भारत में टायफाइड (Typhoid) एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है
पंकज चतुर्वेदी
पहले तो अत्यधिक थकान और सुस्ती महसूस हो रही थी, फिर बुखार के साथ-साथ तेज सिरदर्द और मांसपेशियों में दर्द शुरू हो गया। घर में रखी दवा बगैर डॉक्टर की सलाह से खा ली तो भूख लगना ही बंद हो गया और उलटी- दस्त सा लगने लगा । लक्षण तो टायफाइड के थे लेकिन पहली बार टेस्ट में उसकी पुष्टि हुई नहीं । फिर जांच कारवाई तो पता चला आंतों में साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया ‘बाइनरी विखंडन’ प्रक्रिया के जरिए तेजी से बढ़ रहा है और मियादी बुखार या टायफाइड इस हाल में है कि मरीज को ठीक होने में कम से कम एक महीना लगेगा ।
भारत में महानगरों से दूरस्थ गांवों तक टायफाइड एक बड़ी महामारी के रूप में फैलता जा रहा है और दुखद यह है कि इसके लिए कोई विशेष अभियान नहीं बनाया गया ।
वर्ष 2023 के आँकड़े बताते हैं कि देश भर में इस महामारी के 49 लाख से अधिक मामले सामने आए, जबकि 7,850 लोगों की मौत हो गई। इनमें से लगभग 29 फीसदी 3.21 लाख बच्चे थे । आंकड़ों के अनुसार पांच साल से कम आयु के करीब 3.21 लाख बच्चों को टाइफाइड के बाद अस्पताल जो कुल भर्ती मरीजों का जो 44 फीसदी है । इस आयु वर्ग के 2,600 बच्चों की मौत हो गई ।
वहीं पांच से नौ साल के करीब 2.65 लाख करीब 2.65 लाख बच्चों को टायफाइड के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और लगभग 2,900 बच्चों की जान गई, जो कुल मौतों का करीब 36 फीसदी है। अध्ययन के मुताबिक छह महीने से चार साल तक के बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का जोखिम सबसे ज्यादा पाया गया।
यह खुलासा लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर समेत कई संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किये गए गहन शोध में हुआ । सर्विलांस फॉर एंटरिक फीवर इन इंडिया (2017-2020), ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2021 और जुलाई 2025 तक प्रकाशित अध्ययनों की समीक्षा से तैयार या अध्ययन विश्व प्रसिद्ध जर्नल “द लैंसेट” में “रीजनल हेल्थ साउथ ईस्ट एशिया” के तरह प्रकाशित हुए हैं ।
एक बात और तीन राज्यों- दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसका प्रकोप अधिक हैं । यहाँ बीमारी के कुल मामलों के 29 प्रतिशत मरीज पाये गए । इन राज्यों में न सिर्फ संक्रमण ज्यादा दर्ज किया गया है, बल्कि एन्टीबायोटिक प्रभावहीन रहने और मरने वालों की संख्या भी अधिक रही है।
हालत दो कारणों से भयावह हो रहे हैं, एक तो इस बीमारी के मूल कारक दूषित पेयजल और भोजन पर कोई नियंत्रण नहीं हो पा रहा तो इस बीमारी का रामबाण इलाज कहे जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं तेजी से बेअसर होती जा रही हैं। बच्चों में संक्रमण बोर मृत्यु दर अधिक होने से यह संकट और गहरा हो गया है।
हाल ही में इंदौर के दूषित पेयजल से बहुत सी मौत हुई, तभी गुजरात के गांधी नगर में भी दूषित पेयजल से सैंकड़ों लोग बीमार हुए और ये सभी टायफाइड के ही शिकार थे । शहरी आबादी के बीच पानी की गुणवत्ता और स्वच्छता व्यवस्था इस बीमारी के प्रसार का बड़ा कारण हैं । टायफाइड एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो मुख्य रूप से गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलता है।
महानगरों में बढ़ती जनसंख्या का दबाव, पुरानी और जर्जर पेयजल पाइपलाइनें, और सीवरेज सिस्टम का पेयजल लाइनों के साथ मिलना इस संक्रमण को घर-घर पहुँचा रहा है। जब देश तेजी से शहरीकरण की तरफ बढ़ रहा है और अधिकांश शहरीकरण अनियोजित है तो पीने का साफ पानी एक बड़ी समस्या है । इसके साथ ही बगैर गुणवत्ता एक सड़क के किनारे , धूल और गंदगी में खुल रहे खाने-पीने के स्टाल स्वाद के साथ बीमारी के प्रसार में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं ।
यदि समय रहते दवा-प्रतिरोध, साफ पानी और स्वच्छता पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। इस संकट से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है ।
एक तो इस रोग से बचने के लिए टायफाइड कॉन्जुगेट वैक्सीन (टी सी वी ) को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में प्रभावी ढंग से शामिल करना होगा, ताकि बच्चों को संक्रमण के शुरुआती चरण में ही सुरक्षा मिल सके। फिर ‘हर घर जल’ या शहरों में “अमृत” योजना के अंतर्गत अधिक लोगों तक पानी पहुंचाने के आँकड़े बढ़ाने से बेहतर होगा कि अभियानों को केवल पाइप पहुँचाने तक सीमित न रखकर, पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच और पाइपलाइनों के रखरखाव पर जोर दिया जाए । इसी तरह सड़क किनारे हो या बड़े रेस्टोरेंट । भोजन की गुणवतता सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम और सतत निरीक्षण करना होगा ।
बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक दवाओं की खरीद-बिक्री पर सख्त नियंत्रण की आवश्यकता है। डॉक्टरों और मरीजों, दोनों को दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति जागरूक करना होगा।
टायफाइड के बढ़ते आंकड़े भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं। यह बीमारी केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। दवाओं का बेअसर होना हमें उस दौर की ओर ले जा रहा है जहाँ सामान्य बीमारियां महामारी का रूप ले लेती थीं।
हमें यह समझना होगा कि स्वच्छता और साफ पानी पर किया गया निवेश भविष्य में इलाज पर होने वाले भारी खर्च और जान-माल के नुकसान से कहीं सस्ता है। सरकार, समाज और चिकित्सा जगत को मिलकर इस ‘मियादी संकट’ का समाधान खोजना होगा, अन्यथा हमारी अगली पीढ़ी एक ऐसे भविष्य में कदम रखेगी जहाँ दवाएं तो होंगी, लेकिन वे बेअसर होंगी।