रोहित कौशिक
औद्योगीकरण और मानवीय गतिविधियों के कारण हवा प्रदूषित होने की खबरें अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं लेकिन जंगलों की आग भी हवा को जहरीला बना रही है। हाल ही में ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 1990 के बाद से जंगलों में आग लगने की घटनाएं तीन गुणा बढ़ गई हैं। इस रिपोर्ट में चेतावनी दे गई है कि भविष्य में जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इससे वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ेगा। जाहिर है कि ऐसे माहौल में हवा को स्वच्छ रखना और मुश्किल हो जाएगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस दौर में वायु प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। छोटे-छोटे कस्बों और शहरों में भी वायु गुणवत्ता सूचकांक की स्थिति बिगड़ रही है। पहले शायद ही किसी ने वायु गुणवत्ता सूचकांक का नाम सुना हो लेकिन इस दौर मेें एक छोटे से कस्बे या शहर में भी आज का युवा मोबाइल में यह देखकर बता देता है कि उस कस्बे या शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई कितना है। इसका अर्थ यह है कि आज वायु प्रदूषण की स्थिति इतनी गंभीर हो गई हैं कि छोटी जगहों पर भी इसके प्रभाव को महसूस किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में यदि जंगलों की आग से वायु प्रदूषण बढ़ता है तो उन प्रयासों को झटका लगेगा जो वाहनों या फिर अन्य मानवीय गतिविधियों के माध्यम से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए किए जा रहे हैं।
जर्नल ‘एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी’में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि जंगलों की आग के कारण पहले की तुलना में ज्यादा मात्रा में हानिकारक गैसें वातावरण में उत्सर्जित हो रही हैं। ये गैसें हवा की स्वच्छता को तो प्रभावित कर ही रही हैं, इंसान के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल रही हैं। जंगलों की आग के कारण हर साल औसतन 14.3 करोड़ टन कार्बनिक प्रदूषक हवा में पहुंच रहे हैं। ये प्रदूषक तत्व पिछले अनुमानों से 21 फीसद ज्यादा हैं। हालांकि जंगलों की आग से होने वाला प्रदूषण अन्य मानवीय गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण से कम है। यदि जंगलों की आग से उत्सर्जित प्रदूषकों की तुलना उद्योगों, वाहनों और अन्य मानवीय गतिविधियों से उत्सर्जित प्रदूषकों से की जाए तो वायु प्रदूषण बढ़ाने में जंगलों की आग का योगदान कम ही रहेगा। लेकिन इस आधार पर जंगलों की आग से होने वाले प्रदूषण को कम करके नहीं आंका जा सकता। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि मध्यम और अर्ध-वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों के मामले में जंगलों की आग और मानवीय गतिविधियां लगभग बराबर मात्रा में प्रदूषण फैला रही हैं। गौरतलब है कि जब पेड़, घास के मैदानों और पीटलैंड के बड़े हिस्से में आग लगती है तो हवा में पानी की भाप, राख और कई तरह के कार्बन यौगिक मिल जाते हैं। इनमें से कुछ गैसें वाष्पशील कार्बनिक यौगिक कहलाती हैं। इसके साथ ही वे यौगिक जो गर्मी में उड़कर गैस बन जाते हैं, उन्हें मध्यम और अर्ध-वाष्पशील कार्बनिक यौगिक कहा जाता है। ये तत्व हवा में जाकर बहुत ही महीन कण बना लेते हैं। जब ये तत्व सांस के साथ शरीर में पहुंचते हैं तो दिल और संास की बीमारियां पैदा करते हैं।
दरअसल जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन के बीच एक गहरा अंतर्संबंध है। एक तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण जंगल की आग बढ़ रही है तो दूसरी तरफ यह आग जलवायु परिवर्तन को और भी ज्यादा गंभीर बना रही है। पेड़-पौधे प्राकृतिक रूप से कार्बन सोखकर ‘कार्बन सिंक’ का काम करते हैं। लेकिन जब जंगल जलते हैं तो उनमें संचित कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य हानिकारक ग्रीनहाउस गैसें अचानक वायुमंडल में मुक्त हो जाती हैं। यह उत्सर्जन पृथ्वी के चारो और गर्मी को सोखने वाली परत को और मोटा कर देता है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग तेजी से बढ़ती है। जंगल की आग से भारी मात्रा में काला धुंआ और ब्लैक कार्बन निकलता है। यह उत्सर्जन वायु प्रदूषण बढ़ाता है। हवा के साथ बहकर जब यह कालिख ऊंचे पहाड़ों और धु्रवों पर जमा बर्फ या ग्लेशियरों पर गिरती है, तो बर्फ की सतह काली पड़ जाती है। काला रंग सूर्य की रोशनी और गर्मी को परावर्तित करने के बजाय सोखने लगता है, जिससे ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघलने लगते हैं। स्वस्थ जंगल वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने में मदद करते हैं। भीषण आग के कारण जब बड़े पैमाने पर जंगल नष्ट हो जाते हैं तो पृथ्वी की कार्बन सोखने की क्षमता हमेशा के लिए घट जाती है। जले हुए जंगलों को दोबारा उगने में दशकों या सदियों का समय लगता है और कई बार बदले हुए मौसम के कारण वहां दोबारा वैसे घने जंगल उग ही नहीं पाते हैं।
दरअसल जंगल की आग का धआं हवा के पैटर्न और बादलों के बनने की प्रक्रिया को जटिल बना देता है। धुएं के बारीक कण सूर्य की रोशनी को रोककर स्थानीय स्तर पर तापमान को कुछ समय के लिए प्रभावित कर सकते हैं जिससे वायुमंडलीय परिसंचरण बदल जाता है। फलस्वरूप कहीं अत्यधिक सूखा तो कहीं अचानक बाढ़ जैसी आपदाएं जन्म लेती हैं। जंगल में जब पेड़-पौधे और लकड़ियां जलती हैं तो उससे भारी मात्रा में पीएम 2.5 पैदा होते हैं। ये कण इतने बारीक होते हैं कि हवा के साथ दूर-दूर के शहरों और राज्यों तक फैल जाते हैं, जिससे वहां की हवा जहरीली हो जाती है। इसके साथ ही सूखी वनस्पतियों के जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी दमघोंटू गैसें निकलती हैं। ये गैसें हवा में मौजूद ऑक्सीजन का स्तर कम कर देती हैं। इस विषय पर हुए अध्ययनों से पता चला है कि जंगलों की आग से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक और नाइट्रोजन ऑक्साइड जब सूरज की रोशनी के साथ प्रतिक्रिया करते हैं तो जमीनी स्तर पर जहरीली ओजोन गैस का निमार्ण तेजी से बढ़ता है जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती है। हमें यह समझना होगा कि जंगलों की आग के कारण वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है। इसलिए जंगलों की आग को रोकने के लिए कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है।