कश्मीर का सेब: मुनाफे की चमक के पीछे छिपा जानलेवा जहर

पंकज चतुर्वेदी

सेब की खेती में रसायनों का यह बढ़ता उपयोग बागवानों की उस बेचैनी का नतीजा है जो अल्पकालिक लाभ और बेहतर पैदावार के चक्कर में अंधाधुंध छिड़काव कर रहे हैं। कभी साल में तीन-चार बार होने वाला छिड़काव आज पंद्रह से बीस बार तक पहुंच गया है। समस्या तब और विकराल हो जाती है जब बागवान कृषि विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक छिड़काव कार्यक्रमों को नजरअंदाज कर अपनी मर्जी से कई रसायनों का मिश्रण बनाकर पेड़ों पर उड़ेल देते हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार, घाटी के कुछ क्षेत्रों में कीटनाशकों का उपयोग अनुशंसित मात्रा से कहीं अधिक है, जो सीधे तौर पर मिट्टी की उर्वरता और भूजल की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। बाजार में नकली और बिना मानक वाले कीटनाशकों की व्यापक उपलब्धता ने इस समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है, जिससे न केवल मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट हो रही है बल्कि वह पानी भी प्रदूषित हो रहा है जिसे पीकर अगली पीढ़ी बड़ी हो रही है।

इस पूरे तंत्र में जो मानवीय कीमत चुकानी पड़ रही है, वह अब अनकही नहीं रही। खेतों में इन रसायनों का छिड़काव करने वाले किसान खुद सबसे पहले इसके प्रभाव में आ रहे हैं। बिना किसी सुरक्षा उपकरण के, इन जहरीले घोलों के सीधे संपर्क में आने से किसानों में श्वसन तंत्र की बीमारियां, त्वचा के गंभीर संक्रमण और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। विभिन्न अध्ययनों और स्थानीय डॉक्टरों के पास आने वाले मामलों में कैंसर की बढ़ती दर यह बताने के लिए पर्याप्त है कि खेतों का जहर अब घरों के भीतर तक पहुंच चुका है। बात केवल किसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन परिवारों और बच्चों के लिए भी चिंता का विषय है जो इन बागानों के इर्द-गिर्द सांस लेते हैं और रसायनों से दूषित हवा और पानी का सेवन करते हैं।

वैज्ञानिक शोध यह स्पष्ट करते हैं कि लगातार कीटनाशकों के संपर्क में रहने से अंतःस्रावी ग्रंथियों (हार्मोनल सिस्टम) में व्यवधान उत्पन्न होता है, जिससे प्रजनन क्षमता में कमी, असमय गर्भपात और बच्चों में विकासात्मक समस्याएं देखने को मिल रही हैं। कश्मीर के कुछ बागवानी क्षेत्रों में हुए अनौपचारिक सर्वेक्षणों में पाया गया है कि कीटनाशक छिड़काव वाले परिवारों में पुरानी बीमारियों और कैंसर के मामलों में सामान्य आबादी की तुलना में कहीं अधिक वृद्धि है। यह एक ‘खामोश महामारी’ है जो कश्मीर की आने वाली पीढ़ी को खोखला कर रही है।

जो फल हम बाजार से खरीदकर अपने स्वास्थ्य के लिए उपयोग करते हैं, वह भी कीटनाशकों के अंशों के साथ हम तक पहुंच रहा है। यह फल पोषण देने के बजाय बीमारियों का संवाहक बन रहा है, जिससे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर भी सीधा असर पड़ रहा है। कीटनाशकों के अवशेष न केवल फल की बाहरी सतह पर, बल्कि उसके गूदे के भीतर भी पहुंच रहे हैं, जिन्हें धोकर या छीलकर भी पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता। आर्थिक लाभ की इस दौड़ में मानवीय जीवन का महत्व गौण हो गया है। आज जरूरत इस बात की है कि हम कृषि को स्वास्थ्य से अलग करके देखना बंद करें। यदि मुनाफे की चमक को बरकरार रखने के लिए कैंसर और शुरुआती मृत्यु की कीमत चुकानी पड़े, तो यह विकास नहीं बल्कि विनाश है।

कीटनाशकों का यह अंधाधुंध प्रयोग केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी एक बड़ा खतरा है। मिट्टी के मित्र कीट और सूक्ष्मजीव, जो मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखते हैं, इन रसायनों के कारण मर रहे हैं। इससे मिट्टी बंजर हो रही है और भविष्य में उसी जमीन पर बिना रसायनों के खेती करना नामुमकिन होता जा रहा है। मधुमक्खियों और अन्य परागणकों की संख्या में आई कमी सीधे तौर पर सेब की पैदावार को भविष्य में कम कर सकती है, जो एक बड़ा आर्थिक संकट बन सकता है।

इस दिशा में सुधार के लिए कठोर नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। सरकार को कीटनाशकों की बिक्री पर सख्त निगरानी रखनी होगी और नकली उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला को जड़ से खत्म करना होगा। बागवानों को एकीकृत कीट प्रबंधन की दिशा में ले जाना होगा, जहां रसायनों की जगह जैविक और प्राकृतिक तरीकों को प्राथमिकता दी जाए। यह प्रक्रिया धीमी जरूर हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ के लिए यही एकमात्र रास्ता है। किसानों को जैविक खेती की ओर प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक अनुदान और प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी होगी ताकि वे रसायनों के मोह से बाहर निकल सकें।

इसके साथ ही, एक व्यापक स्वास्थ्य निगरानी कार्यक्रम शुरू करना अनिवार्य है, जो इन क्षेत्रों में बीमारियों के पैटर्न को समझे और प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराए। पूरे कश्मीर घाटी में हर जिले के स्वास्थ्य केंद्रों में कीटनाशक से प्रभावित मरीजों के डेटा को संग्रहित करना चाहिए ताकि बीमारी के क्लस्टर्स की पहचान हो सके। कश्मीर का सेब घाटी का गौरव है, लेकिन इस गौरव की रक्षा तभी संभव है जब हम खेती के तरीके बदलें और रसायनों की इस अंधी दौड़ को थामें। समय आ गया है कि हम आर्थिक आंकड़ों की चकाचौंध से बाहर निकलकर जीवन की रक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाएं, अन्यथा यह सेब आने वाली पीढ़ियों के लिए महज एक जहरीली विरासत बनकर रह जाएगा। हमें अब यह तय करना होगा कि हम क्या चाहते हैं—बीमारियों से भरा बड़ा उत्पादन या स्वस्थ लोगों के साथ एक टिकाऊ भविष्य?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *