अजय सहाय
सबसे पहले एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। पूरी गंगा के सक्रिय बाढ़-मैदान में पिछले 30–50 वर्षों में ठीक कितनी कॉलोनियां, कितने किलोमीटर सड़कें, कितने व्यावसायिक भवन और कितने अन्य निर्माण बढ़े—इसका एकीकृत, सार्वजनिक और सत्यापित राष्ट्रीय आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं दिखता। इसलिए कोई निश्चित संख्या बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन उपलब्ध उपग्रह अध्ययन, सरकारी दस्तावेज और न्यायिक मामलों के रिकॉर्ड बताते हैं कि समस्या गंभीर है।
पटना का 34 वर्षों का उपग्रह रिकॉर्ड क्या कहता है?
पटना शहरी समूह पर 1990, 2010 और 2024 के उपग्रह चित्रों का उपयोग कर किए गए एक अध्ययन में जल निकाय, कृषि भूमि, बंजर भूमि, वनस्पति और निर्मित क्षेत्र में बदलाव का अध्ययन किया गया। इसका महत्वपूर्ण निष्कर्ष है कि 1990 से 2024 के 34 वर्षों में पटना शहरी समूह का निर्मित क्षेत्र लगभग दोगुना हो गया।
यह आंकड़ा सीधे यह नहीं कहता कि पूरा बढ़ा हुआ निर्माण गंगा के active floodplain में ही हुआ है। लेकिन गंगा किनारे बसे पटना जैसे तेजी से विस्तारित शहर के संदर्भ में यह एक गंभीर संकेतक है। अब अगला वैज्ञानिक कदम यही होना चाहिए कि इस 34-वर्षीय निर्माण वृद्धि को गंगा के सक्रिय बाढ़-मैदान के मानचित्र पर रखकर देखा जाए—कितना निर्माण सुरक्षित भूभाग पर हुआ और कितना नदी के प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र में?
पटना में बाढ़-मैदान अतिक्रमण का मामला इतना गंभीर क्यों है?
गंगा के बाढ़-मैदान में निर्माण का मामला न्यायालय तक पहुंच चुका है। पटना में गंगा किनारे अतिक्रमण की जांच के लिए जिला प्रशासन ने दीघा घाट से नौजर घाट तक जमीनी सर्वेक्षण और मापी कराई थी। 25 अगस्त 2023 को पटना के जिलाधिकारी ने इस संबंध में विस्तृत सर्वे रिपोर्ट उपलब्ध कराई थी।
यह हमें एक बड़ा प्रश्न देता है—
यदि एक शहर के कुछ हिस्सों में जमीनी सर्वेक्षण संभव है, तो पूरे बिहार में बक्सर से भागलपुर और आगे तक गंगा के सक्रिय बाढ़-मैदान का डिजिटल सर्वे क्यों नहीं?
बिहार में Floodplain Zoning की कमी—CAG की गंभीर टिप्पणी
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की 2025 की रिपोर्ट ने बिहार में बाढ़ जोखिम प्रबंधन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कमी दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में उस समय तक आवश्यक Floodplain Zoning Regulations नहीं बनाए गए थे। परिणामस्वरूप जलमार्गों और प्राकृतिक जलनिकासी क्षेत्रों के आसपास अतिक्रमित बसावट तथा अनियोजित विकास को पर्याप्त रूप से नियंत्रित नहीं किया जा सका।
CAG ने स्पष्ट सिफारिश की कि संवेदनशील क्षेत्रों की तत्काल floodplain zoning की जाए और उसके लिए नियम बनाए जाएं। बार-बार बाढ़ प्रभावित गांवों को अधिक सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर स्थानांतरित करने पर भी विचार करने की बात कही गई।
यानी 2026 की बाढ़ के बाद उठ रहा प्रश्न नया नहीं है। समस्या वर्षों से पहचानी जा रही थी।
बिहार सरकार की अपनी रिपोर्ट भी एक बड़ी कमी दिखाती है
राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत बिहार सरकार से संबंधित दस्तावेज में लखीसराय के बड़हिया क्षेत्र के बारे में बताया गया था कि Flood Plain Zone का demarcation नहीं किया गया था, जबकि दियारा क्षेत्रों में बस्तियां floodplain में आती हैं। उसी दस्तावेज में यह भी बताया गया कि बिहार के बाढ़-प्रवण क्षेत्र का आकलन मानसून के उपग्रह चित्रों, जमीनी निरीक्षण और स्थानीय जानकारी के आधार पर किया गया।
यह बहुत महत्वपूर्ण अंतर है—
हम बाढ़ आने के बाद पानी कहां फैला, यह उपग्रह से देख रहे हैं; लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि पिछले 30–50 वर्षों में उस क्षेत्र के भीतर मनुष्य ने क्या-क्या बना दिया।
ISRO के पास आधार पहले से मौजूद है
NRSC/ISRO ने बिहार के लिए 1998 से 2010 तक के 13 वर्षों के ऐतिहासिक उपग्रह बाढ़ डेटा का उपयोग करके जिला-स्तरीय Flood Hazard Zonation Atlas तैयार किया है। इन मानचित्रों की समीक्षा NDMA द्वारा गठित समिति ने की थी, जिसमें CWC, IMD और बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी शामिल थे; जमीनी सत्यापन भी किया गया था।
इसका अर्थ है कि तकनीक उपलब्ध है।
अब आवश्यकता है कि इस flood-history database को construction-history database से जोड़ दिया जाए।
30 वर्षों में स्वयं गंगा भी बदलती रही है
2026 में प्रकाशित एक अध्ययन ने पटना जिले में दीघा घाट से बाढ़ तक लगभग 95 किलोमीटर लंबे गंगा खंड में 1995 से 2025 तक परिवर्तन का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने Landsat उपग्रह डेटा की सात अवधियों का उपयोग करके नदी के सक्रिय चैनल, रेतीले क्षेत्र और वनस्पति वाले दियारा क्षेत्रों में परिवर्तन का विश्लेषण किया।
इससे एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है—बाढ़-मैदान को किसी स्थिर रेखा की तरह नहीं देखा जा सकता। गंगा जैसी विशाल alluvial नदी अपना चैनल बदलती है, बालू के टापू बनाती-मिटाती है, किनारों का कटाव करती है और नए दियारा क्षेत्र बनाती है।
इसलिए आज नदी से 500 मीटर दूर दिखने वाला निर्माण ऐतिहासिक रूप से नदी के पुराने चैनल या सक्रिय बाढ़-मैदान में हो सकता है।
2026 में केंद्र ने भी Flood Plain Zoning पर बड़ा कदम उठाया
14 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 के अंतर्गत उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिवों को गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे Flood Plain Zoning लागू करने के निर्देश जारी किए।
यह 2026 की परिस्थितियों में अत्यंत महत्वपूर्ण नीतिगत संकेत है।
NMCG के Ganga River Basin Management Plan से जुड़े दस्तावेजों में बाकायदा “Active Floodplain Mapping: Defining the River Space” उपलब्ध है। यानी नदी को उसकी आवश्यक प्राकृतिक जगह देने का सिद्धांत पहले से नीति-विमर्श में मौजूद है।
कैसा हो 50-वर्षीय ‘गंगा सैटेलाइट ऑडिट’?
मेरे अनुसार अब 1975/1980 को आधार वर्ष मानकर 1990, 2000, 2010, 2020 और 2026 के उपग्रह चित्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए।
इसमें केवल “निर्मित क्षेत्र” नहीं गिना जाए। अलग-अलग डिजिटल परतें तैयार हों—
कॉलोनी और आवासीय निर्माण; व्यावसायिक भवन; सड़क और रेल नेटवर्क; तटबंध; पुल एवं एप्रोच रोड; औद्योगिक इकाइयां; सरकारी भवन; घाट और riverfront structures; बालू खनन क्षेत्र; आर्द्रभूमि; पुराने नदी चैनल; दियारा; प्राकृतिक नाले और जलनिकासी मार्ग।
हर संरचना की स्थापना की अनुमानित अवधि भी satellite time-series से निर्धारित की जाए।
इसके बाद तीन क्षेत्र बनाए जा सकते हैं—अत्यधिक सक्रिय नदी क्षेत्र, उच्च बाढ़ जोखिम क्षेत्र और नियंत्रित विकास क्षेत्र।
केवल अतिक्रमण नहीं—तटबंध और सड़क का भी ऑडिट हो
यह मान लेना भी गलत होगा कि हर तटबंध या सड़क नुकसान पहुंचाती है। अनेक तटबंध लाखों लोगों और कृषि भूमि की रक्षा करते हैं।
लेकिन वैज्ञानिक ऑडिट यह पूछे—
किस तटबंध ने बाढ़ रोकी? कहां पानी का प्राकृतिक फैलाव बदला? किस सड़क के ऊंचे बांध ने drainage बाधित किया? कितनी पुलिया पर्याप्त हैं? कहां backwater बना? पुराने नाले कहां बंद हुए?
यानी उद्देश्य निर्माण को दोष देना नहीं, बल्कि यह पता लगाना होना चाहिए कि कौन-सा निर्माण बाढ़ जोखिम घटा रहा है और कौन-सा अनजाने में बढ़ा रहा है।
प्रत्येक निर्माण को ‘डिजिटल जन्म प्रमाणपत्र’
भविष्य में गंगा के निर्धारित बाढ़-मैदान के भीतर किसी भी नए निर्माण के लिए एक Geo-tagged Digital River Clearance होना चाहिए।
उपग्रह और ड्रोन आधारित मानचित्र पर क्लिक करते ही पता चले—
यह निर्माण कब बना, भूमि का पूर्व उपयोग क्या था, नदी से दूरी कितनी है, जमीन की ऊंचाई कितनी है, यहां ऐतिहासिक रूप से कितनी बार बाढ़ आई, क्या यह पुराना नदी मार्ग था और निर्माण की अनुमति किस विभाग ने दी।
NMCG ने drainage mapping के लिए drone-based survey की मानक कार्यप्रणाली भी सूचीबद्ध की है, इसलिए आधुनिक भू-स्थानिक तकनीक को नदी प्रबंधन से जोड़ने की संस्थागत दिशा मौजूद है।
सबसे बड़ा Burning Question
आज असली सवाल यह नहीं है कि—
“2026 में गंगा हमारे शहरों और गांवों में क्यों घुस गई?”
सवाल उल्टा भी पूछा जाना चाहिए—
“पिछले 50 वर्षों में हम गंगा के प्राकृतिक क्षेत्र में कितनी दूर घुस गए?”
यदि 1975, 1990 और 2026 के उपग्रह मानचित्र एक-दूसरे के ऊपर रख दिए जाएं, तो शायद भारत को पहली बार साफ दिखाई देगा कि नदी बदली कितनी और मनुष्य ने नदी की जगह को बदला कितना।
2026 की बाढ़ के बाद इसलिए ‘गंगा 50-वर्षीय उपग्रह एवं बाढ़-मैदान ऑडिट’ शुरू किया जाना चाहिए। इसे ISRO/NRSC, CWC, NMCG, Survey of India, राज्य जल संसाधन विभाग, राजस्व विभाग और स्वतंत्र नदी वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास से किया जा सकता है।
इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक डिजिटल पोर्टल पर होनी चाहिए।
गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करना पर्याप्त नहीं है। राष्ट्रीय नदी को अपना “River Space” भी चाहिए।
यदि हम नदी के पुराने रास्ते, सक्रिय बाढ़-मैदान, दियारा, आर्द्रभूमि और प्राकृतिक जलनिकासी क्षेत्र सुरक्षित नहीं करेंगे, तो भविष्य की चरम वर्षा में प्रश्न बार-बार यही होगा—
“गंगा का पानी शहर में आया, या शहर धीरे-धीरे गंगा के रास्ते में चला गया?”
यहां मैंने जानबूझकर पूरे गंगा floodplain के लिए कोई काल्पनिक “कुल कॉलोनियों/किलोमीटर सड़कों” की संख्या नहीं दी है, क्योंकि उपलब्ध आधिकारिक स्रोत ऐसा एकीकृत 30–50 वर्षीय आंकड़ा नहीं देते। यही डेटा-गैप स्वयं 50-वर्षीय उपग्रह ऑडिट की सबसे मजबूत वजह है।