सहायक नदियों के सूखने से गोमती सूखता आंचल
पंकज चतुर्वेदी
उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को अपने आंचल में समेटे बहने वाली गोमती नदी आज महज़ एक नदी नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी का जीवंत दस्तावेज़ बन चुकी है। पीलीभीत के माधोटांडा की फुलहर झील से निकलकर वाराणसी के पास कैथी में गंगा में विलीन होने वाली 941 किलोमीटर लंबी यह जलधारा कभी अवध की समृद्धि और पहचान का मुख्य आधार थी। आज वही गोमती अपनी ही सहायक नदियों के सूखने, अनियंत्रित भूजल दोहन और औद्योगिक एवं घरेलू सीवेज के भयावह प्रदूषण के कारण अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें गिन रही है। यह संकट केवल पानी की कमी का नहीं है, बल्कि उस पूरी सभ्यता, जैव विविधता और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के ढहने का संकेत है, जिसने सदियों से इस पूरे भूभाग को जीवन प्रदान किया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों की समितियों और राष्ट्रीय हरित अधिकरण की तीखी टिप्पणियों के बावजूद स्थिति सुधरने के बजाय बदतर होती जा रही है। गोमती के इस महासंकट को समझने के लिए हमें इसके मूल कारण यानी इसकी सहायक नदियों की दुर्दशा और इसके जलीय स्वास्थ्य के साथ किए गए खिलवाड़ का विस्तृत विश्लेषण करना होगा।
किसी भी मुख्य नदी का जीवन उसकी सहायक नदियों की जीवंतता पर निर्भर करता है, जो धमनियों की तरह मुख्य प्रवाह को रक्त यानी जल की निरंतर आपूर्ति करती हैं। गोमती नदी के संदर्भ में बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग द्वारा किया गया वैज्ञानिक अध्ययन दिल दहला देने वाला है। इस अध्ययन से यह स्थापित हुआ है कि गोमती की कुल 26 सहायक नदियों में से 22 नदियां पूरी तरह से सूख चुकी हैं। गछई, जोकनई, भैंसी, चुहा, अंडी, खौटीना, चितवा, गरेरा, सरायन, नाखा, अक्राड़ी, बेहता, कुकरैल, लोनी, असैना, रेत, कल्याणी, अराही, केंद्र, गोबारिया, सेवेई और पीली जैसी पारंपरिक जलधाराएं आज या तो पूरी तरह विलीन हो चुकी हैं या गंदे नालों और तालाबों के रूप में तब्दील हो गई हैं। केवल सई, कल्याणी, खौटीना और बेहता जैसी कुछ नदियों में ही आंशिक प्रवाह बचा है, वह भी बेहद पतली धार के रूप में। जब नदी की 85 प्रतिशत से अधिक धमनियां मृत हो चुकी हों, तो मुख्य नदी के प्रवाह का सिमटना स्वाभाविक है। यही कारण है कि पिछले कुछ दशकों में गोमती का वार्षिक प्रवाह ६० फीसदी तक घट गया है, जिसने इसे एक बारहमासी नदी से बदलकर एक मौसमी नदी के कगार पर ला खड़ा किया है।
इस विनाशकारी सुखाड़ के पीछे सबसे बड़ा कारण अंधाधुंध भूजल दोहन और जल पुनर्भरण की क्षमता में आई भारी गिरावट है। गोमती एक ऐसी नदी है जिसका मुख्य स्रोत कोई ग्लेशियर या बर्फ का पहाड़ नहीं है, बल्कि यह भूजल और वर्षा जल से पोषित होने वाली नदी है। मानसून के समय जब भारी वर्षा होती है, तो जमीन के नीचे के जलभृत यानी एक्विफर रिचार्ज होते हैं, और यही भूजल वर्ष के बाकी महीनों में ‘बेस फ्लो’ के रूप में गोमती को जीवित रखता है। लखनऊ और इसके आसपास के 11 जिलों में गोमती के पानी का 76 प्रतिशत हिस्सा वास्तव में भूजल से आता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्ष 1984 से 2015 के बीच सहायक नदियों के बेसिन में भूजल स्तर पांच मीटर से लेकर अठारह मीटर तक नीचे चला गया है। यह गिरावट लगभग 47 प्रतिशत है, जो यह दर्शाती है कि हम जमीन से जितना पानी निकाल रहे हैं, उसका आधा भी वापस जमीन में नहीं जा पा रहा है। कंक्रीट के बढ़ते जंगलों, तालाबों के अतिक्रमण और पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों के नष्ट होने से वर्षा जल सीधे बहकर बर्बाद हो जाता है, जिससे भूजल पुनर्भरण ठप हो गया है। जब एक्विफर खाली हो गए, तो नदियों को नीचे से मिलने वाला पानी बंद हो गया और वे एक-एक कर सूखती चली गईं।
नदी के मूल स्वरूप को बिगाड़ने में हमारी विकासवादी अदूरदर्शिता का भी बड़ा हाथ रहा है। नदी तट विकास के नाम पर बनाए गए डायफ्राम वॉल और कंक्रीट के सुंदरीकरण ने गोमती के प्राकृतिक रिवर सिस्टम को पूरी तरह तबाह कर दिया। लखनऊ में नदी के बीच में 16 मीटर गहरी डायफ्राम वॉल बनाकर रीचार्ज क्षेत्र को नदी के मुख्य प्रवाह से पूरी तरह अलग कर दिया गया। इस कृत्रिम अवरोध के कारण नदी का अपने प्राकृतिक तटों और भूमिगत जल स्रोतों से संपर्क टूट गया। इसके परिणामस्वरूप नदी में पानी जमा तो दिखने लगा, लेकिन वह स्थिर और मृत पानी बन गया, जिसमें प्रवाह की स्वाभाविक गति समाप्त हो गई। किसी भी नदी के लिए उसका प्रवाह ही उसकी आत्मा होती है। जब प्रवाह रुक जाता है, तो नदी की स्वतः स्वच्छ होने की क्षमता समाप्त हो जाती है और वह एक ठहरे हुए गंदे जलाशय में बदल जाती है। यही हश्र आज लखनऊ की गोमती का हो चुका है, जहां का पानी अब गहरे काले और मटमैले रंग में तब्दील हो गया है।
प्रवाह की इस कमी के बीच, नदी में गिरने वाले औद्योगिक कचरे और शहरी सीवेज ने गोमती को पूरी तरह से विषाक्त बना दिया है। पीलीभीत, शाहजानकारी, लखीमपुर, हरदोई, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, अयोध्या, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर जैसे ११ जिलों से गुजरते हुए गोमती में सैकड़ों बड़े नाले बिना किसी उपचार के सीधे गिरते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश डीपी सिंह की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी विस्तृत जांच में जो खुलासे किए हैं, वे आंखें खोलने वाले हैं। समिति ने गोमती के विभिन्न स्थलों से पानी के जो नमूने लिए, उनमें घुलित ऑक्सीजन यानी डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन की मात्रा शून्य पाई गई। किसी भी जलीय जीवन के लिए ऑक्सीजन का होना अनिवार्य है। जब ऑक्सीजन शून्य हो जाती है, तो नदी तकनीकी रूप से मृत घोषित हो जाती है। स्थिति इतनी भयावह है कि समिति को यह सख्त परामर्श जारी करना पड़ा कि लोग गोमती के पानी में स्नान करना तो दूर, उसके नजदीक टहलने से भी बचें, क्योंकि इसकी सड़न और बदबू से लोग गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं। यह हमारी सामूहिक चेतना पर एक गहरा तमाचा है कि जिस नदी को हम पूजते हैं, उसका पानी आज छूने योग्य भी नहीं बचा है।
इस पर्यावरणीय विफलता के पीछे प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार और राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी का एक लंबा इतिहास रहा है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाएं, जिनका मुख्य दायित्व पर्यावरण और नदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था, पूरी तरह से मूकदर्शक बनी रहीं। उन्होंने प्रदूषण फैलाने वाले नगर निगमों, नगर पालिकाओं और औद्योगिक इकाइयों पर न तो कोई भारी हर्जाना लगाया और न ही उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की। इसी कारण उच्च न्यायालय की समिति ने पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के तहत दोषी अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन चलाने की संस्तुति की है। इसके साथ ही, अनुपालन गारंटी के रूप में प्रदेश सरकार से 100 करोड़ रुपये जमा कराने और उत्तरदायी विभागों जैसे जल निगम, प्रदूषण बोर्ड और नगर निगमों पर करोड़ों रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना लगाने की सिफारिश की गई है। प्रशासनिक स्तर पर यह विफलता तब और स्पष्ट हो जाती है जब हम देखते हैं कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के दावे केवल कागजों पर सिमट कर रह जाते हैं और उनकी वास्तविक परिचालन क्षमता अत्यंत दयनीय होती है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या गोमती को इस मरणसन्न स्थिति से उबारा जा सकता है। इसका उत्तर केवल लोक-लुभावन सुंदरीकरण योजनाओं में नहीं, बल्कि एक समग्र, वैज्ञानिक और नदी-केंद्रित जल प्रबंधन योजना में छिपा है। सबसे पहले, गोमती की जीवन रेखा यानी उसकी 22 सूखी सहायक नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक युद्धस्तरीय अभियान चलाना होगा। इन सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में वृक्षारोपण, तालाबों की खुदाई और अतिक्रमण हटाकर वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना होगा ताकि भूजल स्तर को वापस ऊपर लाया जा सके। जब तक इन सहायक नदियों में पानी की एक-एक बूंद नहीं लौटेगी, तब तक मुख्य गोमती नदी में प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना असंभव है। इसके साथ ही, नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत सभी 11 जनपदों के जिलाधिकारियों को अविलंब विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर केंद्र सरकार को भेजनी चाहिए, ताकि गोमती में गिरने वाले हर छोटे-बड़े नाले के सीवेज को शत-प्रतिशत उपचारित करने के बाद ही नदी में डाला जाए। जब तक नदी में गिरने वाले कचरे पर पूरी तरह रोक नहीं लगती, तब तक सफाई के सारे प्रयास निष्प्रभावी रहेंगे।
नदी केवल पानी का बहता हुआ माध्यम नहीं है, बल्कि वह उस पूरे समाज की जीवन-प्रणाली है जो उसके किनारे बसती है। यदि गोमती पूरी तरह मृत हो गई, तो उत्तर प्रदेश के एक बड़े हिस्से का कृषि तंत्र, जलीय प्रजातियां, पक्षी और मानव स्वास्थ्य पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। भूजल की कमी से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पहले ही गंभीर रूप से प्रभावित हो चुका है और मछलियों जैसी कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। समय आ गया है कि हम नदियों को केवल उपभोग की वस्तु मानना बंद करें और उनके अधिकारों को मान्यता दें। नगर विकास, पर्यावरण और सिंचाई विभागों को आपसी समन्वय के साथ एक निश्चित समय सीमा के भीतर एनजीटी और अदालतों के निर्देशों को धरातल पर उतारना होगा। गोमती का यह क्रंदन वास्तव में हमारी आने वाली पीढ़ियों के संकट का संकेत है। यदि आज हम इस जीवनदायिनी के आंचल को स्वच्छ और अविरल बनाने में असफल रहे, तो इतिहास हमें एक ऐसी सभ्यता के रूप में याद रखेगा जिसने अपने ही हाथों अपनी सबसे सुंदर नदी की हत्या कर दी।