नदी केवल पानी की एक धारा नहीं होती बल्कि यह एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र होती है
अजय सहाय
आज के समय में भारत सहित विश्व के अनेक शहरों में “रिवरफ्रंट डेवलपमेंट” को बहुत तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है और इसे सुंदरता, पर्यटन तथा आधुनिक विकास का प्रतीक बताया जाता है ।
लेकिन यदि इसे सरल वैज्ञानिक समझ, पर्यावरणीय संतुलन और जल-चक्र (Hydrological Cycle) के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बिना सही योजना और प्रकृति के नियमों का पालन किए किया गया रिवरफ्रंट विकास वास्तव में नदियों की प्राकृतिक संरचना (Natural Morphology), जल प्रवाह (Flow Dynamics) और जैव विविधता (Biodiversity) को नष्ट करने वाली प्रक्रिया बन जाता है, जिसे कई वैज्ञानिक “नदियों की धीमी हत्या” तक मानते हैं।
क्योंकि नदी केवल पानी की एक धारा नहीं होती बल्कि यह एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) होती है जिसमें पानी, मिट्टी, बालू, गाद, पौधे, मछलियाँ, पक्षी और सूक्ष्म जीव सभी मिलकर एक संतुलित जीवन चक्र बनाते हैं ।
वैज्ञानिक रूप से नदी को “डायनेमिक सिस्टम” कहा जाता है, यानी यह लगातार अपने प्रवाह, रास्ते और आकार को बदलती रहती है, लेकिन जब रिवरफ्रंट के नाम पर नदी के किनारों को कंक्रीट से बांध दिया जाता है, घाट, सड़क, पार्क और भवन बना दिए जाते हैं, तो नदी को एक “स्थिर नहर” (Static Canal) में बदल दिया जाता है, जिससे उसकी प्राकृतिक शक्ति खत्म होने लगती है और नदी अपनी स्व-शुद्धिकरण क्षमता खो देती है ।
यही कारण है कि United Nations Environment Programme और International Union for Conservation of Nature जैसे वैश्विक संस्थान बार-बार चेतावनी देते हैं कि नदी को कंक्रीट में बांधना उसके प्राकृतिक जीवन को समाप्त करना है, अब यदि हम जल के वैश्विक डेटा को देखें तो पृथ्वी पर कुल जल का लगभग 97% खारा है और केवल 2.5% मीठा जल है, उसमें से भी केवल 0.3% पानी नदियों और झीलों में उपलब्ध है, यानी जो पानी हमें सीधे उपयोग के लिए मिलता है वह बहुत सीमित है।
ऐसे में नदियों का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है, Food and Agriculture Organization के अनुसार दुनिया की लगभग 40% आबादी नदी के पानी पर निर्भर है और भारत में लगभग 70% पेयजल तथा 80% सिंचाई नदी और भूजल से होती है, ऐसे में यदि हम नदियों को कंक्रीट में बांध देंगे तो भविष्य में जल संकट और गहरा हो जाएगा ।
रिवरफ्रंट विकास का सबसे बड़ा वैज्ञानिक नुकसान यह है कि यह नदी के “ई-फ्लो” यानी पर्यावरणीय प्रवाह को कम कर देता है, Central Water Commission के अनुसार किसी भी नदी में कम से कम 10 से 30% प्राकृतिक जल प्रवाह होना जरूरी है ताकि नदी जीवित रह सके, लेकिन रिवरफ्रंट बनने के बाद कई नदियों में यह प्रवाह 5% से भी कम हो जाता है, इससे नदी की स्व-शुद्धिकरण क्षमता घट जाती है और प्रदूषण बढ़ने लगता है ।
उदाहरण के लिए साफ नदी में BOD (Biochemical Oxygen Demand) 3 mg/L से कम होना चाहिए लेकिन शहरी नदियों में यह 30 से 60 mg/L तक पहुंच जाता है, वहीं DO (Dissolved Oxygen) जो मछलियों के लिए जरूरी होता है 5-6 mg/L होना चाहिए लेकिन यह घटकर 1-2 mg/L रह जाता है, इससे मछलियाँ मरने लगती हैं और नदी का जीवन समाप्त होने लगता है ।
दूसरा बड़ा प्रभाव भूजल पर पड़ता है, प्राकृतिक रूप से नदी के किनारे मिट्टी और बालू के बने होते हैं जो वर्षा जल को जमीन में सोखकर भूजल को recharge करते हैं, लेकिन जब वहां कंक्रीट बना दिया जाता है तो पानी जमीन में नहीं जा पाता, infiltration rate जो पहले 60-80% होता था वह घटकर 5-10% रह जाता है, Central Ground Water Board के अनुसार भारत के 17% क्षेत्र over-exploited हैं यानी वहां भूजल तेजी से खत्म हो रहा है और रिवरफ्रंट वाले शहरों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, कई स्थानों पर भूजल स्तर 1 से 3 मीटर प्रति वर्ष तक गिर रहा है ।
तीसरा बड़ा नुकसान जैव विविधता को होता है, नदी के किनारे का क्षेत्र जिसे “Riparian Zone” कहा जाता है, वहां अनेक प्रकार के पौधे, पक्षी और जीव-जंतु रहते हैं, लेकिन जब इसे कंक्रीट में बदल दिया जाता है तो उनका प्राकृतिक आवास समाप्त हो जाता है, World Wildlife Fund के अनुसार 1970 से 2020 के बीच freshwater biodiversity में 83% गिरावट दर्ज की गई है, जो यह दर्शाता है कि नदियों का जीवन तेजी से खत्म हो रहा है ।
चौथा बड़ा खतरा बाढ़ का है, पहले नदी के पास floodplain होता था जहां बाढ़ का पानी फैलकर नियंत्रित हो जाता था, लेकिन जब वहां कंक्रीट बना दिया जाता है तो पानी सीधे शहरों में प्रवेश करता है और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, Intergovernmental Panel on Climate Change के अनुसार floodplain के 30-50% नष्ट होने से बाढ़ की तीव्रता 2-3 गुना बढ़ सकती है ।
पांचवा प्रभाव तापमान और जलवायु पर पड़ता है, पेड़-पौधे तापमान को 2-5 डिग्री तक कम करते हैं लेकिन कंक्रीट गर्मी को बढ़ाता है जिससे पानी का तापमान बढ़ जाता है और ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है ।
छठा नुकसान गाद (sediment) से जुड़ा है, भारत की नदियाँ हर साल लगभग 5-6 बिलियन टन गाद बहाती हैं, लेकिन रिवरफ्रंट के कारण यह गाद जमा होने लगती है जिससे नदी उथली हो जाती है और उसकी जलधारण क्षमता कम हो जाती है।
यदि हम भारत के उदाहरण देखें तो Sabarmati Riverfront में नदी को संकरा कर दिया गया और प्राकृतिक प्रवाह समाप्त हो गया, वहां पानी को बनाए रखने के लिए बाहर से नर्मदा नदी का पानी लाना पड़ता है, जिससे यह एक कृत्रिम जलाशय बन गया है, इसी प्रकार Yamuna River के floodplain पर निर्माण से भूजल recharge कम हुआ और प्रदूषण बढ़ा, अब यदि हम अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देखें तो कई देशों ने रिवरफ्रंट जैसे कंक्रीट विकास को गलत मानकर उसे हटाया या प्रतिबंधित किया है ।
Rhine River (जर्मनी और नीदरलैंड) में पहले नदी को कंक्रीट से बांधा गया था लेकिन बाढ़ और पर्यावरणीय नुकसान के कारण “Room for the River” कार्यक्रम चलाकर कंक्रीट हटाया गया और नदी को फैलने की जगह दी गई ।
Los Angeles River को पहले पूरी तरह कंक्रीट में बदल दिया गया था लेकिन अब अमेरिका इसे प्राकृतिक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, Cheonggyecheon Stream (दक्षिण कोरिया) में कंक्रीट और हाईवे हटाकर नदी को पुनर्जीवित किया गया जिससे तापमान 3-4 डिग्री कम हुआ और जैव विविधता वापस आई ।
New Zealand में नदियों को कानूनी अधिकार दिया गया है और उनके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ पर सख्त नियंत्रण है, Thames River (यूके) में भी बिना पर्यावरणीय अध्ययन के कोई निर्माण अवैध माना जाता है, इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि विकसित देश अब “रिवरफ्रंट” की जगह “रिवर रिस्टोरेशन” को अपनाने लगे हैं ।
यानी नदी को उसके प्राकृतिक स्वरूप में वापस लाना ही सही विकास है, यदि समाधान की बात करें तो आपके “जल पंचायत मॉडल” के अनुसार सबसे प्रभावी तरीका है कि नदी के दोनों किनारों पर 50-100 मीटर का प्राकृतिक क्षेत्र सुरक्षित रखा जाए, सभी नालों को DEWATS और Bio-STP से ट्रीट किया जाए ताकि नदी में गंदा पानी न जाए ।
constructed wetlands के माध्यम से Typha, Vetiver और Canna जैसे पौधों द्वारा पानी को प्राकृतिक रूप से शुद्ध किया जाए, नदी में 10-30% E-flow बनाए रखा जाए, Venturi और Cascade तकनीक के माध्यम से पानी में ऑक्सीजन बढ़ाई जाए और सबसे महत्वपूर्ण जनभागीदारी यानी community, स्कूल के बच्चे, युवा, महिलाएं और किसान मिलकर जल संरक्षण के निर्णय लें, अंततः यही निष्कर्ष निकलता है कि रिवरफ्रंट विकास दिखने में सुंदर हो सकता है लेकिन यह नदी के लिए खतरनाक है क्योंकि यह नदी को एक जीवित प्रणाली से एक मृत नहर में बदल देता है, इसलिए हमें यह समझना होगा कि “नदी को सजाना नहीं, उसे बहने देना ही असली विकास है” ।
यदि हमें 2047 तक जल आत्मनिर्भर भारत बनाना है तो हमें कंक्रीट आधारित रिवरफ्रंट नहीं बल्कि प्राकृतिक नदी संरक्षण, जल पंचायत, वेटलैंड पुनर्जीवन और जनभागीदारी आधारित मॉडल को अपनाना होगा, क्योंकि अंततः “नदी बचेगी तभी भविष्य बचेगा।”


