देहरादून के करीब बादल फटने ने चेता दिया है कि छोटी नदियों का अस्तित्व अनिवार्य है
पंकज चतुर्वेदी
देहरादून जोली ग्रांट हवाई अड्डे से ऋषिकेश जाते हुऐ आदर्श ग्राम रानीपोखरी में घुसने से ठीक पहले एक बड़ा सा पुल मिलता है जो एक नदी पर है । नदी – पानी की नहीं सफेद पत्थरों की नदी । वैसे इस नदी का नाम है – जाखन । अभी तीन दिन पहले तक कोई कह नहीं सकता था कि सूखी जाखन नदी डोईवाला के माजरी ग्रांट और लालतप्पड़ क्षेत्र में तबाही मचा देगी । नदी का पानी पुल के ऊपर आ गया, जिससे कई घंटे तक आवाजाही ठप रही। हरिद्वार-देहरादून हाईवे पर भी यातायात बाधित हो गया। नदी किनारे बसे घरों में पानी घुस गया। नदी ने कई जगह कटाव किया है।
इसी तरह लुप्त हो चुकी सौंग और सुसवा नदियां भी उफान पर आ गई । टेहरी जिले में कद्दूखाल चम्बा के मध्य स्थित पहाड़ियों बनाली से निकलती हुई जाखन नदी देहरादून के दक्षिण पूर्व में सौंग व सुसवा से मिलती हुई गंगा में समा जाती है । सफेद पत्थरों की नदी मान कर उपेक्षित ऐसी ही कोई दस नदियों ने सहस्रधारा में बादल फटने के बाद देहरादून के आसपास अपना रौद्र रूप दिखाया । समझना होगा कि ये सभी गैर-हिमानी नदियाँ भले ही छोटी हैं लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में चरम मौसम के हालात में जल का अतिरेक सहेजने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं, बशर्ते उनकी कोख में गाद न भरी हो ।
गंगा -यमुना जैसी बड़ी जल धाराएं पहाड़ के लोगों के लिए उपयोगी नहीं हैं, वे तो तेज प्रवाह से मैदानी इलाकों को आशीर्वाद देती हैं । इन नदियों पर बन रहे बांध भी पहाड़ से अधिक मैदान के लिए लाभकारी हैं । पहाड़ जिन जल धाराओं पर जिंदा है उनसे समाज और सरकार दोनों ही बेपरवाह है । गैर-हिमानी नदियां मुख्य रूप से वर्षा जल और भूमिगत जल से पोषित होती हैं। ये नदियां उत्तराखंड के मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन नदियों का पारिस्थितिक तंत्र भी बेहद संवेदनशील होता है और कई दुर्लभ प्रजातियों का घर है।
नेचुरल रिसोर्स डाटा मैनेजमेंट सिस्टम (एनआरडीएमएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश की तमाम बड़ी नदियों की 332 सहायक नदियां सूखकर बरसाती नदियों में तब्दील को चुकी हैं। कोसी नदी को जोड़ने वाले 36 गाड़-गधेरे सूख गए हैं। मेलनगाड़, छोटी कोसी, जथरागाड़, रनगाड़, देवगाड़, साईनाला, बेनगाड़, जैजलगाड़, सिमगाड़ आदि जो कोसी की सहायक नदियां थी वह अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं।
उत्तराखण्ड के लगभग 68 फीसदी भूभाग को गैर हिमानी नदियों और हजारों सरिताओं (धारे, गाड़-गधेरों) से पानी मिलता है । कोसी, गगास, गोमती, रामगंगा के उद्गम धर पानीधर से निकलने वाली 11 सहायक नदियां धीरे-धीरे सिकुड़ रही हैं। इसी तरह पश्चिमी राम गंगा नदी में 134 छोटे गाड़ गधेरे व नदियां सूख चुकी हैं।
दुर्भाग्य है कि समाज और सरकार दोनों ही छोटी नदियों के लुप्त होने की परवाह नहीं करता लेकिन यह भूल जता है कि हर नदी कभी इतनी छोटी नहीं होती कि इंसान उसे छोटी कह सके। साथ ही हर नदी की याददाश्त समान ही होती है । उसके जल-वहन और जल-ग्रहण क्षेत्र में कुछ दिन पानी न आने पर समाज उसकी उपेक्षा भले ही करे लेकिन साल-दशकों में ये नदियाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करवा देती हैं ।
यह तो अब समझ आ रहा है कि समाज, देश और धरती के लिए नदियाँ बहुत जरुरी है , लेकिन अभी यह समझ में आना शेष है कि छोटी नदियों पर ध्यान देना अधिक जरुरी है । गंगा, यमुना जैसी बड़ी नदियों को स्वच्छ रखने पर तो बहुत काम हो रहा है, पर ये नदियाँ बड़ी इसीलिए बनती है क्योंकि इनमें बहुत सी छोटी नदियाँ आ कर मिलती हैं, यदि छोटी नदियों में पानी कम होगा तो बड़ी नदी भी सूखी रहेंगी, यदि छोटी नदी में गंदगी या प्रदूषण होगा तो वह बड़ी नदी को प्रभावित करेगा ।
छोटी नदियां अक्सर गाँव, कस्बों में बहुत कम दूरी में बहती हैं। कई बार एक ही नदी के अलग अलग गाँव में अलग-अलग नाम होते हैं । बहुत नदियों का तो रिकार्ड भी नहीं है । हमारे लोक समाज और प्राचीन मान्यता नदियों और जल को ले कर बहुत अलग थी, बड़ी नदियों से दूर घर-बस्ती हो । बड़ी नदी को अविरल बहने दिया जाए । कोई बड़ा पर्व या त्यौहार हो तो बड़ी नदी के किनारे एकत्र हों, स्नान करें और पूजा करें ।
छोटी नदी , या तालाब या झील के आसपास बस्ती । यह जल संरचना दैनिक कार्य के लिए जैसे स्नान, कपडे धोने, मवेशी आदि के लिए । पीने की पानी के लिए घर- आँगन, मोहल्ले में कुआँ , जितना जल चाहिए, श्रम करिए , उतना ही रस्सी से खींच कर निकालिए । अब यदि बड़ी नदी बहती रहेगी तो छोटी नदी या तालाब में जल बना रहेगा , यदि तालाब और छोटी नदी में पर्याप्त जल है तो घर के कुएं में कभी जल की कमी नहीं होगी ।
एक मोटा अनुमान है कि आज भी देश में कोई 12 हज़ार छोटी ऐसी नदियाँ हैं , जो उपेक्षित है, उनके अस्तित्व पर खतरा है । नदियों के इस तरह रूठने और उससे बाढ़ और सुखाड के दर्द साथ –साथ चलने की कहानी देश के हर जिले और कसबे की है । लोग पानी के लिए पाताल का सीना चीर रहे हैं और निराशा हाथ लगती है , उन्हें यह समझने में दिक्कत हो रही हैं कि धरती की कोख में जल भण्डार तभी लबा-लब रहता है, जब पास बहने वाली नदिया हंसती खेलती हो ।
अंधाधुंध रेत खनन , जमीन पर कब्जा, नदी के बाढ़ क्षेत्र में स्थाई निर्माण , ही छोटी नदी के सबसे बड़े दुश्मन हैं – दुर्भाग्य से जिला स्तर पर कई छोटी नदियों का राजस्व रिकार्ड नहीं हैं, उनको शातिर तरीके से नाला बता दिया जाता है ।
“अर्थ फ्यूचर “ पत्रिका के अप्रेल -24 अंक में प्रकाशित शोध चेतावनी देता है कि पिछले ढाई दशकों के दौरान वार्षिक वर्षा और वनस्पति आवरण में वृद्धि के बावजूद, प्रमुख गैर-हिमानी नदियों की सहायक धाराओं का बारहमासी तंत्र का लगभग 82% गैर-बारहमासी प्रकृति में बदल गया है । इनकी प्रमुख नदी का प्रवाह इस अवधि में 16 गुना काम हो गया । इसलिए, गैर-हिमालाई प्रमुख नदियां घट रही हैं और अपने अस्तित्व के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं । जंगल की आग व लगातार भूस्खलन से गैर हिमानी नदियों की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ा है ।
जलवायु परिवर्तन: बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और ग्लेशियरों का पिघलना गैर-हिमानी नदियों के जलस्तर को प्रभावित कर रहा है। अत्यधिक मानवीय गतिविधियां: बढ़ती जनसंख्या, कृषि, उद्योग और पर्यटन के लिए पानी की अत्यधिक मांग नदियों के जलस्तर को कम कर रही है। वनों के अंधाधुंध कटाव से भूमिगत जलस्तर कम हो रहा है और मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है, जिससे नदियों में गाद की मात्रा बढ़ रही है। अवैध खनन से नदियों का बहाव बदल रहा है और उनके तलछट को नुकसान पहुंच रहा है। बड़े पैमाने पर बांधों का निर्माण नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर रहा है।
देहरादून के करीब बादल फटने ने चेता दिया है कि छोटी नदियों का अस्तित्व अनिवार्य है और यह बरसात- बादल फटने के दौरान न केवल बाढ़ से बचने में सक्षम है, बल्कि जमीन के कटाव को रोकने , तेज गर्मी को नियंत्रित करने आदि के लिए भी महत्वपूर्ण हैं ।