सभ्यता और संस्कृति का जीवंत इतिहास रही नदियों के संरक्षण और उनकी महत्ता को रेखांकित करने के लिए दुर्गावती रामनाथ शिक्षा चिकित्सा न्यास द्वारा ‘एक शाम नदी के नाम’ कार्यक्रम का बेहद गरिमामयी आयोजन किया गया। इस वैचारिक और सांस्कृतिक गोष्ठी में प्रोफेसर से लेकर छात्र-छात्राओं तक ने नदियों और मानवीय सभ्यता के अटूट अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए।
गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. संजीव कुमार दुबे ने इस अवसर पर एक बेहद मार्मिक और विचारणीय संदेश दिया कि “जीवन दायिनी नदियों के किनारे केवल तर्पण और विसर्जन के लिए नहीं बल्कि अपनी संस्कृति और पूर्वजों के इतिहास से संवाद के लिए जाना चाहिए। मनुष्यता से नदी के रिश्ते को बचाए रखने के लिए नदियों का संरक्षण ज़रूरी है।” कार्यक्रम की शुरुआत में ड्रीम ट्रस्ट की अध्यक्ष ममता दुबे ने सभी आगंतुक अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया, जिसके बाद विभिन्न विभागों से आए विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने कविता, गीत और लोकगीतों की एक से बढ़कर एक संगीतमय प्रस्तुतियाँ देकर इस शाम को यादगार बना दिया।
कार्यक्रम को गति देते हुए शोधार्थी रोहन ने इसका कुशल संचालन किया और प्रकृति तथा मानव सभ्यता के अटूट संबंध को सामने रखा। उन्होंने आधुनिकता के कारण पैदा हुए सांस्कृतिक संकट की ओर सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए गोविंद निषाद की बेहद संवेदनशील कविता ‘नदियों का किनारे’ से कार्यक्रम का आगाज़ किया। इस कविता के माध्यम से यह संदेश गूंजा कि नदियों के किनारे आते ही स्मृतियों में वे पुरखे उभर आते हैं जो न जाने कब से यहाँ मछलियाँ मारते आए हैं, नाव चलाते आए हैं और अपने दो जून की रोटी कमाते आए हैं। यह प्रस्तुति यह सोचने पर मजबूर कर गई कि हमारे पूर्वजों की आजीविका, पहचान और संस्कृति पूरी तरह नदियों पर ही आश्रित थी, इसलिए नदी का मरना केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है बल्कि हमारी जड़ों का हमेशा के लिए खत्म हो जाना है और इस प्रकार नदी को बचाना केवल नदी को बचाना भर नहीं बल्कि समूची मनुष्यता को बचाना है।
इसी क्रम में छात्र अभिषेक ने अपनी कविता के माध्यम से प्रकृति के अंधाधुंध विनाश के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की और आधुनिक विकास की उस कड़वी सच्चाई को उजागर किया जो मानव जाति को पर्यावरण की ओर से एक गंभीर चेतावनी दे रही है। उन्होंने अपने शब्दों में पिरोया कि इंसानों ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए हरे-भरे जंगलों को काटकर रेगिस्तान में बदल दिया है और कल तक जो कल-कल बहती हुई नदियां थीं, उन्हें आज गंदे नालों में तब्दील कर दिया है।
इसके बाद जयवन्ती बेन ने अपनी कविता के माध्यम से नदियों के परोपकारी स्वभाव और उनसे मिलने वाली जीवन की सीख को आधार बनाया, तो वहीं छात्र संजीव कुमार ने अपनी कविता में नदी की गतिशीलता के माध्यम से मानव जीवन को निरंतर कर्म, साहस और सकारात्मकता का संदेश दिया। उनकी कविता ने यह अमूल्य सीख दी कि जीवन का असली नाम रुकना नहीं बल्कि हर हाल में आगे बढ़ते रहना है, चाहे रास्ते में पत्थरों जैसी बाधाएं आएं या तूफानों जैसा संकट, हमें अपना हौसला नहीं खोना चाहिए क्योंकि नदी विपरीत परिस्थितियों में भी निखरती है और मार्ग के उतार-चढ़ाव के अनुसार खुद को ढालते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ती है, जबकि थमा हुआ पानी अपनी पहचान खो देता है और ठीक वैसे ही निष्क्रिय जीवन भी व्यर्थ हो जाता है, इसलिए मनुष्य को हर मोड़ पर बिना झुके और बिना रुके अपने कर्म-पथ पर चलते रहना चाहिए।
इसके बाद साझी संस्कृति के रंग को बिखेरते हुए साथी गौरी शंकर गुप्ता ने ‘मानो तो मैं गंगा मां हूँ’ गीत के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि गंगा का महत्व मनुष्य की अपनी आस्था पर निर्भर है, श्रद्धा हो तो वह पूजनीय माँ है अन्यथा केवल पानी है। उन्होंने बताया कि यह नदी बिना किसी भेदभाव के सभी मनुष्यों की ज़रूरतें पूरी करती है जो सामाजिक व धार्मिक बँटवारों को व्यर्थ साबित करता है और सदियों से भारत की साझी संस्कृति तथा कबीर-नानक जैसे संतों की मानवतावादी वाणी को समेटे यह नदी आपसी प्रेम, समानता और सर्वधर्म समभाव का सबसे बड़ा प्रतीक है।
इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए धीरज कुमार तापड़िया ने अपनी सुमधुर आवाज में गंगा मां का भजन ‘चांद को निहारूं, शिव को पुकारूं’ प्रस्तुत कर पूरे माहौल को भक्तिमय कर दिया। इस भजन के माध्यम से यह गहरा जीवन दर्शन सामने आया कि गंगा का किनारा और शिव की भक्ति मनुष्य को परम मानसिक सुकून व सांसारिक दुखों से मुक्ति देते हैं, जहाँ जीवन की परेशानियों और अपनों के ठुकराए जाने से थका-हारा इंसान जब गंगा की शरण में आता है तो उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और वह बीते कल को भूलकर ईश्वर पर भरोसा करना सीख जाता है।
इसके पश्चात देवेस, शकील और इंद्रपाल ने भी अपनी कविताओं में नदी के प्रति गहरी आस्था प्रकट करते हुए हमारे जीवन में नदी की आवश्यकता और उसके महत्व से जुड़े भावों को पुरअसर ढंग से सुनाया।
इस सांस्कृतिक संध्या के केंद्र में वडोदरा के प्रसिद्ध गरबा गायक कुंतलभाई मेवाड़ा और तबला वादक छोटा उस्ताद समर्थ मेवाड़ा रहे, जिनकी तबले की अद्भुत तान और सुरीली गायकी की जुगलबंदी ने कार्यक्रम में समां बांध दिया और दर्शक दीर्घा में बैठे लोग मंत्रमुग्ध हो गए। संगीत के इस आनंद के बाद डॉ. गजेंद्र मीणा और डॉ. अनिता शुक्ला ने मंचीय गरिमा बढ़ाते हुए प्रख्यात कवि अज्ञेय की प्रसिद्ध कविता ‘नदी के द्वीप’ का अत्यंत सुंदर पाठ किया। इस कविता का मूल भाव यह संदेश दे गया कि व्यक्ति का निर्माण और संस्कार समाज रूपी नदी के माध्यम से ही होता है, फिर भी व्यक्ति का अपना स्वतंत्र अस्तित्व अनिवार्य है क्योंकि समाज की धारा में आँख मूँदकर बह जाने से व्यक्ति अपनी पहचान खोकर नष्ट हो जाता है, साथ ही यह कविता यह दृढ़ विश्वास भी जगाती है कि कठिन परिस्थितियों या विनाश के समय भी मनुष्य को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए क्योंकि संघर्ष के बाद नए व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण हमेशा संभव है।
इस गरिमामयी और वैचारिक रूप से समृद्ध कार्यक्रम में दीपक भट्ट, तूलिका त्रिपाठी, संध्या राय, कीर्ति आर्या, अमित कुमार, भवानी कुलकर्णी, दीपक पांचाल, अश्विनी कुमार, प्रथमेश दुबे, नम्रता, निशा, कविता, रोहित, विकास, संस्कृति, आनंद, रेखा, अनुराधा, लव, मनीषा, मनीष, प्रियांश, आकाश सहित बहुत बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे जिन्होंने कार्यक्रम के विचारों को आत्मसात किया।
कार्यक्रम के अत्यंत सफल और भावपूर्ण समापन के अवसर पर डॉ. स्वर्णिमा दुबे ने मंच से सभी उपस्थित अतिथियों, गणमान्य नागरिकों, कलाकारों, सहयोगियों और छात्र-छात्राओं के प्रति सहृदय आभार ज्ञापित किया और इस प्रकार नदियों को समर्पित यह अनूठी शाम संपन्न हुई।
रिपोर्ट आकाश चारण