धीरेन्द्र त्रिपाठी , सहायक संपादक , www. indiaclimatechange.com
सितंबर 2026 में बंगाल की खाड़ी के ऊपर एक मजबूत मौसम प्रणाली (Weather System) विकसित हुई, जिसे व्यापक रूप से ‘अर्नब‘ (Cyclone Arnab) के नाम से जाना गया। यह नाम हिंद महासागर क्षेत्र की नामकरण सूची के तहत बांग्लादेश द्वारा दिया गया था। हालाँकि, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार वैज्ञानिक रूप से यह प्रणाली समुद्र में पूरी तरह चक्रवात की सीमा (62 किमी/घंटा से अधिक की सतही हवाओं) को छूने के बजाय एक ‘गहरे अवदाब‘ (Deep Depression) के रूप में तट से टकराई। इसके बावजूद, तट से टकराने और भूभाग में प्रवेश करने के बाद इसने चक्रवाती तूफान जैसा ही भीषण प्रभाव दिखाया।
यह घटना दर्शाती है कि केवल नाम या श्रेणी ही नहीं, बल्कि मौसम प्रणालियों से जुड़ी बारिश और हवाओं का फैलाव कितना विनाशकारी हो सकता है।
1. अर्नब का भारत पर प्रभाव
तटीय इलाकों से लेकर मध्य और उत्तर भारत के मैदानी भागों तक इस प्रणाली का व्यापक असर देखा गया:
तटीय राज्यों पर मुख्य प्रभाव (ओडिशा एवं आंध्र प्रदेश):
- लैंडफॉल व हवाएँ: यह प्रणाली उत्तर आंध्र प्रदेश और दक्षिण ओडिशा तट (कलिंगपट्टनम के पास) पर 55 से 75 किमी/घंटा की रफ्तार की हवाओं के साथ टकराई।
- मलकानगिरी और तटीय ओडिशा में तबाही: ओडिशा के मलकानगिरी, गंजम, गजपति और कोरापुट जिलों में मूसलाधार बारिश से नदियाँ उफान पर आ गईं। मलकानगिरी में पुलों के ऊपर पानी बहने से राष्ट्रीय राजमार्ग-326 पूरी तरह ठप हो गया।
- जनजीवन और अवसंरचना: भारी बारिश के कारण कई जगह भूस्खलन हुआ, पेड़ उखड़ गए, कच्चे मकान क्षतिग्रस्त हुए और बिजली सेवा बाधित हुई। ओडिशा सरकार ने एहतियात के तौर पर 10 जिलों में स्कूल बंद किए और हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया।
- मछुआरे और तटीय आजीविका: भद्रक और आसपास के तटीय इलाकों में ऊंची लहरों के कारण दर्जनों नावें क्षतिग्रस्त हो गईं और समुद्र में जाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
मध्य व उत्तर भारत में फैलाव:
तट पार करने के बाद यह प्रणाली छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ी।
उत्तर प्रदेश और बिहार में मूसलाधार बारिश ने नदियों के जलस्तर को बढ़ा दिया, जिससे निचले इलाकों में जलभराव और अंतिम चरण में खड़ी धान की फसल को व्यापक नुकसान पहुँचा है।
2. चक्रवात / प्रणाली की समय-अवधि (Timeline)
3. इस घटना में जलवायु परिवर्तन का रोल
‘अर्नब’ जैसी मौसम प्रणालियों के बार-बार बनने, उनके असामान्य व्यवहार और अत्यधिक तबाही मचाने के पीछे वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Global Climate Change) की स्पष्ट भूमिका है:
- समुद्र की सतह का उच्च तापमान (Sea Surface Temperature): वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण बंगाल की खाड़ी का जल तापमान लगातार 28°-30°C से ऊपर बना रहता है। गर्म समुद्र पानी के वाष्पीकरण और ऊष्मा (Latent Heat) को बढ़ाकर तूफानों को तेजी से ऊर्जा प्रदान करते हैं।
- अत्यधिक तीव्र वर्षा (Extreme Precipitation): जलवायु विज्ञान के अनुसार, तापमान में प्रत्येक 1°C की वृद्धि से हवा की नमी सोखने की क्षमता लगभग 7% बढ़ जाती है। यही कारण है कि भले ही कोई प्रणाली पूर्ण ‘सुपर साइक्लोन’ न बने, लेकिन उससे होने वाली बारिश अचानक बाढ़ (Flash Floods) और भूस्खलन का कारण बनती है।
- मानसून वापसी के समय असामान्य प्रणालियाँ: सितंबर का अंतिम सप्ताह आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी का समय होता है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून के पैटर्न में अनियमितता आई है, जिससे मानसून उत्तर भारत से देर से लौट रहा है और बंगाल की खाड़ी में इस तरह की शक्तिशाली प्रणालियाँ बन रही हैं।
- भूभाग पर लंबे समय तक टिकना: ग्लोबल वार्मिंग के कारण वायुमंडलीय तरंगों (Jet Streams) की गति धीमी हुई है, जिससे ऐसी मौसम प्रणालियाँ तट पार करने के बाद तेजी से गायब होने के बजाय भूभाग के ऊपर धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं और कई राज्यों में लगातार बारिश का कहर ढाती हैं।
| मुख्य निष्कर्ष जलवायु परिवर्तन के कारण अब ‘कम दबाव’ या ‘गहरे अवदाब’ वाली प्रणालियाँ भी पूर्ण चक्रवात की तरह तबाही मचाने की क्षमता रखती हैं। केवल चक्रवात श्रेणी के नाम पर निर्भर रहने के बजाय वर्षा की तीव्रता और क्षेत्रीय प्रभाव के आधार पर आपदा तैयारी आवश्यक है। |
निष्कर्ष एवं भावी राह
अर्नब (गहरे अवदाब) जैसी घटनाएँ यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि भविष्य में चक्रवातों और मौसमी आपदाओं का खतरा केवल तटीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से कमजोर प्रणालियाँ भी भूभाग के अंदरूनी हिस्सों तक अत्यधिक वर्षा और तबाही ला सकती हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System), तटवर्ती व मैदानी बुनियादी ढाँचे (Resilient Infrastructure) को मजबूत करने तथा जलवायु-अनुकूल आपदा प्रबंधन रणनीतियों को और अधिक सशक्त करने की तत्काल आवश्यकता है।