पंकज चतुर्वेदी
नेपाल की धरती पर हाल ही में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। जब एक हिमालयी देश अपनी उजड़ी हुई बस्तियों, टूटे हुए पुलों और तबाह हुई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने मुआवजे की मांग रखता है, तो यह केवल एक देश की पुकार नहीं रह जाती, बल्कि यह ग्लोबल साउथ की उस लंबी फेहरिस्त की आवाज बन जाती है जो बिना किसी गलती के ग्लोबल वार्मिंग की सबसे भारी कीमत चुका रही है। नेपाल जैसे देशों ने कभी बड़े पैमाने पर कार्बन का उत्सर्जन नहीं किया, उनके यहाँ उद्योग-धंधे वह प्रदूषण नहीं फैलाते जो पश्चिमी या विकसित देशों में दशकों से चले आ रहे हैं, फिर भी प्रकृति के इस कहर का सबसे बड़ा दंश उन्हें ही झेलना पड़ रहा है। नेपाल की यह मुखर मांग अब पूरी दुनिया के सामने यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर इस तबाही का जिम्मेदार कौन है और क्या पीड़ित देशों को उनके नुकसान का हक मिलना चाहिए या नहीं।
जलवायु परिवर्तन का संकट अब भविष्य की कोई काल्पनिक चेतावनी नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान का एक खौफनाक सच बन चुका है। वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगातार ऊपर जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप महासागर गर्म हो रहे हैं, मौसम का चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है और अति-वृष्टि, सूखा, चक्रवात तथा बादलों के फटने की घटनाएं आम हो गई हैं। दुनिया भर में जलवायु आपदाओं के कारण हर साल सैकड़ों अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है और विकासशील देशों में यह नुकसान उनकी कुल राष्ट्रीय आय का एक बड़ा हिस्सा निगल जाता है। विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि यदि तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में करोड़ों लोगों को अपने घर-बार छोड़कर जलवायु शरणार्थी बनने पर मजबूर होना पड़ेगा। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसमें उजड़ते हुए खेत, टूटते हुए मकान और उन अनगिनत इंसानों के आंसू हैं जिन्होंने अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बनाई थी और एक झटके में सब कुछ खो दिया।
इस पूरे संकट के केंद्र में एक बहुत बड़ा पाखंड छिपा हुआ है, जिसे अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐतिहासिक रूप से जिन विकसित देशों ने अपने कारखानों और आधुनिक जीवनशैली से इस धरती के पर्यावरण को सबसे ज्यादा प्रदूषित किया, वे आज जब विकासशील देशों को मदद देने की बात आती है, तो अपने हाथ पीछे खींच लेते हैं। वे इसे दान या सहायता का नाम देते हैं, जबकि पर्यावरण और अर्थशास्त्र के जानकारों के अनुसार यह किसी भी सूरत में दान नहीं, बल्कि ऐतिहासिक कर्ज और मुआवजे की अदायगी है। जिन देशों ने सदियों तक पर्यावरण की कीमत पर अपनी तिजोरियां भरी हैं, उनकी नैतिक और विधिक जिम्मेदारी बनती है कि वे उन देशों को आर्थिक संबल दें जो उनके किए गए प्रदूषण की भारी कीमत चुका रहे हैं। एशिया और अफ्रीका के कई ऐसे देश हैं जो लगातार सूखे, चक्रवातों और बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं, उनकी कृषि व्यवस्था बर्बाद हो रही है, खाद्यान्न सुरक्षा खतरे में पड़ रही है और बुनियादी ढांचा हर साल धराशायी हो जाता है। ऐसे में यदि अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां और अमीर देश इस तबाही को केवल प्राकृतिक आपदा मानकर पल्ला झाड़ते रहेंगे, तो यह मानवता के साथ सबसे बड़ा छल होगा।
इस मानवीय और आर्थिक संकट से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ नए प्रबंध जरूर किए गए हैं, लेकिन वे जमीनी हकीकत के मुकाबले अभी बहुत नाकाफी साबित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क के अंतर्गत स्थापित ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ यानी हानि और क्षति कोष को इसी उद्देश्य के लिए बनाया गया था ताकि विकासशील देशों को उन अपरिवर्तनीय नुकसानों की भरपाई मिल सके जिन्हें अनुकूलन उपायों से टाला नहीं जा सकता। इसके अलावा ग्रीन क्लाइमेट फंड जैसे बड़े वैश्विक कोष भी काम कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करना है। इन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं का मूल उद्देश्य यह था कि जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से पर्यावरण को सबसे ज्यादा प्रदूषित किया है, वे एक निश्चित वित्तीय योगदान दें ताकि गरीब और संवेदनशील देश इस आपदा के दौर में अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल सकें।
लेकिन विडंबना यह है कि इन फंडों के होने के बावजूद जमीन पर पीड़ितों तक मदद पहुंचना लोहे के चने चबाने जैसा कठिन साबित हो रहा है। मुआवजा मिलने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अमीर और विकसित देशों की वह उदासीनता है जो अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को स्वीकार करने से कतराते हैं। वे अक्सर जलवायु वित्त के नाम पर जो पैसे देते हैं, वे सहायता या अनुदान के रूप में न होकर ऋण के जाल में उलझे होते हैं। यदि कोई देश पहले से ही भीषण आपदा के कारण आर्थिक तंगी से गुजर रहा है और आप उसे राहत के नाम पर कर्ज थमा देते हैं, तो यह उसकी अर्थव्यवस्था के लिए मरहम नहीं बल्कि जहर का काम करता है। इसके अलावा, इन अंतरराष्ट्रीय फंडों की जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाएं और शर्तें इतनी लंबी और पेचीदा होती हैं कि संकट के समय जब तुरंत राहत की जरूरत होती है, तब कागजी औपचारिकताओं को पूरा करने में ही महीने और साल बीत जाते हैं।
इस पूरी वैश्विक व्यवस्था में पारदर्शिता की भारी कमी है और धन का वितरण अक्सर राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर तय होता है, न कि वास्तविक जरूरत और संवेदनशीलता के आधार पर। नेपाल जैसे देश जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर न्याय की गुहार लगाते हैं, तो उन्हें लंबी कतार में खड़ा कर दिया जाता है, जबकि बड़े उत्सर्जक देश अपने वादों से मुकरते नजर आते हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस दोहरे रवैये को छोड़कर जलवायु मुआवजे को एक एहसान के बजाय ऐतिहासिक कर्ज और कानूनी बाध्यता के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, तब तक नेपाल जैसी त्रासदियों से जूझ रहे देशों को वास्तविक न्याय मिल पाना असंभव बना रहेगा।