रवीन्द्र व्यास
“भूमि को पुनर्स्थापित करो, अवसरों को खोलो” के थीम के साथ मनाए जा रहे विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस ने बुंदेलखंड की सतह पर दबी हुई उन समस्याओं को फिर से उजागर कर दिया, जिनके संकेत वर्षों से मिल रहे थे। टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दतिया और सागर, झाँसी ,ललितपुर ,महोबा ,बांदा , हमीरपुर और चित्रकूट ये जिले अब केवल ऐतिहासिक विरासत और खनिज संसाधनों के लिए चर्चित नहीं रहे वे सूखे, भूजल क्षरण और मिट्टी के बनावट परिवर्तन का भी मापदण्ड बन चुके हैं।राज्य और क्षेत्र के आंकड़े इस चिंताजनक सच को उजागर करते हैं |
इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन इसरो की मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस-2021 के अनुसार मध्य प्रदेश का लगभग 12.52 प्रतिशत क्षेत्र (करीब 38.5 लाख हेक्टेयर) मरुस्थलीकरण से प्रभावित है | हालिया आधिकारिक आंकड़ों में यह 13.38 प्रतिशत तक आ चुका बताया गया है। देशव्यापी परिप्रेक्ष्य में भी हालत भयावह है , भारत का लगभग 30 प्रतिशत भू-क्षेत्र मरुस्थल या अर्ध-मरुस्थल से प्रभावित बताया जा रहा है। बुंदेलखंड के कई जिलो में वर्षा की अनियमितता और बार-बार पड़ने वाले सूखे ने मिट्टी की उत्पादकता को तेजी से नष्ट किया है।
बुंदेलखंड के अलावा चंबल क्षेत्र (भिंड, मुरैना, श्योपुर) और पश्चिमी मध्य प्रदेश (रतलाम, झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, गुना) भी खतरे की ओर हैं। बुंदेलखंड में टीकमगढ़, छतरपुर ,दतिया सागर और पन्ना , झांसी ,ललितपुर ,महोबा ,बांदा , हमीरपुर और चित्रकूट जैसे जिले भी बढ़ते मरुस्थलीकरण की जद में आ चुके हैं | इन जिलों के खेतों पर सूखा अब नियमित घटना बन चुका है | बोरवेल निर्भरता और पारंपरिक जल स्रोतों का सूखना स्थानीय खेती को अस्थिर कर रहा है।
बुंदेलखंड में कम वर्षा और अनियमित मानसून नियमित रूप से खेती पर प्रहार कर रहे हैं। साथ ही, अत्यधिक भूजल दोहन कृषि और पेयजल जरूरतों के लिए बोरवेल्स की अनियंत्रित खुदाई जल स्तरों को गिरा रही है। भू क्षरण , अनियंत्रित चरागाह, वनों की कटाई और अनुचित जल संचयन प्रणालियाँ भी इस समस्या को बड़ा रही हैं। उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी में क्षारीयता और लवणता बढ़ रही है, मध्य प्रदेश में लगभग 2.24 लाख हेक्टेयर भूमि गंभीर लवणता से प्रभावित बताई जाती है जो उपज क्षमता पर भारी असर डालती है।
मिट्टी में लवणता व क्षारीयता की समस्या से केवल उत्पादन घटने का कारण नहीं , यह किसान की आय और स्थानीय पारिस्थितिकी को भी प्रभावित करती है। लवणीय क्षेत्रों में बुनियादी सुधार के बिना फसलें ठीक से नहीं फलतीं और किसान बार-बार रासायनिक खादों का सहारा लेते हैं जो स्थायी नुकसान का चक्र बन जाता है। स्थानीय वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी की गुणवत्ता की अनदेखी के गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे |
मरुस्थलीकरण का प्रत्यक्ष असर खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर दिखता है। उत्पादन गिरने से स्थानीय बाजारों में फसलों की उपलब्धता प्रभावित होती है और महंगाई बढ़ती है। चारागाह घटने से चराई कम हुई और पशुपालन घटा है । इसके साथ ही गाँव वालों का शहरों की और पलायन भी बढ़ा , किसानों और युवा श्रमिकों का रोजगार के लिए पलायन एक नया सामाजिक जोखिम बन चुका है।
केंद्र एवं राज्य सरकारें न सिर्फ मरुस्थलीकरण रोकने की राष्ट्रीय योजनाएं चला रही हैं, बल्कि 2030 तक करोड़ों हेक्टेयर भूमि पुनर्स्थापित करने का लक्ष्य भी रखा गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने भी जल संचयन, घास-रोपण और सामुदायिक वन चर्चा की पहल शुरू की हैं। पर समस्या की जटिलता और स्थानीय धरातल पर नीतियों के व्यवहार्य क्रियान्वयन के अभाव के कारण बदलाव धीमा रहा है।
नीति-निर्धारकों और विशेषज्ञों की राय से स्पष्ट है कि मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए बहुआयामी उपाय जरूरी हैं | चेक-डैम, तालाबों और परम्परागत जल संचयन संरचनाओं का पुनर्निर्माण और सामुदायिक जल-सहभागिता के साथ जलस्तर रिचार्ज।कंटूर प्लानिंग व ढाल के अनुरूप खेती और मिट्टी सुरक्षात्मक उपायों को अपनाना जिसे प्रयोग आज की आवश्यकता बन गए हैं । बावड़ी, कुआँ , तालाब ,नदी , चौपाल-आधारित जल प्रबंधन और स्थानीय कृषि किस्मों का संरक्षण।लवणता नियंत्रण के लिए मीठा जल प्रबंधन, एल्कलाइन मिट्टी में कैल्शियम युक्त तथा कार्बनिक पदार्थों का उपयोग। सामुदायिक चारागाहों का संरक्षण, लोक-व्यवस्थाएँ और स्थानीय वृक्षारोपण अभियान।कृषि-विविधीकरण और वैकल्पिक आजीविका: सूखा-प्रतिरोधी फसलें, नर्सरी विकास और गैर-कृषि रोजगार के स्रोत विकसित करना।निगरानी और डेटा आधारित नीति: उपग्रह इमेजिंग व स्थानीय सर्वे से नियमित मानचित्रण और प्रभाव आकलन जैसे सतत्त प्रयास सिर्फ सरकार को नहीं हम सबको करने होंगे |
भूमि वैज्ञानिकों और स्थानीय पर्यावरणविदों का कहना है कि समाधान केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक-आर्थिक बदलावों के साथ होने चाहिए। एक वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ ने बताया, स्थानीय समुदायों को अधिकार और संसाधन दे कर उन्हें भूमि पुनर्स्थापना के केंद्र में रखना होगा; केवल ऊपर से नीतियाँ बनाकर कुछ हासिल नहीं होगा।
बुंदेलखंड ही नहीं दुनिया में मरुस्थलीकरण की लड़ाई जीतने के लिए नीतिगत मंच से लेकर गांव की चौपाल तक सामंजस्य जरूरी है। जलस्रोतों का संरक्षण, मिट्टी के उपचार और मेहनती किसानों को वैकल्पिक आय स्रोत देना जैसे प्रयास जमीन पर असर दिखाएंगे। साथ ही सरकारी योजनाओं का पारदर्शी क्रियान्वयन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी की अनिवार्यता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। हालंकि बुंदेलखंड के लिए यह एक अच्छा प्रयास सरकार द्वारा जरूर किया जा रहा है कि सिचाई के लिए बड़े स्तर पर बांधों का निर्माण किया जा रहा है | वहीँ दूसरी तरफ सड़क ,सिचाई और अन्य परियोजनाओं के नाम पर वृक्षों को बड़े स्तर पर काटा भी जा रहा है | मतलब एक समस्या निदान के साथ चार और समस्या देने का कार्य हो रहा है |