निकोबार में खनन की अनुमति के साथ पारिस्थितिकी और जनजातियों पर मंडराता संकट

इस बड़े खतरे और सरकारी निर्णय के प्रमाण स्वरूप भारत के राजपत्र (असाधारण) के भाग II-खण्ड 3-उप-खण्ड (ii), संख्या 4988, का.आ. 5194 (अ), फाइल संख्या एए/6/2024-खान VI, नई दिल्ली, दिनांक 21 सितम्बर 2026 में प्रकाशित अधिसूचना को देखा जा सकता है। केंद्र सरकार के खान मंत्रालय द्वारा अपतटीय क्षेत्र खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2002 की धारा 10 के तहत जारी इस राजपत्रित आदेश में ग्रेट निकोबार द्वीप के अपतटीय क्षेत्र में 1,632 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को बहुधात्विक पिंडिकाओं (Polymetallic Nodules) और भूपर्पटी खनिजों की खोज तथा संयुक्त अनुज्ञप्ति के लिए अधिसूचित किया गया है। इस आधिकारिक गजट में अंडमान सागर में स्थित 1,000 वर्ग किलोमीटर के वेस्ट सेवेल रिज-01 और 632 वर्ग किलोमीटर के सेवेल राइज-01 ब्लॉकों की पहचान की गई है। दैनिक समाचार पत्र ‘पत्रिका’ (26 सितंबर 2026) की रिपोर्ट भी इस शासकीय निर्णय की पुष्टि करती है, जिसके अनुसार इस क्षेत्र में 41.7 लाख टन निकेल, 29.9 लाख टन तांबा, 51.2 लाख टन कोबाल्ट और 9.22 करोड़ टन मैंगनीज जैसे दुर्लभ खनिजों का दोहन करने की योजना है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर इसे आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, परंतु यह आधिकारिक गजट सीधे तौर पर उस प्रक्रिया पर मुहर लगाता है जो द्वीप के विनाश का कारण बन रही है।

निकोबार द्वीप समूह का भौगोलिक और पारिस्थतिकीय स्वरूप मुख्य भूमि से पूरी तरह भिन्न है और इसे अक्षुण्ण रखना वैश्विक पर्यावरण के लिए अनिवार्य है। यह क्षेत्र करोड़ों वर्षों से एक अनूठे कार्बन सिंक के रूप में कार्य कर रहा है और यहाँ पाई जाने वाली जाइंट लेदरबैक कछुओं जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ केवल इन्हीं तटीय खाड़ियों में प्रजनन करती हैं। जब इस नए राजपत्रित खनन आदेश को 72,000 से 92,000 करोड़ रुपये की ‘ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना’ के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो तबाही का दायरा और स्पष्ट हो जाता है। लगभग 130 वर्ग किलोमीटर के सघन वनों की कटाई से करीब 10 लाख प्राचीन वृक्ष नष्ट होंगे, जिससे द्वीप का सूक्ष्म -जलवायु का गणित पूरी तरह बिगड़ जाएगा। इसके साथ ही, समुद्र तल से बहुधात्विक पिंडिकाओं को निकालने के लिए की जाने वाली गहरे समुद्र की ड्रेजिंग से भारी मात्रा में फैली गाद और तलछट सूर्य के प्रकाश को रोककर प्रवाल भित्तियों का दम घोंट देगी, जिससे संपूर्ण समुद्री खाद्य श्रृंखला ध्वस्त हो जाएगी। इसके अतिरिक्त, यह द्वीप सिस्मोनिक ज़ोन-5 जैसी अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय श्रेणी में स्थित है, जहाँ 2004 की भयंकर सुनामी का केंद्र था; ऐसे में भारी उत्खनन प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को अत्यधिक बढ़ा देता है।

पर्यावरणीय विनाश से भी अधिक दुखद पहलू वहाँ की सदियों पुरानी आदिम जनजातियों पर मंडराता अस्तित्व का संकट है। ग्रेट निकोबार द्वीप विशेष रूप से संकटग्रस्त जनजातीय समूह ‘शोम्पेन’ का एकमात्र प्राकृतिक आवास है, जिनकी कुल जनसंख्या मात्र 200 से 300 के बीच रह गई है। शोम्पेन जनजाति आधुनिक दुनिया से पूरी तरह अलग-थलग रहकर इन्हीं वर्षावनों पर निर्भर जीवन जीती है। हालांकि कागजों पर सीधी बेदखली न करने की बात कही जाती है, परंतु उनके ट्राइबल रिजर्व क्षेत्र में भारी मशीनों, औद्योगिकीकरण और बाहरी लोगों के आगमन से उनका प्राकृतिक जीवन चक्र छिन्न-भिन्न हो जाएगा और बिना प्रतिरोधक क्षमता के बाहरी संक्रमण फैलने से इस पूरी जनजाति के विलुप्त होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इसी तरह, 2004 की सुनामी के बाद अपनी पैतृक भूमि पर वापसी का इंतजार कर रहे निकोबारी समुदाय के वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत मिलने वाले विधिक अधिकारों की अनदेखी कर उनकी भूमि को विकास योजनाओं में शामिल कर लिया गया है।

नीति निर्माताओं द्वारा मलक्का जलडमरूमध्य के पास रणनीतिक सैन्य उपस्थिति, ‘ब्लू इकोनॉमी’ और 84,084 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ जैसी योजनाओं के माध्यम से ऊर्जा व खनिज सुरक्षा हासिल करने के तर्क दिए जा रहे हैं। परंतु पर्यावरणविदों का स्पष्ट मानना है कि द्वीप के संवेदनशील पारिस्थितिक संतुलन को नष्ट करके प्राप्त की गई कोई भी रणनीतिक बढ़त टिकाऊ नहीं हो सकती। संयुक्त राष्ट्र का सागर विज्ञान दशक (2021-2030) भी संसाधनों के अंधी दौड़ में दोहन के बजाय समुद्रों के सतत संरक्षण का आह्वान करता है। 21 सितंबर 2026 का यह राजपत्रित आदेश और उसके बाद की परिस्थितियाँ यह साफ़ दर्शाती हैं कि यदि खनिजों और तात्कालिक आर्थिक लाभ के लिए निकोबार के प्राचीन जंगलों, प्रवाल भित्तियों और शोम्पेन जैसी अनमोल मानवीय धरोहर को गँवा दिया गया, तो यह एक ऐसा विनाश होगा जिसकी भरपाई भविष्य का कोई भी विकास नहीं कर पाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *