पारिस्थितिकी के अदृश्य नायक पर जलवायु परिवर्तन का प्रहार
पंकज चतुर्वेदी
प्रकृति के जटिल ताने-बाने में हर जीव की भूमिका पूर्व-निर्धारित है, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण अक्सर केवल उन्हीं जीवों तक सीमित रहता है जो दिन के उजाले में दिखाई देते हैं। आज जब जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भीषण हीटवेव और अनिश्चित मौसम के रूप में सामने आ रहा है, तब इन ‘इको-वॉरियर्स’ पर मंडराता संकट वास्तव में हमारी अपनी खाद्य सुरक्षा और वनों के भविष्य पर संकट है।अंधेरे, सीलन भरे उपेक्षित स्थानों पर उलटे लटके चमगादड़ अक्सर डर या अंधविश्वास का विषय रहे हैं, लेकिन वास्तव में ये हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के सबसे महत्वपूर्ण नायकों में से एक हैं। आज यह समज के लिए चिंता का विषय है कि जलवायु परिवर्तन चमगादड़ों के अस्तित्व और उनकी कार्यप्रणाली पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। चूंकि चमगादड़ पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं, इसलिए तापमान में मामूली बदलाव भी उनके जीवन चक्र को अस्त-व्यस्त कर देता है।
चमगादड़ों को अक्सर कीट-नियंत्रक के रूप में सराहा जाता है, लेकिन उनका योगदान मधुमक्खियों और पक्षियों की तरह परागण की प्रक्रिया में भी उतना ही अनिवार्य है। दुनिया भर में पौधों की 500 से अधिक प्रजातियां—जिनमें केला, आम, अमरूद और कोको जैसे महत्वपूर्ण फल शामिल हैं—अपने अस्तित्व के लिए चमगादड़ों पर निर्भर हैं। विशेष रूप से वे पौधे जिनके फूल केवल रात में खिलते हैं, उनके लिए चमगादड़ ही एकमात्र परागणकर्ता हैं। विडंबना यह है कि यदि ये जीव न होते, तो चॉकलेट का आनंद लेना हमारे लिए असंभव होता। यह केवल स्वाद का विषय नहीं है, बल्कि करोड़ों डॉलर की वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था का आधार है जो इन रात्रिकालीन उड़नदस्तों के पंखों पर टिका है।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में चमगादड़ ‘वनरक्षक’ की भूमिका को और अधिक प्रभावी ढंग से निभाते हैं। फल खाने वाले चमगादड़ बीजों को खाकर उन्हें मीलों दूर तक फैला देते हैं। उनके द्वारा उत्सर्जित बीजों में एक विशेष गुण होता है; उनके मल के साथ निकलने के कारण इन बीजों को प्राकृतिक खाद की परत मिल जाती है, जिससे इनके अंकुरित होने की दर बहुत अधिक होती है। पक्षियों के विपरीत, चमगादड़ अक्सर उजड़े हुए या कटे हुए जंगलों के बीच से उड़ान भरते हैं, जिससे वे उन इलाकों में भी जीवन का संचार करते हैं जहाँ इंसानी पहुंच या अन्य जीवों का जाना मुश्किल होता है। वे प्राकृतिक वनीकरण के सबसे सस्ते और सबसे कुशल माध्यम हैं।
पारिस्थितिकी के इस चक्र में चमगादड़ों का मल, जिसे ‘गुआनो’ कहा जाता है, मिट्टी के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम से भरपूर यह जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता को चमत्कारिक रूप से बढ़ा देती है। लेकिन आज बढ़ता प्रदूषण और 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाती हीटवेव उनके इस योगदान को रोक रही है। दिल्ली जैसे शहरों में ‘फ्लाइंग फॉक्स’ की सामूहिक मौतें और मेघालय की गुफाओं में खनन के कारण उनके बसेरों का विनाश यह संकेत दे रहा है कि हम एक ऐसी प्रजाति को खो रहे हैं जो हमारी खेती की लागत कम करती है।
हाल ही में जारी ‘स्टेट ऑफ इंडियाज बैट्स’ (2024-2025) रिपोर्ट ने चमगादड़ों की 135 प्रजातियों के साथ उनके उस आर्थिक और पर्यावरणीय योगदान को उजागर किया है, जिसे हम अक्सर डरावनी कहानियों के पीछे भूल जाते हैं। रिपोर्ट यह चेतावनी भी देती है कि कोविड-19 के बाद फैले निराधार डर ने उनके संरक्षण की राह में नई बाधाएं खड़ी कर दी हैं। लोग डर के मारे उनके बसेरों को नष्ट कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि चमगादड़ों की अनुपस्थिति कीटों की आबादी को अनियंत्रित कर देगी, जिससे बीमारियां घटने के बजाय और अधिक तेजी से फैलेंगी। फसलों को बचाने के लिए किसानों को और अधिक जहरीले कीटनाशकों का सहारा लेना होगा, जिससे हमारा भोजन और भी विषैला हो जाएगा।
हर साल बढ़ते तापमान कारण मादा चमगादड़ों में गर्भपात या बच्चों को दूध पिलाने की क्षमता में कमी देखी गई है। यह तो जानते हैं कि चमगादड़ शीतनिद्रा या प्रवास के बाद जब बाहर निकलते हैं, तो कभी-कभी उन्हें समय से पहले या देर से खिलने वाले फूलों और कीड़ों की कमी का सामना करना पड़ता है। यदि कीड़ों की संख्या घटती है, तो कीट-भक्षी चमगादड़ों के लिए अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जाता है। जलवायु परिवर्तन की मार से जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे उनके रहने के प्राकृतिक ठिकाने नष्ट हो रहे हैं। इसी तरह समुद्र तटीय इलाकों में रहने वाले चमगादड़ों की गुफाएं समुद्र का जलस्तर बढ़ने से डूबने के कगार पर हैं।
चरम मौसम के कारण चमगादड़ों की कई प्रजातियां ठंडे इलाकों की तलाश में उन क्षेत्रों की ओर पलायन कर रही हैं जहां वे पहले कभी नहीं देखी गई थीं। इससे नए क्षेत्रों में पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने और नई बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। चमगादड़ उड़ते हुए पानी पीते हैं। सूखे और बढ़ते तापमान के कारण छोटे तालाब और जल निकाय सूख रहे हैं, जिससे उन्हें निर्जलीकरण का सामना करना पड़ रहा है।
यह समझने का सही समय है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जीव जगत पर पढ़ने वाला हर कुप्रभाव इंसान को गहराई से प्रभावित कर रहा है और ऐसे में चमगादड़ केवल एक जीव नहीं, बल्कि एक संपूर्ण आर्थिक और पर्यावरणीय व्यवस्था के रक्षक हैं। जलवायु परिवर्तन की मार से उन्हें बचाना केवल नैतिकता का तकाजा नहीं, बल्कि हमारी अपनी उत्तरजीविता की जरूरत है। यदि हमने इन अदृश्य नायकों के संरक्षण के लिए वनीकरण और सुरक्षित पर्यावास जैसे ठोस कदम नहीं उठाए, तो प्रकृति का यह सुरक्षा कवच हमेशा के लिए टूट जाएगा, जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को भुगतनी होगी।