अध्ययन के परिणामों से पता चला है कि 1975 से 2019 के बीच अरावली की 3676 वर्ग किमी भूमि बंजर हो गई । इस अवधी में अरावली के वन क्षेत्र में 5772। 7 वर्ग किमी (7। 63 प्रतिशत) की कमी आई है । यदि यही हाल रहे तो 2059 तक कुल 16360। 8 वर्ग किमी (21। 64 प्रतिशत) वन भूमि पर कंक्रीट के जंग उगे दिखेंगे ।
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सावधान! कहर ढहाने वाली है लू
मार्च-24 में संयुक्त राष्ट्र के खाध्य और कृषि संगठन (एफ ए ओ ) ने भारत में एक लाख लोगों के बीच सर्वे कर एक रिपोर्ट में बताया है कि गर्मी/लू के कारण गरीब परिवारों को अमीरों की तुलना में पाँच फीसदी अधिक आर्थिक नुकसान होगा। चूंकि आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग बढ़ते तापमान के अनुरूप अपने कार्य को ढाल लेते हैं , जबकि गरीब ऐसा नहीं कर पाते ।
Read moreपानी बचाना है तो बचाएं पारंपरिक जल-प्रणालियाँ
सन् 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई और देश की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख
करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया ।
कश्मीर में देर से क्या हैं मायने
सत्तर दिन की बर्फबारी 15 दिन में सिमटने से दिसंबर और जनवरी में हुई लगभग 80-90 प्रतिशत कम बर्फबारी की भरपाई तो हो नहीं सकती । उसके बाद
गर्मी शुरू हो जाने से साफ जाहिर है कि जो थोड़ी सी बर्फ पहाड़ों पर आई है , वह जल्दी ही पिघल जाएगी । अर्थात आने वाले दिनों में एक तो ग्लेशियर पर निर्भर नदियों में अचानक बाढ़ या आसक्ति है और फिर अप्रेल में गर्मी आते-आते वहाँ पानी का अकाल हो सकता है ।
हिमालय में कम बर्फबारी के मायने
सत्तर दिन की बर्फबारी 15 दिन में सिमटने से दिसंबर और जनवरी में हुई लगभग 80-90 प्रतिशत कम बर्फबारी की भरपाई तो हो नहीं सकती । उसके बाद
गर्मी शुरू हो जाने से साफ जाहिर है कि जो थोड़ी सी बर्फ पहाड़ों पर आई है , वह जल्दी ही पिघल जाएगी । अर्थात आने वाले दिनों में एक तो ग्लेशियर पर निर्भर नदियों में अचानक बाढ़ या आसक्ति है और फिर अप्रेल में गर्मी आते-आते वहाँ पानी का अकाल हो सकता है ।
अपनी जल निधियाँ डुबाने से डूब रहा है चैन्नई
कूवम शब्द ‘कूपम ’ से बना है- जिसका अर्थ होता हैं कुआँ। कूवम नदी 75 से ज्यादा तालाबों के अतिरिक्त जल को अपने में सहजे कर तिरूवल्लूर जिले में कूपम नामक स्थल से उदगमित होती है। दो सदी पहले तक इसका उद्गम धरमपुरा जिले था, भौगोलिक बदलाव के कारण इसका उदगम स्थल बदल गया।
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