रोहित कौशिक
जलवायु परिवर्तन के कारण पूरे विश्व में कई तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं। ये समस्याएं अंततः हमारी जिंदगी पर किसी न किसी रूप से अपना प्रभाव डाल रही हैं। कहीं अत्यधिक बारिश तबाही मचा रही है तो कहीं आग ने लोगों की जिंदगी खाक कर दी है। खबर है कि यूरोप में इस साल जंगलों की भीषण आग ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सवाल यह है कि साधन सम्पन्न होने के बावजूद इन देशों में आग क्यों लग रही है ? इसका सीधा सा अर्थ यह है कि जलवायु परिर्वतन का असर समृद्ध देशों पर भी उतना ही होता है जितना कि गरीब देशों में। यह अलग बात है कि साधन सम्पन्न देश जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हुई आपदा के बाद की स्थिति को ज्यादा बेहतर तरीके से संभाल लेते हैं। जलवायु परिवर्तन का असर इस कदर गंभीर हो गया है कि फ्रांस, स्पेन और ग्रीस जैसे देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। दक्षिणी यूरोप मुख्य रूप से फ्रांस, स्पेन, इटली और ग्रीस में भीषण आग और लू के कारण तीन लाख से ज्यादा लोगों और पर्यटकों को सुरक्षित जगहों पर शरण लेनी पड़ी है। सूचना है कि इस आपदा से यूरोप में 4,34,976 हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि तबाह हो चुकी है। आग की वजह से इस साल अब तक 1.79 करोड़ टन कार्बन वायुमंडल में उत्सर्जित हो चुकी है, जो सामान्य औसत से लगभग दोगुनी है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पूरे विश्व में आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इसके बावजूद विश्व की शक्तियां ऐसे गंभीर मुद्दों को छोड़कर विश्व युद्ध की स्थिति पैदा कर रही हैं। इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, यह सोचने का समय किसी के पास नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने का कोई एक कारण नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग कई कारणों से बढ़ती है। जाहिर है कि इन कारणों में युद्ध भी एक कारण है। विभिन्न मंचों पर पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बड़ी-बड़ी बात करने वाले देश क्या वास्तव में ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दों पर गंभीर है ? इन देशों का व्यवहार देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि ये देश ऐसे मुद्दों पर गंभीर हैं। यही कारण है कि अपनी नाक ऊंची रखने के चक्कर में ये देश पर्यावरण की स्थिति पर चिंतन न करके युद्ध को बढ़ावा दे रहे हैं। सवाल यह है कि कई देशों में आग लगने की घटनाएं क्यों हो रही है ? इसका असली कारण है कि इन देशों में लगातार पड़ रही भीषण गर्मी और लंबे सूखे ने जंगलों और घास के मैदानों को इतना शुष्क बना दिया है कि वे छोटी सी चिंगारी से भी आग पकड़ लेते हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इन देशों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे जमीन और पेड़-पौधों की नमी जल्दी खत्म हो रही है। सर्दियों में हुई बारिश से घास, झाड़ियां और छोटे पौधे तेजी से उगते हैं लेकिन जब गर्मियों में तापमान बढ़ता है तो यही पेड़-पौधे और घास सूखकर आग लगने का कारण बन जाती है। जंगलों में लगी आग सिर्फ पेड़ों को नहीं जलाती बल्कि करोड़ों टन कार्बन डाइऑक्साइड भी वातावरण में छोड़ती है। यह कार्बन डाइऑक्साइड धरती को और गर्म करती है। इससे भविष्य में हीटवेव और जंगल की आग का खतरा बढ़ जाता है। यह चक्र लगातार मजबूत होता रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा और उचित तरह से जंगलों का प्रबन्धन नहीं किया गया तो यूरोप सहित अन्य देशों में भी जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ेंगी। इन घटनाओं से केवल जंगल ही प्रभावित नहीं होंगे बल्कि इसका प्रभाव मानव बस्तियों पर भी पड़ेगा। इसका अर्थ यह है कि इसका प्रभाव कृषि, जैवविविधता और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप में कुल वनाग्नि की घटनाएं पहले की तुलना में कम हो सकती हैं लेकिन जो आग लग रही हैं, उसका आकार और विनाशकारी क्षमता लगातार बढ़ रही है।
यूरोप के कई देशों के जंगलों में लगी आग का कई तरह से विश्लेषण किया जा सकता है। ऐसी आग के लिए कई छोटे-छोटे कारण भी मौजूद होते ही हैं। लेकिन इस आग का असली कारण जलवायु परिवर्तन ही है। यह सही है कि इस दौर में जलवायु परिवर्तन को एक बड़ा मुद्दा बना दिया गया है लेकिन समझने वाली बात यह है कि क्या जमीन पर यह एक बड़ा मुद्दा बन पाया है। अगर सच्चे अर्थों में यह मुद्दा जमीन पर उतरता तो कई सुखद परिणाम प्राप्त हो सकते थे। हालांकि विदेशों में आम जनता पर्यावरण जैसे मुद्दों के प्रति गंभीर हो रही हैं लेकिन कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष अपने स्वार्थों को ज्यादा तरजीह देते हैं। यही कारण है कि पर्यावरण जैसे मुद्दों पर एक खोखले आदर्शवाद की स्थिति बनी रहती है। यूरोप मे लगी आग एक नए संकट की तरफ संकेत कर रही है। क्या वास्तव में हम इस संकट को समझ पाएंगे ?