पिछले दिनों  गुजरात के नवसारी सहित कई शहरों में अचानक इतनी बरसात हुई कि शहर दरिया बन गए , जिस देश में अल नीनो असर के कारण कम बरसात की संभावना थी, वहाँ दस हजार किलोमीटर के बादल डेरा डाले हैं ।  पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन किस तरह मानसून को भयावह बना रहा है , यह लेख इसी वैज्ञानिक मसले पर है।

महा-बादलों की ज़द में भारत: गुजरात जल-प्रलय से देश के ख़तरे की घंटी

पंकज चतुर्वेदी

प्रशांत महासागर की अगाध गहराइयों में घटने वाली समुद्री तापीय घटनाओं से लेकर भारत के पश्चिमी तट पर बसे गुजरात के शहरों और गाँवों में हो रही अप्रत्याशित मूसलाधार बारिश तक, प्रकृति का एक बहुत ही जटिल और परस्पर जुड़ा हुआ वैज्ञानिक जाल देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ दिनों में नवसारी, वलसाड, सूरत और आसपास के क्षेत्रों में जिस प्रकार बादलों ने जल-प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न की है, वह केवल किसी स्थानीय मौसमी विसंगति का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे संपूर्ण एशिया महाद्वीप के ऊपर फैला एक विशालकाय वायुमंडलीय तंत्र और महासागरीय चक्र सक्रिय है। अंतरिक्ष में स्थापित मौसम उपग्रहों से प्राप्त ताज़ा तस्वीरों ने वैज्ञानिकों को भी आश्चर्यचकित कर दिया है, क्योंकि भारत के उत्तरी और पश्चिमी हिस्से से लेकर पूर्वी एशिया में दक्षिण कोरिया तक लगभग दस हजार किलोमीटर लंबी बादलों की एक अखंड पट्टी बन गई है। यह अभूतपूर्व मौसमी संरचना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि महासागरों के तापमान में आने वाले मामूली बदलाव भी किस तरह हजारों किलोमीटर दूर ज़मीन पर विनाशकारी बारिश और बाढ़ का कारण बन सकते हैं।

गुजरात में हाल ही में हुई अत्यधिक वर्षा के पीछे वैज्ञानिक कारणों की परतें अत्यंत व्यापक हैं। मुख्य रूप से प्रशांत महासागर में होने वाली एक दीर्घकालिक तापीय हलचल जिसे प्रशांत दशकीय दोलन कहा जाता है, इस समय अपने ऋणात्मक अथवा ठंडे दौर से गुजर रही है। जब यह दोलन ऋणात्मक अवस्था में होता है, तब उत्तरी-पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का पानी ठंडा रहता है जबकि पश्चिमी प्रशांत और हिंद महासागर का तापमान सामान्य से अधिक गरम हो जाता है। इस तापीय विषमता के कारण समुद्र की सतह से वाष्पीकरण की गति कई गुना बढ़ जाती है, जिससे वायुमंडल में विशाल मात्रा में जलवाष्प जमा होने लगती है। यही जलवाष्प मानसूनी हवाओं के साथ मिलकर भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ती है। जब यह प्रचुर नमी अरब सागर के ऊपर पहुँचती है, तो वहाँ पहले से मौजूद स्थानीय वायुमंडलीय चक्रवातीय भंवर और तटीय कम दबाव की पट्टियाँ इस नमी को एक जगह केंद्रित कर देती हैं। नवसारी और आसपास के इलाकों में यही स्थिति बनी जहाँ बादलों की विशाल परतें एक ही स्थान पर लंबे समय तक टिकी रहीं और कुछ ही घंटों में सैकड़ों मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।

उपग्रह चित्रों से सामने आया दस हजार किलोमीटर लंबा बादलों का घेरा यह स्पष्ट दर्शाता है कि मानसून अपने सबसे उग्र और व्यापक दौर में प्रवेश कर चुका है। इस विशालकाय मौसमी पट्टी में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ओर से उठने वाली नमी युक्त हवाओं का अनूठा संगम हो रहा है। जब दो विशाल महासागरों की नमी आपस में मिलती है और वायुमंडल के ऊपरी स्तरों में ठंडी हवाओं से टकराती है, तो बादलों का घनत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। वर्तमान में सामान्य दैनिक वर्षा की तुलना में पौने दो सौ प्रतिशत से भी अधिक वर्षा दर्ज की जा रही है, जो इस बात का संकेत है कि वायुमंडल में नमी धारण करने और उसे अचानक बरसाने की क्षमता अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी है। गुजरात की नदियाँ जैसे पूर्णा, अंबिका और कावेरी अपने जलग्रहण क्षेत्रों में हुई इस भीषण वर्षा के कारण उफान पर हैं, और जब यह जल प्रवाह समुद्र में ऊँचे ज्वार के समय पहुँचता है, तो समुद्र नदियों के पानी को वापस तट की ओर धकेलता है, जिससे निचले इलाकों में जलभराव का संकट कई गुना गंभीर हो जाता है।

यह मौसमी स्थिति केवल गुजरात तक सीमित रहने वाली नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों में देश के एक बड़े भूभाग को अति-भारी वर्षा के लिए पूरी तरह सतर्क और तैयार रहना होगा। उपग्रह चित्रों में दिख रही बादलों की विशाल पट्टी धीरे-धीरे उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के राज्यों की ओर खिसक रही है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और पूर्वोत्तर के राज्यों में वायुमंडलीय दबाव का संतुलन इस प्रकार बन रहा है कि वहाँ भी अल्प समय में अत्यधिक वर्षा होने की पूरी संभावना है। पहाडी राज्यों में अत्यधिक वर्षा का सीधा अर्थ है कि भूमि की जल सोखने की क्षमता समाप्त हो जाएगी, जिससे अचानक बाढ़, भूस्खलन और चट्टानों के खिसकने जैसी घटनाएँ तेज़ी से बढ़ेंगी। वहीं मैदानी इलाकों में नदियों के जलस्तर में अचानक वृद्धि होने से तटीय बस्तियों और कृषि भूमि पर जलप्लावन का खतरा मंडरा रहा है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पृथ्वी के वायुमंडल और महासागरों का यह अंतर्संबंध जलवायु परिवर्तन के व्यापक दुष्प्रभावों को रेखांकित करता है। महासागरों के औसतन बढ़ते तापमान और वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि के कारण वायुमंडल में नमी बनाए रखने की क्षमता में प्रति डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि पर लगभग सात प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब मानसून के दौरान बादल लंबे समय तक धीमी बारिश करने के बजाय एक ही स्थान पर अचानक और तीव्र रूप से अपना सारा जल गिरा देते हैं। यही कारण है कि आज देश के एक हिस्से में सूखा जैसी स्थिति दिखती है तो दूसरे हिस्से में कुछ ही घंटों में जलप्रलय का दृश्य उत्पन्न हो जाता है। गुजरात की घटना इसी बदलते मौसमी मिजाज का एक ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ पारंपरिक मानसूनी ढर्रे के विपरीत अत्यंत तीव्र और केंद्रित वर्षा की आवृत्ति बढ़ गई है।

आने वाले दिनों की मौसमी चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए देश के नागरिक प्रशासनिक तंत्र, आपदा प्रबंधन इकाइयों और आम जनता को वैज्ञानिक सतर्कता अपनानी होगी। जिन राज्यों में यह विशाल मौसमी तंत्र आगे बढ़ रहा है, वहाँ निचले इलाकों से लोगों की निकासी, नदियों के जलस्तर की निरंतर निगरानी और पहाड़ी मार्गों पर यात्रा में सावधानी बरतना नितांत आवश्यक है। किसानों को अपनी फसलों के जल निकास की उचित व्यवस्था करनी होगी, वहीं शहरी क्षेत्रों में नालों और जल निकासी मार्गों की सफाई को प्राथमिकता देनी होगी ताकि शहरों को जलमग्न होने से बचाया जा सके। प्रकृति की इस अभूतपूर्व हलचल और प्रशांत महासागर से उठने वाली इस वैश्विक मौसमी तरंग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिन पूरे देश के लिए अत्यंत संवेदनशील हैं। मौसमी पूर्वानुमानों को गंभीरता से लेना और आपदा की पूर्व तैयारी ही इस संभावित प्राकृतिक आपदा के प्रभाव को कम करने का एकमात्र वैज्ञानिक और व्यावहारिक मार्ग है।

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