रोहित कौशिक
वैज्ञानिक कई वर्षों से यह चेतावनी दे रहे थे कि भविष्य में बढ़ते तापमान के कारण कई तरह के पर्यावरणीय बदलाव होंगे। इस तरह की चेतावनी किसी सतही अनुमान के कारण नहीं की जा रही थी, बल्कि इसके पीछे कुछ ठोस कारण थे। इसका अर्थ यह है कि कुछ ठोस और गंभीर अध्ययनों के कारण धरती का तापमान बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। अब यह अनुमान सही साबित हो रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि धरती का तापमान बढ़ने के इन अनुमानों को गंभीरता से नहीं लिया गया। ऐसा नहीं है कि किसी एक देश पर इस बदलाव का असर पड़ रहा है, बल्कि पूरा विश्व इस बदलाव से प्रभावित है। वातावरण का तापमान तो बढ़ ही रहा है, इसके साथ ही समुद्र का तापमान भी बढ़ रहा है। अटलांटिक तट और पश्चिमी भूमध्य सागर में काफी ज्यादा तपन रिकॉर्ड की गई है। इस वजह से समु्रदी लू भी चलने लगी हैं। जब ऐसी स्थिति बनती है तो इसका असर तटीय इलाकों पर ज्यादा पड़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पिछले तीन वर्षों में ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर अधिकांश महासागर सामान्य से 0.35 से लेकर 0.73 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहे हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि समु्रद का तापमान कम नहीं हुआ तो वातावरण में कई तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे। दरअसल महासागर पृथ्वी पर बढ़ने वाली अतिरिक्त गर्मी का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सोख लेते हैं। यही कारण है कि गर्म महासागर वातावरण में भी काफी समय तक गर्मी पैदा करते रहते हैं। इस प्रक्रिया से चक्रवात और तूफान अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और ज्यादा तबाही का कारण बनते हैं।
यह चिंता का विषय है कि तापमान बढ़ने से समुद्र का जलस्तर भी बढ़ता जा रहा है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने की चेतावनी भी काफी समय पहले से ही की जा रही है। तापमान बढ़ने से हिमखंडों के पिघलने की रफ्तार भी बढ़ रही है। इस गर्मी की वजह से प्रवाल भित्तियों और अन्य समुद्री जीवों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। एक अध्ययन में यह दावा किया गया है कि उमस भरी लू की आधे से ज्यादा घटनाएं इसलिए हो रही है क्योंकि समुद्र की सतह का तापमान बढ़ रहा है। अनुमान है कि भविष्य में उमस भरी लू की घटनाएं तेजी के साथ बढ़ेंगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्र ज्यादा नमी वातावरण में भेजता है। यह नमी जमीन पर आकर उमस को और ज्यादा बढ़ा देती है। इसी तरह भूमध्य रेखा के सुदूर क्षेत्रों में जमीन और समुद्र दोनों एक साथ गर्म होकर वायुमंडलीय पैटर्न के साथ मिलकर गर्मी को और ज्यादा बढ़ाते हैं। यही कारण है कि बढ़ता तापमान हमारे पूरे वातावरण पर अपना प्रभाव डालता है। सवाल यह है कि क्या सच्चे अर्थों में बढ़ते तापमान को कम करने के लिए कुछ प्रयास हो रहे हैं ? निश्चित रूप से धरती का तापमान कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास हो रहे हैं लेकिन कई बार इन प्रयासों में विरोधाभास दिखाई देता है। जब इस तरह के कई विरोधाभास मिल जाते हैं तो धरती का तापमान कम करने के प्रयासों को धक्का लगता है। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर कई सम्मेलन होते रहते हैं। लेकिन क्या इन सम्मेलनों में हुए विचार-विमर्श पर पूरी तरह से अमल हो पाता है ? निश्चित रूप से ऐसे विचार-विमर्श के क्रियान्वयन में कई स्तरों पर कमियां रह जाती हैं।
दरअसल बढ़ते तापमान को लेकर कई तरह के अध्ययन प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में यूरोपियन यूनियन की जलवायु निगरानी संस्था ‘कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस’ ने अपने ताजा अध्ययन में बताया है कि जुलाई 2026 और जुलाई 2024 संयुक्त रूप से जलवायु इतिहास के दूसरे सबसे गर्म जुलाई रहे। इससे पहले जलवायु इतिहास का सबसे गर्म जुलाई 2023 में दर्ज किया गया था। चिंता की बात यह है कि फ्रांस, स्पेन, इंग्लैंड और आयरलैंड समेत पश्चिमी यूरोप के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी ज्यादा रहा। इसके विपरीत पूर्वी यूरोप और स्कैंडिनेविया के बड़े हिस्से में तापमान सामान्य से कम दर्ज किया गया। इसके साथ ही फ्रांस, स्पेन, जर्मनी के कुछ हिस्सों और ब्रिटेन में बारिश और मिट्टी में मौजूद नमी में काफी कमी देखी गई। पश्चिमी यूरोप में जुलाई के दौरान जंगलों में लगी आग के कारण पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ। इस आग के कारण जैवविविधता तो नष्ट हुई ही, खतरनाक उत्सर्जन ने भी वातावरण को प्रदूषित किया। तापमान बढ़ने के कारण यूरोप में कई नदियों का जलस्तर भी प्रभावित हुआ। सीन, राइन और डेन्यूब जैसी कई नदियों का जलस्तर पहले की अपेक्षा घट गया। जाहिर है कि जब किसी भी नदी का जलस्तर घटता है तो इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। दरअसल जलवायु परिवर्तन का असर किसी एक रूप में सामने नहीं आता है। यही कारण है कि बाल्टिक देशों, फिनलैंड, तुर्की के कुछ भागों, ग्रीस, पूर्वी यूक्रेन और पश्चिमी रूस के बड़े क्षेत्रों में अधिक बारिश हुई। जिस वजह से बाढ़ जैसी आपदाओं ने भी कई तरह की समस्याएं पैदा कीं। बहरहाल बढ़ते तापमान का पर्यावरण पर असर अब गंभीरता के साथ दिखने लगा है। क्या हम अभी भी इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने के लिए तैयार हैं ?