भारत में डिजिटल तकनीकों, सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुलभता ने दैनिक जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही एक गहरा और अदृश्य संकट भी खड़ा कर दिया है। इसे डिजिटल कचरा कहा जाता है। हर दिन हमारे मोबाइल और कंप्यूटर पर आने वाले अनगिनत अनावश्यक ईमेल, वॉट्सऐप पर मिलने वाले प्रचार संदेश, विज्ञापनों के ढेर और क्लाउड पर संग्रहित बेकार डेटा इस नए कचरे का निर्माण करते हैं। भौतिक कचरे की तरह यह आँखों से दिखाई नहीं देता, इसलिए लोग इसे हानिरहित मान लेते हैं। जबकि हकीकत यह है कि यह अदृश्य कचरा हमारे देश के ऊर्जा संसाधनों का भारी व्यय कर रहा है और पर्यावरण पर कार्बन उत्सर्जन का एक गहरा बोझ डाल रहा है। यह लेख इस अनछुए विषय पर है ।

फिजूल के संदेश बढ़ाते  पर्यावरणीय  संकट

इस तेज़ी से बढ़ते संकट का मुख्य कारण हमारी बदलती डिजिटल जीवनशैली और इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता का घोर अभाव है। भारत में मैसेजिंग और ईमेल का दायरा बहुत व्यापक हो चुका है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार भारत से प्रतिदिन लगभग आठ अरब से अधिक ईमेल भेजे जाते हैं, जो सालाना आधार पर लगभग तीन खरब से अधिक ईमेल बैठते हैं। वैश्विक अध्ययनों के अनुसार कुल ईमेल यातायात का लगभग 45  से 47  प्रतिशत हिस्सा स्पैम या अवांछित होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग 1.4  खरब स्पैम और अनचाहे ईमेल प्रेषित किए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त व्यावसायिक विपणन के लिए भेजे जाने वाले ईमेल का औसत ओपन-रेट केवल 24  से 43  प्रतिशत के बीच रहता है, यानी लगभग 57  प्रतिशत से 76  प्रतिशत विज्ञापन और प्रचार वाले ईमेल बिना खोले ही इनबॉक्स में पड़े रहते हैं या डिलीट कर दिए जाते हैं। वॉट्सऐप जैसे लोकप्रिय मंचों पर भी स्थिति अलग नहीं है। एक प्रमुख उपभोक्ता सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 96  प्रतिशत उपयोगकर्ता प्रतिदिन किसी न किसी प्रकार के स्पैम या प्रमोशनल संदेश प्राप्त करते हैं, जिनमें से 54  प्रतिशत लोगों को रोज़ाना एक से तीन और 11   प्रतिशत लोगों को आठ से भी अधिक अनचाहे संदेश मिलते हैं।

लोग प्रायः यह भूल जाते हैं कि डिजिटल डेटा का प्रत्येक बाइट बिजली पर संचालित होता है। जब कोई संदेश भेजा जाता है, सर्वर पर सहेजा जाता है या किसी नेटवर्क से होकर गुजरता है, तो डेटा सेंटरों, नेटवर्क राउटरों, ऑप्टिकल फाइबर और मोबाइल टावरों को लगातार विशाल मात्रा में विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जब हम कोई भारी वीडियो, ऑडियो या उच्च गुणवत्ता वाली छवि बिना सोचे-समझे आगे फॉरवर्ड करते हैं, या वर्षों पुराने ईमेल और बैकअप को क्लाउड से डिलीट नहीं करते, तो हम डेटा सेंटरों पर बिजली की खपत और सर्वर को ठंडा रखने में लगने वाली ऊर्जा की माँग को सीधे तौर पर बढ़ा रहे होते हैं।

डिजिटल कचरे के कारण होने वाली ऊर्जा की खपत की गंभीरता को समझना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन से जुड़ा हुआ है। शोध के अनुसार एक सामान्य स्पैम ईमेल को भेजने, फ़िल्टर करने, प्रोसेस करने और सर्वर पर स्टोर करने में औसतन ०.3  ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन होता है। इस आधार पर यदि भारत में सालाना 1.4  खरब स्पैम ईमेल के आंकड़े को देखा जाए, तो केवल अनचाहे ईमेल के कारण ही हर साल लगभग 4.2  लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन होता है।

भारत में बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा आज भी कोयले जैसे पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है, जहाँ प्रति किलोवाट-घंटा बिजली उत्पादन पर लगभग ०.71  किग्रा कार्बन उत्सर्जन होता है। इस हिसाब से स्पैम ईमेल को प्रोसेस और स्टोर करने में देश की लगभग 4.2  टेरावॉट-अवर बिजली हर साल व्यर्थ चली जाती है। इतनी बिजली का तात्पर्य यह है कि एक हजार मेगावॉट क्षमता वाला कोई विशाल बिजलीघर वर्ष में लगभग चार हजार घंटे केवल इन निष्प्रयोज्य और अनचाहे स्पैम ईमेलों को संभालने के लिए चलता रहता है।

इसके अलावा डेटा का आकार भी इस ऊर्जा संकट को कई गुना बढ़ा देता है। एक साधारण टेक्स्ट संदेश का आकार जहाँ केवल एक या दो किलोबाइट होता है, वहीं एक हाई-डेफिनिशन वीडियो या भारी चित्र 05  मेगाबाइट से लेकर 50  मेगाबाइट या उससे भी अधिक का हो सकता है। वीडियो और चित्र संदेश टेक्स्ट की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक डेटा स्थान और नेटवर्क ऊर्जा की खपत करते हैं, जिससे इनका कार्बन फुटप्रिंट भी कई गुना अधिक हो जाता है। यदि इन निष्प्रयोज्य संदेशों और फाइलों के प्रवाह पर ध्यान न दिया गया, तो हमारा डिजिटल जीवन देश के ऊर्जा बजट पर एक बहुत बड़ा वित्तीय और पर्यावरण संबंधी संकट खड़ा कर देगा।

हालाँकि इस समस्या का समाधान पूरी तरह संभव है, बशर्ते व्यक्तिगत, संस्थागत और नीतिगत तीनों स्तरों पर समन्वित प्रयास किए जाएँ। व्यक्तिगत स्तर पर हमें अपनी डिजिटल आदतों में स्वच्छता और अनुशासन अपनाना होगा। सभी अवांछित ईमेल, समाचार-पत्रों और व्यावसायिक विज्ञापनों को तुरंत अनसब्सक्राइब कर देना चाहिए ताकि वे बार-बार इनबॉक्स में न आएँ। अपने क्लाउड स्टोरेज और ईमेल इनबॉक्स को समय-समय पर साफ करना, पुरानी और डुप्लिकेट फाइलों को डिलीट करना तथा संदेशों को केवल अति-आवश्यकता पड़ने पर ही भेजना एक ज़िम्मेदार नागरिक की पहचान होनी चाहिए।

व्यावसायिक संस्थाओं और कंपनियों को भी अपनी विपणन नीतियों में बदलाव करना चाहिए और अवांछित बल्क मैसेजिंग के बजाय केवल सहमति देने वाले सक्रिय उपयोगकर्ताओं को ही संदेश भेजने चाहिए। इसके साथ ही देश में स्थापित हो रहे नए डेटा सेंटरों को सौर और पवन जैसी हरित एवं नवीकरणीय ऊर्जा की ओर स्थानांतरित करने के प्रयास तेज़ होने चाहिए। शासकीय और नियामक स्तर पर भी भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण और डिजिटल डेटा संरक्षण कानूनों के तहत स्पैम संदेशों, अनधिकृत व्यावसायिक प्रचार और अनियंत्रित डेटा संग्रहण पर सख्त नियम लागू किए जाने चाहिए।

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