ह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि गोवा का अस्तित्व मैनग्रोव वनों के कारण है , जिसने वहाँ शहरी इलाके में खारे पानी को रोका हुआ है - साथ ही भूमि कटाव, जल- जीवन का आधार भी मैनग्रोव ही है । पिछले कुछ सालों में कथित विकास के नाम पर वहाँ मैनग्रोव को उजाड़ा जा रहा है और यह गोवा के अस्तित्व पर खतरे की चेतावनी है ।

उजड़ते मैनग्रोव वन से गोवा  में तबाही का खतरा

भौगोलिक दृष्टि से मांडवी और जुआरी नदियों के संगम तथा इन्हें आपस में जोड़ने वाली कंबरजुआ नहर के किनारे बसे मैनग्रोव वन इस पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र की रीढ़ हैं। इसके साथ ही, राजधानी पणजी के पूर्व में स्थित विशाल दलदली क्षेत्र भी इसी अति-संवेदनशील श्रेणी में आते हैं। समुद्र या नदियों में होने वाले तेल रिसाव की स्थिति में चट्टानी या रेतीले तटों को साफ करना अपेक्षाकृत आसान होता है क्योंकि लहरें तेल को वापस समंदर में धकेल देती हैं, लेकिन मैनग्रोव की जटिल और घनी जड़ें इस तेल और हानिकारक रसायनों को अपने भीतर सोख लेती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वहां का पूरा जीवन तंत्र घुट-घुट कर दम तोड़ देता है। इन वनों के नष्ट होने का सीधा प्रभाव वहां आश्रय लेने वाले दुर्लभ जीवों पर पड़ रहा है। मगरमच्छ, दरियाई छिपकली, कछुए और विभिन्न प्रकार की स्थानीय मछलियां जैसे चोनक और मुड्डोशी इसके प्रत्यक्ष शिकार बन रहे हैं। इसके साथ ही ऊदबिलाव, सियार, मड-क्रैब और सीप (कालवा और खुबे) जैसी संकटापन्न प्रजातियों का आवास उजड़ रहा है, तथा पनकौआ, बगुले और पेंटेड स्टॉर्क जैसे पक्षियों की प्रजनन भूमि भी समाप्त हो रही है।

शहरीकरण की अंधी दौड़ ने पर्यावरण को किस तरह हाशिए पर धकेल दिया है, इसका सबसे ज्वलंत और दुखद उदाहरण पणजी का ‘पाटो’ क्षेत्र है। वन विभाग और ‘मैनग्रोव सोसाइटी ऑफ इंडिया’ के विशेषज्ञों द्वारा किए गए गहन शोध के अनुसार, राज्य के आधे से अधिक मैनग्रोव वन पहले ही विकास की वेदी पर बलि चढ़ चुके हैं। सरकारी और निजी भवनों के निर्माण के लिए इन निचले दलदली क्षेत्रों को मलबे से पाट दिया गया, जिसने समुद्री खाद्य-श्रृंखला को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है। ‘गोवा, दमन और दीव वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1984 ‘ जैसे कड़े कानून कागजों पर तो मौजूद हैं, लेकिन धरातल पर अवैध कटाई, सीवेज का अनियंत्रित बहाव, औद्योगिक कचरा, और अवैध रेत-लौह अयस्क खनन लगातार जारी है।

इस संकट को केवल वृक्षों की कटाई के पारंपरिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता, इसके पीछे कई सूक्ष्म और विनाशकारी पर्यावरणीय कारक काम कर रहे हैं जो नीतिगत स्तर पर गंभीर विमर्श की मांग करते हैं। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। मैनग्रोव की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं और तटीय क्षरण को रोकती हैं। इनके कटने से गोवा के समुद्र तटों का तेजी से कटान हो रहा है, जिससे समुद्र का खारा पानी अंतर्देशीय कृषि भूमियों और मीठे पानी के स्रोतों में प्रवेश कर रहा है। इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि प्रत्येक एक हेक्टेयर मैनग्रोव वन के नष्ट होने से तटीय मत्स्य पालन को सालाना लगभग 480  टन  मछली का सीधा नुकसान होता है। इसका सीधा असर गोवा के पारंपरिक मछुआरा समुदाय की आजीविका पर पड़ा है, जिससे स्थानीय बाजारों में मछलियों की उपलब्धता घटी है और दाम आसमान छू रहे हैं। यह वन नदियों में बहकर आने वाले प्रदूषकों और भारी धातुओं को छानने वाली एक प्राकृतिक जलशोधन प्रणाली भी हैं, जिनके नष्ट होने से नदियों का पानी अत्यधिक जहरीला हो रहा है।

यदि हम भारत के पूर्वी तट (जैसे ओडिशा और पश्चिम बंगाल) पर दृष्टि डालें, तो वहां चक्रवात और सुनामी जैसी भीषण प्राकृतिक विभीषिकाओं को झेलने के बाद मैनग्रोव संरक्षण को लेकर जन-जागरूकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति कहीं अधिक सुदृढ़ हुई है। इसके विपरीत, पश्चिमी तट पर स्थित गोवा अब तक बड़े चक्रवातों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा है, जिसके कारण यहाँ शासन और समाज दोनों में एक आत्मसंतुष्टि का घातक भाव पनप गया है। परंतु हाल के वर्षों में अरब सागर में चक्रवातों की बदलती दिशा और बढ़ती आवृत्ति यह साफ चेतावनी दे रही है कि यदि ये तटीय वन नहीं रहे, तो अगली कोई भी प्राकृतिक आपदा सीधे रिहायशी इलाकों को जलमग्न कर देगी।

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