© UNDP मध्य एशिया का अराल सागर अब लगभग सूख चुका है.
उत्तरी केनया में एक पशुपालक बारिश के इन्तज़ार में आसमान पर नज़रें टिकाए हुए है. बारिश न होने से चरागाह सूख रहे हैं और उसके पशुओं के लिए चारा लगातार कम होता जा रहा है.
यह समस्या केवल केनया तक सीमित नहीं है. अफ़्रीका के घास के मैदानों से लेकर मध्य एशिया के नमक से ढके इलाक़ों तक, लाखों लोगों की आजीविका चरागाह भूमि पर निर्भर है – एक ऐसी भूमि, जिसकी अहमियत अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दी जाती है.
चरागाह क्या हैं और क्यों महत्वपूर्ण हैं?
चरागाह भूमि, अंटार्कटिका को छोड़कर, हर महाद्वीप में पाई जाती है. इसमें घास के मैदान, झाड़ीदार क्षेत्र और शुष्क भूमि शामिल हैं. यहाँ आम तौर पर पारम्परिक खेती नहीं होती, लेकिन दुनिया की खाद्य व्यवस्था में इनकी अहम भूमिका है.
- 2 अरब लोग भोजन, पशुधन और आजीविका के लिए चरागाहों पर निर्भर हैं.
- दुनिया के पशुधन का लगभग 70 प्रतिशत चारा इन्हीं क्षेत्रों से मिलता है.
- लेकिन लगभग 40 प्रतिशत चरागाह भूमि पहले ही क्षरित हो चुकी है या उसके ख़तरे में है. सूखा, अत्यधिक चराई और लम्बे समय से हुई उपेक्षा इसके प्रमुख कारण हैं.
जब कोई चरागाह भूमि नष्ट होती है, तो यह केवल पर्यावरण का नुक़सान नहीं होता. इसका सीधा असर लोगों के जीवन पर पड़ता है – किसी परिवार के पशुओं के लिए चारा कम पड़ने लगता है, बाज़ार में बेचने के लिए पशु घट जाते हैं और समुदाय की खाद्य सुरक्षा कमज़ोर होने लगती है.
तीन देश, एक चेतावनी
बोत्सवाना
दक्षिणी अफ़्रीका के बोत्सवाना का बड़ा हिस्सा चरागाहों से ढका है. गोमांस निर्यात से लेकर सफ़ारी पर्यटन तक, देश की अर्थव्यवस्था में इनकी अहम भूमिका है.
लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं था कि इन चरागाहों की स्थिति वास्तव में कैसी है. हाल में किए गए देशव्यापी पारिस्थितिकी तंत्र आकलन से एक चिन्ताजनक तस्वीर सामने आई.
आक्रामक पौधों के फैलाव और लगातार गम्भीर होते सूखे के कारण घास के मैदान सिकुड़ रहे हैं और भूमि को दोबारा स्वस्थ होने का पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है.
हालाँकि, आकलन में यह भी पाया गया कि जहाँ पारम्परिक और समुदाय-आधारित भूमि प्रबन्धन मज़बूत है, वहाँ चरागाहों की स्थिति बेहतर है. इससे स्थानीय समुदायों के ज्ञान और अनुभव की अहमियत उजागर होती है.
कज़ाख़स्तान
मध्य एशिया का अराल सागर कभी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी झील था, लेकिन अब इसका अधिकाँश हिस्सा सूख चुका है. इसकी जगह लगभग 54 लाख हैक्टेयर में फैला नमक का रेगिस्तान रह गया है.
पास के किज़िलोर्डा क्षेत्र में अब 80 प्रतिशत से अधिक चरागाह क्षरित हो चुके हैं, और विषैली धूल भरी आँधियों के कारण नमक हज़ारों किलोमीटर दूर तक फैल रहा है.
यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि किसी एक जगह की पर्यावरणीय आपदा का असर बहुत दूर तक भूमि, पशुधन और लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है.
केनया
उत्तरी केनया की मार्साबिट काउंटी में चालबी रेगिस्तान स्थित है. 1990 से उपलब्ध उपग्रह आँकड़े बताते हैं कि यहाँ घास के मैदान धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदल रहे हैं.
अगर यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले दशकों में रेगिस्तान का क्षेत्रफल दोगुना हो सकता है. इससे वे चरागाह भी ख़तरे में पड़ सकते हैं, जिन पर स्थानीय पशुपालक समुदाय पीढ़ियों से निर्भर रहे हैं.
इससे निपटने के लिए क्या किया जा रहा है?
तीनों देशों में किए जा रहे प्रयासों में एक समान रुझान दिखता है – वैज्ञानिक आँकड़ों के साथ स्थानीय लोगों के ज्ञान और अनुभव का भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
- बोत्सवाना में 2,000 से अधिक लोगों और संस्थाओं की भागेदारी से राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र आकलन तैयार किया गया. इनमें सरकारी संस्थाएँ, शोधकर्ता और पारम्परिक ज्ञान रखने वाले समुदाय शामिल थे. इस आकलन से भविष्य की भूमि नीतियाँ तय करने के लिए ठोस साक्ष्य और जानकारी उपलब्ध हुई.
- कज़ाख़स्तान में जलवायु, भूमि और जल के आपसी सम्बन्धों का विस्तृत अध्ययन किया गया है. इसके आधार पर चरागाहों की बहाली और सिंचाई की योजनाएँ बनाई जा रही हैं. साथ ही, सूख चुके अराल सागर के तल पर सैक्सौल के पेड़ लगाए जा रहे हैं. अब तक 3 लाख 37 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्र में यह काम हो चुका है और 2030 तक 11 लाख हैक्टेयर का लक्ष्य है.
- केनया में 33 वर्षों के उपग्रह आँकड़ों को उन मूलनिवासी बुज़ुर्गों की यादों और अनुभवों से जोड़ा गया, जिन्होंने देखा है कि समय के साथ यह भूमि किस तरह बदली है. इन जानकारियों के आधार पर व्यावहारिक उपाय तैयार किए जा रहे हैं – कलाचा में बाढ़ के पानी का रुख़ मोड़ने के उपाय किए गए हैं, वनस्पति को फिर से उगाने के लिए प्रायोगिक क्षेत्र बनाए गए हैं और स्थानीय समुदायों को बदलावों की निगरानी करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
प्रमुख निष्कर्ष
एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर बसे इन इलाक़ों से एक समान सीख मिलती है: चरागाहों की बहाली तभी सफल और टिकाऊ होती है, जब वैज्ञानिक आँकड़ों के साथ स्थानीय लोगों के ज्ञान और अनुभव को भी महत्व दिया जाए. केवल आँकड़े पर्याप्त नहीं हैं – स्थानीय भागेदारी, भरोसा तथा ज़मीनी समझ भी उतनी ही ज़रूरी है.
बारिश की आस में आसमान देख रहे उस पशुपालक के लिए, यही मेल उसके पशुधन और आजीविका के भविष्य का फ़ैसला कर सकता है.
उलानबटार की राह पर
चरागाहों के सामने बढ़ती इन चुनौतियों पर 17 अगस्त से मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण सम्मेलन में चर्चा की जाएगी.
जैवविविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवा नेटवर्क (BES-Net), संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की ‘प्रकृति संरक्षण संकल्प’ पहल का एक प्रमुख कार्यक्रम है. इसका उद्देश्य प्रकृति की रक्षा और क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के प्रयासों को मज़बूत करना है.
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