पंकज चतुर्वेदी
हिमालय की गोद में बसे लेह-लद्दाख के इस विशाल शीत मरुस्थल या हिम-मरु की निर्मल वादियों और पारदर्शी नीले आसमान को दुनिया भर में प्रकृति का एक अद्भुत वरदान माना जाता रहा है। समुद्र तल से लगभग साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्गम क्षेत्र को कभी देश के सबसे स्वच्छ और प्रदूषणमुक्त स्थलों में गिना जाता था। किंतु पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से पर्यटन के अभूतपूर्व विस्तार और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों के कारण, लेह का पर्यावरण एक बड़े संकट की चपेट में आ गया है। हालिया वायु गुणवत्ता सूचकांक के आंकड़ों ने पूरे देश को चौंका दिया है, जहां लेह वायु प्रदूषण के मामले में देश के शीर्ष प्रभावित नगरों में दूसरे स्थान पर दर्ज किया गया है। ग्रेटर नोएडा जैसे मैदानी शहरों में जहां प्रदूषण का मुख्य कारण धूल और सूक्ष्म कण अर्थात पीएम 2.5 तथा पीएम 10 होते हैं, वहीं लेह में वायु गुणवत्ता बिगड़ने की सबसे बड़ी वजह सतही ओजोन का खतरनाक स्तर पाया गया है।
यह गंभीर स्थिति यह स्पष्ट संदेश देती है कि प्रदूषण का जाल अब देश के सर्वोच्च और सबसे दूरस्थ पर्वतीय अंचलों तक भी पूरी तरह फैल चुका है और लेह का वायुमंडलीय “वहन क्षमता” यानी कैरिंग कैपेसिटी मैदानी शहरों की तुलना में बहुत कम है। इसी कारण मैदानी इलाकों की तुलना में लेह में वाहनों और कचरे की थोड़ी सी भी वृद्धि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भारी और अपूरणीय नुकसान पहुँचाती है, जिसके चलते विशेषज्ञ अब लेह में इलेक्ट्रिक वाहनों के अनिवार्य संचालन, ग्रीन टूरिज़्म और पर्यटक क्षमता को सख्ती से सीमित करने की वकालत कर रहे हैं।
लेह में वायु प्रदूषण का यह खतरनाक स्तर तक पहुँचना केवल स्थानीय ट्रैफिक की समस्या नहीं है—यह स्थानीय उत्सर्जन, अत्यधिक ऊंचाई, तीव्र सूर्य प्रकाश, क्षेत्रीय हवाओं और दूर के औद्योगिक तथा वाहन उत्सर्जन का संयुक्त परिणाम है। वैज्ञानिक तौर पर यह समझना बेहद जरूरी है कि ओजोन सीधे उत्सर्जित होने वाला प्रदूषक नहीं है, बल्कि यह एक द्वितीयक प्रदूषक है। लेह में वाहनों, डीजल जनरेटरों, निर्माण कार्यों और अपशिष्ट या कचरा जलाने से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक तेज धूप व गर्मी में आपस में प्रकाश-रासायनिक प्रतिक्रिया करके ज़मीन के ठीक पास जहरीली ओजोन का निर्माण करते हैं। लेह की लगभग 3,500 मीटर की ऊंचाई पर पराबैंगनी विकिरण बेहद तीव्र होता है, जो इन रासायनिक प्रतिक्रियाओं को कई गुना तेज कर देता है। इसके अलावा, ऊंचाई पर ओजोन को नष्ट करने वाली अन्य गैसों की सांद्रता कम होने के कारण यह खतरनाक गैस लंबे समय तक वायुमंडल में बनी रहती है। वैज्ञानिक मॉडलिंग के अनुसार ट्रांस-हिमालय में ओजोन का एक बड़ा हिस्सा दक्षिण एशिया और उसके बाहर के मानवजनित उत्सर्जनों से आता है, जहां दक्षिण एशिया से 15 से 18 प्रतिशत और अन्य क्षेत्रों से 32 से 37 प्रतिशत तक का योगदान होता है। इसके साथ ही समताप मंडलीय ओजोन का ऊपरी वायुमंडल से नीचे आना और गर्म तथा धूप भरे दिनों का होना इस समस्या को और अधिक गंभीर बना देता है। यही कारण है कि इसे घटाने के लिए वाहनों और जनरेटरों के स्थानीय स्तर पर उत्सर्जन नियंत्रण के साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों को कम करना अत्यंत आवश्यक है।
लेह में इस ओजोन और वायु प्रदूषण के बढ़ने के पीछे मानवीय दबाव और बुनियादी अवसंरचना की भारी वृद्धि है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों यानी जनवरी से सितंबर के दौरान ही चार लाख साठ हजार छह सौ सड़सठ से अधिक पर्यटक लेह पहुंचे, जिसने वर्ष 2025 के कुल तीन लाख पैंतीस हजार आठ सौ बहत्तर पर्यटकों के आंकड़े को पीछे छोड़ते हुए लगभग सैंतीस प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की। केवल सितंबर 2026 में ही पचपन हजार पांच सौ बयासी पर्यटक पहुंचे, जो पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में साठ प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्शाता है। पर्यटकों की इस रिकॉर्ड आवक के कारण लेह में परिवहन और ऊर्जा व्यवस्था पर अत्यधिक दबाव बन गया है। लद्दाख टैक्सी ऑपरेटर यूनियन के तहत पंजीकृत टूरिस्ट टैक्सियों की संख्या अब साढ़े पांच हजार से छह हजार के पार पहुँच चुकी है, जो पिछले दशक की तुलना में तीन गुना से अधिक है। इसके अतिरिक्त, सीजन के दौरान चार से पांच हजार रेंटल मोटरसाइकिलें भी सड़कों पर उतरती हैं। लेह के अति दुर्गम पर्वतीय दर्रों, जैसे खारदुंग ला और चांग ला पर चलने के लिए भारी टॉर्क और चार गुणे चार क्षमता वाले डीजल वाहनों पर निर्भरता अत्यधिक है। टोयोटा इनोवा, टेम्पो ट्रैवलर, महिंद्रा स्कॉर्पियो और बोलेरो जैसी कमर्शियल डीजल गाड़ियां, जो हजारों की संख्या में प्रतिदिन सड़कों पर दौड़ती हैं, कार्बन उत्सर्जन का मुख्य जरिया बनी हुई हैं। इसके साथ ही, दूरदराज के क्षेत्रों और होटलों में बिजली आपूर्ति की कमी को पूरा करने के लिए चलने वाले भारी-भरकम डीजल जनरेटर सेटों का धुआं भी लगातार वातावरण को दूषित कर रहा है।
लेह की भौगोलिक बनावट और पर्यावरणीय प्रकृति के कारण यह वायु प्रदूषण मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक घातक और विनाशकारी साबित होता है। लेह एक विशाल शीत मरुस्थल है, जहां स्वाभाविक रूप से विशालकाय घने जंगल या प्राकृतिक हरियाली का सर्वथा अभाव है। मैदानी भागों में मौजूद पेड़-पौधे और घनी वनस्पति हवा में मौजूद दूषित गैसों को अवशोषित कर प्राकृतिक सिंक का कार्य करते हैं तथा वातावरण को ऑक्सीजन प्रदान कर स्वच्छ बनाते हैं। लेह में इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच यानी हरियाली के न होने से उत्सर्जित प्रदूषक सीधे हवा में लंबे समय तक बने रहते हैं और उनका स्वाभाविक शुद्धिकरण नहीं हो पाता।
इसके साथ ही, अत्यधिक ऊंचाई होने के कारण लेह में वायुमंडल पहले से ही बहुत पतला है और वहां हवा में ऑक्सीजन का दबाव सामान्य मैदानों की तुलना में काफी कम होता है। जब इस पहले से ही ऑक्सीजन-विहीन हवा में ओजोन और ब्लैक कार्बन जैसे घातक तत्व मिल जाते हैं, तो यह मानव स्वास्थ्य के लिए दोहरा प्रहार बन जाता है। ओजोन एक तीखी और अत्यधिक प्रतिक्रियाशील गैस है जो सांस लेतेजी सीधे फेफड़ों के नाजुक ऊतकों पर हमला करती है। यह फेफड़ों में सूजन, सीने में जकड़न, लगातार खांसी, आंखों और गले में तीव्र जलन उत्पन्न करती है। जिन पर्यटकों या स्थानीय निवासियों को पहले से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या सांस की बीमारियां हैं, उनके लिए यह स्थिति अत्यंत जानलेवा बन जाती है। अधिक ऊंचाई पर शरीर को सामान्य गतिविधियों के लिए भी अधिक ऑक्सीजन की दरकार होती है, परंतु दूषित हवा के कारण फेफड़ों की ऑक्सीजन सोखने की क्षमता घट जाती है, जिससे चक्कर आना, भारी थकान, तीव्र सिरदर्द और माउंटेन सिकनेस के गंभीर लक्षण तेजी से उभरने लगते हैं।
लेह में बढ़ते इस प्रदूषण का सबसे भयावक दुष्प्रभाव वहां के प्राचीन हिमनदों यानी ग्लेशियरों पर देखने को मिल रहा है। डीजल वाहनों और जनरेटरों के अधूरे दहन से निकलने वाला काला धुआं, जिसे ब्लैक कार्बन या काजल कहा जाता है, हवा में तैरता हुआ आसपास के पहाड़ों और बर्फ की चादरों पर जमा हो जाता है। सफेद बर्फ पर काले कणों की यह परत सूर्य की ऊष्मा को परावर्तित करने के बजाय अवशोषित करने लगती है, जिससे संवेदनशील ग्लेशियर अभूतपूर्व गति से पिघलने लगे हैं। लेह का पूरा जीवन और कृषि इन्हीं ग्लेशियरों से पिघलकर आने वाले जल पर निर्भर है। यदि यह हिमनद इसी दर से पिघलते रहे तो आने वाले समय में संपूर्ण लद्दाख क्षेत्र को भीषण पेयजल संकट और सूखे का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, बिना योजना के खड़े हो रहे सैकड़ों कंक्रीट के होटल, ठोस प्लास्टिक कचरे का जमावड़ा और सीवेज का रिसाव लेह के सीमित भूजल और पवित्र नदियों को भी दूषित कर रहा है।
स्पष्ट है कि लेह का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र अब अपनी वहन क्षमता की अंतिम सीमाओं को छू रहा है। यदि समय रहते लेह में डीजल वाहनों के अनियंत्रित प्रवेश, जनरेटरों के स्थान पर सौर ऊर्जा के उपयोग और सतत पर्यटन नीतियों को कड़ाई से लागू नहीं किया गया, तो भारत की यह अनुपम धरोहर प्रदूषण की भेंट चढ़ जाएगी। लेह को बचाने के लिए केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर भी उत्सर्जन नियंत्रण के ठोस उपाय अपनाने होंगे, ताकि इस महान शीत मरुस्थल के निर्मल पर्यावरण और वहां के जनजीवन की रक्षा की जा सके।