प्रशांत की तपिश और मानसून की परीक्षा: सुपर अल-नीनो की चुनौती

पंकज चतुर्वेदी

सुपर अल-नीनो जैसी गंभीर जलवायु घटना का खतरा हमारे देश के सर पर खड़ा है । प्राकृतिक आपदा से जूझने के लिए देश को एक गंभीर और त्वरित नीति की जरूरत है क्योंकि इसका सीधा प्रहार हमारे आम जनजीवन, खेतों और बाजारों पर पड़ने वाला है।यह देश के भविष्य से जुड़ा एक बेहद गंभीर प्रश्न है और समय रहते इसके दूरगामी प्रभावों पर मंथन करना अनिवार्य हो गया है। सुपर अल-नीनो जैसी गंभीर जलवायु घटना केवल कोई वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत है जिसका सीधा प्रहार हमारे आम जनजीवन, खेतों और बाजारों पर पड़ता है। जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर का पानी असामान्य रूप से गर्म होकर दो डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाता है, तो वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पूरी तरह बिगड़ जाता है। इस बदलती वायु-योजना का सीधा और सबसे घातक असर भारतीय उपमहाद्वीप के मानसून पर पड़ता है। मानसून की कमजोरी का मतलब केवल कुछ दिनों की बारिश की कमी नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है खरीफ फसलों की बुवाई में भारी देरी, सिंचाई के संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव और अंततः अनाज एवं ताजे उत्पादों की उपलब्धता में भारी गिरावट। यही वह प्रारंभिक कड़ी है जिससे देश के करोड़ों किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और बाजारों में महंगाई का पूरा चक्र प्रभावित होता है।

ऐतिहासिक साक्ष्य और आंकड़े गवाह हैं कि जब-जब प्रशांत महासागर में यह हलचल तीव्र हुई है, तब-तब भारत में औसत मौसमी वर्षा न सिर्फ कम रही है, बल्कि उसकी असमानता भी खतरनाक स्तर तक बढ़ी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और पिछले डेढ़ सौ वर्षों के ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि देश ने जितने भी भीषण सूखे झेले हैं, उनमें से लगभग अस्सी प्रतिशत का सीधा संबंध अल-नीनो वर्षों से रहा है। वर्ष 1997 और 2015 के सुपर अल-नीनो इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जब देश के सैकड़ों जिले सूखे की चपेट में आ गए थे और मानसून सामान्य से चौदह प्रतिशत तक कम दर्ज किया गया था। पिछले अनुभवों से स्पष्ट है कि कमजोर मानसून से प्रभावित क्षेत्र मात्र कुछ जिलों या पश्चिमी और मध्य भारत तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सिंचित इलाके भी अप्रत्याशित दबावों के कारण असुरक्षित हो जाते हैं। पानी की कमी का पहला प्रहार जल-आधारित फसलों पर पड़ता है, जिनमें धान, गन्ना और जल-निर्भर सब्जियां सबसे पहले प्रभावित होती हैं। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के शोध बताते हैं कि एक तीव्र अल-नीनो वर्ष में देश के कुल धान उत्पादन में दस से पंद्रह प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। जब इन फसलों की पैदावार घटती है, तो स्थानीय बाजारों में आपूर्ति कम होती है और कीमतें आसमान छूने लगती हैं, जो शहरी और ग्रामीण दोनों प्रकार के उपभोक्ताओं के लिए अत्यंत दर्दनाक साबित होती हैं।

इसके साथ ही कृषि लागत का बढ़ना भी एक वास्तविक और बड़ा आर्थिक खतरा है। सूखा-प्रतिरोधी बीजों की खरीद, भूजल स्तर गिरने के कारण गहरे से पानी निकालने के लिए ईंधन और बिजली की बढ़ती खपत, सिंचाई के वैकल्पिक साधनों की व्यवस्था, ये सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के शोध पत्रों के अनुसार, कमजोर मानसून के कारण पैदा होने वाला यह कृषि संकट सीधे तौर पर खाद्य मुद्रास्फीति को एक से डेढ़ प्रतिशत तक बढ़ा देता है। जब किसान अधिक निवेश करते हैं और उत्पादन कम आता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कर्ज का जाल गहराने लगता है। इसका सामाजिक परिणाम भी अत्यंत गंभीर होता है, जिसके कारण रोजगार कम होते हैं, आय में गिरावट आती है और अंततः शहरों की ओर अनियोजित प्रवासन बढ़ता है, जो शहरी बुनियादी ढांचे और रोजगार बाजार पर नया दबाव पैदा करता है।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की नवीनतम रिपोर्टों से यह भी स्पष्ट होता है कि अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल-नीनो का चरित्र और भी विनाशकारी हो गया है। सुपर अल-नीनो का प्रभाव केवल सूखे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वातावरण में अत्यधिक गर्मी और नमी के कारण बेमौसम तेज बारिश, ओलावृष्टि और तीव्र लू जैसी चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि देश के कुछ हिस्सों में लंबे समय तक सूखा रहेगा, जबकि कुछ अन्य इलाकों में अचानक अत्यधिक वर्षा से बाढ़ का खतरा पैदा हो जाएगा। इस दोहरे खतरे का सामना करने के लिए नीतिगत तैयारी और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन दोनों की तत्काल आवश्यकता है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, ऐसे समय में देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से तीस प्रतिशत तक नीचे चला जाता है, जो खरीफ के बाद आने वाली रबी फसलों के साथ-साथ जल-विद्युत उत्पादन को भी संकट में डाल देता है। इसलिए जल-स्रोतों का रख-रखाव, तालाबों की मरम्मत, वर्षा जल संचयन का व्यापक प्रसार और छोटे सिंचाई नेटवर्क का जीर्णोद्धार तात्कालिक जीवन रेखा की तरह काम कर सकते हैं। इसके साथ ही, किसानों तक सटीक और समयानुकूल मौसमी पूर्वानुमान पहुंचाना आवश्यक है ताकि वे बुवाई का समय बदल सकें या फसलों का चयन मौसम के अनुकूल कर सकें।

दीर्घकालिक रणनीतियों के अंतर्गत नीति आयोग के सुझावों के आधार पर हमें कृषि में विविधीकरण को केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि नीति का केंद्र बनाना होगा। कम जल-उपयोग वाली फसलों और मोटे अनाजों को बढ़ावा देकर तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को अपनाकर न केवल पानी की बचत की जा सकती है, बल्कि फसल की पैदावार में भी स्थिरता लाई जा सकती है। हमारे कृषि अनुसंधान संस्थानों को चरम मौसम सहिष्णु बीज विकसित करने और उनका तेज वितरण सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। नीति निर्माताओं को त्वरित वित्तीय सहायता, प्रभावी फसल बीमा योजनाएं और राहत कार्यों के लिए बजटीय आवंटन को सुदृढ़ करना होगा। केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय ही जल स्रोतों के उचित वितरण और आपातकालीन खाद्य उपलब्धता को सुनिश्चित कर सकता है। ग्रामीण रोजगार योजनाओं को केवल आय का साधन मानने के बजाय उन्हें अनिवार्य रूप से जल-संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के कार्यों से जोड़ा जाना चाहिए।

यह याद रखना जरूरी है कि सुपर अल-नीनो केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि समूचे आर्थिक और सामाजिक तंत्र की परीक्षा लेने वाली आपदा है। इसलिए तैयारियां केवल कृषि मंत्रालय तक सीमित न होकर खाद्य वितरण, जनस्वास्थ्य, ऊर्जा आपूर्ति और ग्रामीण बैंकिंग सेवाओं तक विस्तृत होनी चाहिए। यदि हम पारदर्शी पानी प्रबंधन, जोखिम-आधारित बीमा और किसान-केंद्रित ऋण व्यवस्था जैसे नीतिगत ढांचे को मजबूत करते हैं, तो अल्पकालिक झटके भी देश को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाने में नाकाम रहेंगे। अंततः, इस खतरे को कम करने का रास्ता विज्ञान और नीति के कुशल मिलन से ही गुजरता है। भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन इसे इस बार जागरूक नीतियों, समयबद्ध कार्रवाई और स्थानीय भागीदारी के मजबूत संबल की जरूरत होगी, तभी हम इस बड़े संकट को टालने में सफल हो सकेंगे।

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