजीव सुरक्षा का मसला नहीं, बल्कि ओडिशा के लाखों आदिवासियों के अस्तित्व और सम्मान से जुड़ा सवाल है, जिसे नज़रअंदाज़ करना सीधे उनके साथ अन्याय है।

सरकार की तरफ से एंटी-पोचिंग कैंप, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा और जन-जागरूकता अभियान जैसे दावे बार-बार दोहराए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल देती है। जिन अधिकारियों को हाथियों की जान बचानी है, वही मौत के मामलों को छिपाने में लग जाते हैं — कभी शव के टुकड़े कर, कभी उसे चुपचाप दफनाकर। न खनन क्षेत्रों में विस्फोटों को नियंत्रित करने की कोई ठोस और लागू होने वाली नीति दिखती है, न ही अवैध बिजली फेंसिंग पर सख्त कार्रवाई। हर घटना के बाद जांच के आदेश ज़रूर दिए जाते हैं, लेकिन मूल समस्या — सिकुड़ता आवास और टूटते गलियारे — जस की तस बनी रहती है, और अगली मौत का इंतज़ार भर होता है।

इसका नुकसान सिर्फ हाथियों तक सीमित नहीं। इसी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष में 431 इंसानों की जान जा चुकी है, 489 से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं और 699 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हुए हैं। यानी जंगल और बस्ती, दोनों तरफ लगातार खून बह रहा है और नुकसान बढ़ रहा है। हाथी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में बीज फैलाव और वन पुनर्जनन की अहम भूमिका निभाते हैं, इसलिए उनकी लगातार होती मौतें सिर्फ एक प्रजाति का संकट नहीं, बल्कि पूरे जंगल के भविष्य पर मंडराता खतरा हैं। अगर सरकार अब भी कागज़ी योजनाओं और मौत के बाद की औपचारिक जांच तक सीमित रही, तो आने वाले वर्षों में यह संकट सिर्फ ओडिशा तक नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के जंगलों और बस्तियों को अपनी चपेट में ले लेगा।

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