महिलाओं के सिर पर मटका, उद्योगों के हाथ में पानी अन्याय की नई रेखा

भारत में भूजल की स्थिति दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है और इस संकट की ओर कई दशकों से अनदेखी हो रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जनवरी २०२६ में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के अहवाल पर कड़ी नाराज़गी व्यक्त की। इस अहवाल में मांगी गई महत्वपूर्ण जानकारी नहीं थी, भूजल के संकटग्रस्त क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं को अनुमति देने के लिए कौन-से मानदंड उपयोग किए जाते हैं यह बताने से परिहार किया गया था और कुल मिलाकर इस दस्तावेज़ का स्वर अस्पष्ट और अधूरा था। जब न्यायाधिकरण ने इस बारे में पूछताछ की, तब प्राधिकरण ने कहा कि मानदंड तय करने का काम राज्यस्तरीय नियामक संस्थाओं का है। परंतु न्यायाधिकरण ने तुरंत आगे का सवाल पूछा कि जब अधिकतर राज्यों ने ऐसी संस्थाएँ ही स्थापित नहीं की हैं, तो फिर अनुमति प्रक्रिया वास्तव में कैसे चलाई जाती है? व्यावसायिक उपयोग के लिए ऑडिट रिपोर्ट प्रकाशित होती हैं या नहीं, समय-समय पर अनापत्ति प्रमाणपत्र दिए जाते हैं या नहीं, नियम तोड़नेवालों पर पर्यावरणीय दंड कितना लगाया गया  इन सभी सवालों के जवाब प्राधिकरण के पास नहीं थे। यह स्थिति केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं है, बल्कि देश के एक बुनियादी प्राकृतिक संसाधन के प्रबंधन में मौजूद गहरी खाई है।

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के २०२४ के अहवाल के अनुसार भारत में भूजल दोहन की औसत दर ६०.४७ प्रतिशत तक पहुँच गई है, जो २०२३ के ५९.२६ प्रतिशत से अधिक है। केवल २०२४ में २४५.६४ अरब घनमीटर भूजल निकाला गया। इसमें से ८७ प्रतिशत यानी २१३.२९ अरब घनमीटर अकेले कृषि क्षेत्र ने उपयोग किया, घरेलू उपयोग ११ प्रतिशत और औद्योगिक उपयोग केवल दो प्रतिशत है। देश के ६,७४६ मूल्यांकन घटकों में से ७५१ घटक यानी ११ प्रतिशत से अधिक “अतिशोषित” के रूप में वर्गीकृत हुए हैं, यानी वहाँ भूजल दोहन वार्षिक पुनर्भरण से ज़्यादा है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और दादरा व नगर हवेली इन राज्यों में तो १०० प्रतिशत से अधिक भूजल दोहन हो रहा है। यानी इन राज्यों में प्रकृति जितना पानी ज़मीन में सोखती है उससे भी ज़्यादा पानी निकाला जा रहा है। यह तस्वीर केवल चिंताजनक नहीं है, बल्कि आनेवाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत ख़तरनाक है।

भूजल की मात्रा कम होना तो एक समस्या है ही, पर भूजल की गुणवत्ता में भी तेज़ी से गिरावट आ रही है। एनजीटी ने २०२४ की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश के भूजल में क्षारता, फ्लोराइड और भारी धातुओं की मात्रा बढ़ रही है। उससे भी अधिक चिंताजनक जानकारी यह है कि भारत के भूजल में यूरेनियम का अस्तित्व है। २०१९-२० में पहली बार देशव्यापी सर्वेक्षण किया गया और उसमें १४,३७७ नमूनों की जाँच की गई। उसमें पाया गया कि कुछ स्थानों पर पानी में यूरेनियम की मात्रा निर्धारित सीमा से पूरे ९६ गुना अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी में यूरेनियम की सीमा ३० माइक्रोग्राम प्रति लीटर निश्चित की है। पंजाब में तो २४.२ प्रतिशत कुओं में इस सीमा से अधिक यूरेनियम पाया गया, हरियाणा में १९.६ प्रतिशत, दिल्ली में ११.७ प्रतिशत और तेलंगाना में १०.१ प्रतिशत कुओं में यह भयावह स्थिति है। भारतीय मानक ब्यूरो ने अभी तक पीने के पानी में यूरेनियम के लिए कोई राष्ट्रीय मानदंड निश्चित नहीं किया है, यह इस समस्या की गंभीरता की ओर हो रही अनदेखी का प्रतीक है। १८ राज्यों के १५१ ज़िले आंशिक रूप से इस उच्च यूरेनियम सघनता से प्रभावित हैं और लाखों लोग अनजाने में यह दूषित पानी पी रहे हैं।

इस पूरे जल संकट का सबसे पीड़ादायक और मानवीय चेहरा हैं स्त्रियाँ और लड़कियाँ। संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार जलसंकटग्रस्त क्षेत्रों में पानी लाने की ८० प्रतिशत ज़िम्मेदारी महिलाओं पर आ पड़ती है। सिर पर मटका, हाथों में बाल्टियाँ और ड्रम लेकर ये महिलाएँ रोज़ लगभग २५ करोड़ घंटे केवल पानी जुटाने में बिताती हैं। यह वह समय है जो उनकी शिक्षा में, आजीविका में और स्वास्थ्य में लगाया जा सकता था। पानी की कमी लड़कियों की शिक्षा पर सीधा प्रहार करती है। स्वच्छता से लेकर सुरक्षित प्रसव तक दुनिया की २७ प्रतिशत स्त्रियाँ पर्याप्त पानी न होने के कारण स्वास्थ्य के ख़तरे में हैं। विडंबना यह है कि जिन महिलाओं को जल प्रबंधन का सबसे प्रत्यक्ष अनुभव है, उनकी निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी १७ प्रतिशत से भी कम है। पानी के लिए मेहनत महिलाओं की, पर अधिकार और नीतियाँ पुरुषों के हाथ में — यह विषमता आज भी बनी हुई है।

अब इस पृष्ठभूमि पर एक नया, तुलनात्मक रूप से अदृश्य पर तेज़ी से विकराल होता जा रहा जल संकट खड़ा हो रहा है, और वह है कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई से जुड़ा संकट। हम आमतौर पर एआई को मोबाइल ऐप, चैटबॉट या फ़ोटो बनानेवाला साधन मानकर देखते हैं और उसे आभासी समझने की भूल करते हैं। परंतु इन सेवाओं के पीछे खड़ी यंत्रणा बेहद भौतिक है  हज़ारों सर्वरों से भरा डेटा सेंटर, जिसमें अरबों ट्रांज़िस्टर वाली चिप्स चौबीस घंटे काम करती रहती हैं। ये चिप्स एआई मॉडल चलाते समय भारी मात्रा में बिजली खर्च करती हैं और उतनी ही मात्रा में गर्मी उत्पन्न करती हैं। यह गर्मी नियंत्रित न की जाए तो चिप ख़राब हो जाती है और पूरी यंत्रणा ठप हो सकती है। इसीलिए इन डेटा सेंटरों को निरंतर ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग करना पड़ता है। एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर साल भर में लगभग ११ करोड़ गैलन पानी केवल शीतलीकरण के लिए उपयोग कर सकता है, जो लगभग एक हज़ार घरों की वार्षिक पानी की ज़रूरत के बराबर है। बड़े डेटा सेंटर तो रोज़ाना ५० लाख गैलन तक पानी खर्च कर सकते हैं  यानी अकेले एक केंद्र का वार्षिक पानी उपयोग दस हज़ार से पचास हज़ार जनसंख्या वाले किसी छोटे शहर की ज़रूरत के बराबर हो सकता है। विकसित देशों में तो कुछ ही वर्षों में डेटा सेंटरों की संख्या में इतनी तेज़ वृद्धि हुई कि स्थानीय प्रशासन को घरेलू उपयोग से अधिक पानी उद्योग और डिजिटल बुनियादी सुविधाओं को देना पड़ रहा है।

एआई का पानी का निशान यानी वॉटर फ़ुटप्रिंट केवल डेटा सेंटर में मॉडल चलाने तक सीमित नहीं है। यह उस सेमीकंडक्टर चिप के निर्माण से ही शुरू होता है जिस पर एआई मॉडल चलता है। इन चिप्स के उत्पादन और सफ़ाई के लिए अत्यंत शुद्ध पानी की आवश्यकता होती है और यह शुद्धीकरण मूलतः बेहद पानी सोखने वाली प्रक्रिया है। एक अकेली चिप, जो आख़िरकार किसी डेटा सेंटर में जोड़ी जाती है, उसने अपने निर्माण की यात्रा में ही हज़ारों गैलन पानी उपयोग किया होता है। उसके बाद वह चिप एआई मॉडल चलाते समय शीतलीकरण के लिए और पानी माँगती है। एआई की ऊर्जा आवश्यकता के कारण यह पानी का गणित और भी जटिल हो जाता है। दुनिया के कई हिस्सों में बिजली अभी भी कोयला और गैस आधारित थर्मल पावर प्लांट पर निर्भर है, जिसमें भारी मात्रा में पानी खर्च होता है। वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक और वर्ल्ड वॉटर डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका, चीन और फ्रांस सहित कई देशों में कुल पानी का ३०-४० प्रतिशत हिस्सा केवल ऊर्जा उत्पादन में जाता है। शीतलीकरण के बाद कुछ पानी वापस आता है, पर गर्म होकर, जिससे स्थानीय नदियों और तालाबों का पर्यावरण तंत्र प्रभावित होता है। बाकी पानी वाष्प के रूप में उपयोग चक्र से बाहर चला जाता है। इसका अर्थ यह है कि डेटा सेंटर में सीधे उपयोग होने वाले पानी के अतिरिक्त उनकी बिजली के पीछे छिपा एक बड़ा अदृश्य वॉटर फ़ुटप्रिंट होता है।

इस सबके परिणाम रोज़मर्रा के उपयोग में कितने गहरे हैं यह समझना महत्वपूर्ण है। बड़े भाषा मॉडलों पर किए गए शोध के अनुसार एक सामान्य एआई प्रश्नोत्तर संवाद, यानी १०० से २०० शब्दों का सवाल-जवाब, इसमें अप्रत्यक्ष रूप से लगभग एक पानी की बोतल जितना पानी पहले ही उपयोग हो जाता है। यह पानी वास्तव में दिखाई न देने के कारण हमें महसूस नहीं होता, पर जब करोड़ों उपयोगकर्ता रोज़ लाखों-करोड़ों प्रॉम्प्ट चलाते हैं, तब यह अदृश्य पानी का उपयोग एक विशाल आँकड़े में बदल जाता है। ‘मेकिंग एआई लेस थर्स्टी’ इस शोध के अनुसार केवल २०२५ इस एक वर्ष में वैश्विक एआई प्रणालियाँ जितना पानी अप्रत्यक्ष रूप से उपयोग कर सकती हैं, वह दुनिया के संपूर्ण बोतलबंद पानी उद्योग के वार्षिक जल उपयोग के स्तर तक पहुँच सकता है।

यहाँ आधुनिक काल की सबसे कड़वी विसंगति सामने आती है। एक तरफ़ एक लड़की है, जो रोज़ सुबह स्कूल जाने से पहले दो-तीन किलोमीटर पैदल चलकर पानी भरती है और अक्सर इसी कारण उसकी शिक्षा बाधित होती है। दूसरी तरफ़ एक डेटा सेंटर है, जिसका बड़ा हिस्सा अक्सर अनावश्यक प्रॉम्प्ट्स से भरा होता है, जो अकेले एक दिन में इतना पानी खर्च करता है, जितना उस लड़की ने या उसके जैसी सैकड़ों-हज़ारों महिलाओं ने मिलकर शायद अपने जीवन में कभी अपने मटके में देखा भी न हो। दोनों एक ही सीमित वैश्विक मीठे पानी के भंडार से हिस्सा ले रहे हैं, परंतु निर्णय-क्षमता में, लाभ के बँटवारे में और भागीदारी में इनके बीच गहरी खाई है।

एआई आधारित सेवाओं का सबसे अधिक लाभ अक्सर उन्हीं समाजों और वर्गों को मिलता है जो पहले से ही अपेक्षाकृत समृद्ध हैं  कॉर्पोरेट क्षेत्र, ग्लोबल नॉर्थ, शहरी मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग। पर जल संकट की मार उन समुदायों पर पड़ती है जिनका पानी पर सबसे कम नियंत्रण है और जिनके दिन का बड़ा हिस्सा पानी की खोज में जाता है। यह केवल तकनीकी या आर्थिक असमानता नहीं है, बल्कि एक नैतिक सवाल है जो आज जवाब माँग रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि एआई “ग़लत” है या हमें तकनीक से मुँह मोड़ लेना चाहिए। सवाल यह है कि एआई का विकास और उपयोग किस रूप में, किस क़ीमत पर और किस ज़िम्मेदारी के साथ हो रहा है? अगर एआई मॉडल स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती, मौसम, शोध या आपदा-पूर्वानुमान में सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं, तो यह स्वागत योग्य है। परंतु यह भूमिका तभी न्यायपूर्ण मानी जाएगी जब उनके विकास और संचालन में उपयोग होने वाला पानी, पहले से ही गंभीर संकट में फँसे समुदायों की पानी की उपलब्धता को ख़तरे में नहीं डालेगा  विशेषकर महिलाओं और गरीबों की। इसके लिए कंपनियों को अपने एआई मॉडलों का कुल जल उपयोग पारदर्शी रूप से सार्वजनिक करना आवश्यक है। शीतलीकरण तकनीक में पुनर्चक्रित या पीने योग्य न पानी का ही उपयोग होना चाहिए। सामान्य उपयोगकर्ताओं में भी डिजिटल जागरूकता बढ़ाने की ज़रूरत है कि हर अनावश्यक एआई प्रक्रिया के पीछे कहीं न कहीं पानी का अतिरिक्त भार जुड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम हर सवाल पूछने से डरें, बल्कि इसका अर्थ है कि हम सजगता से सोचें कि हर काम के लिए एआई का उपयोग वास्तव में आवश्यक है या नहीं। नीति-निर्माताओं और कंपनियों को अब यह सवाल पूछने का समय आ गया है कि “तुम्हारा एआई कितना समझदार है” इसके साथ ही “वह कितना पानी पीता है?”

अगर हमें यह चाहिए कि भविष्य में किसी भी लड़की को कुछ बाल्टी पानी के लिए अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य दाँव पर न लगाना पड़े, तो हमें आज ही यह सुनिश्चित करना होगा कि एआई और डेटा सेंटरों की जल-भूख, उन समुदायों के अधिकारों और ज़रूरतों से ऊपर प्राथमिकता न पाए। एआई का सवाल केवल एल्गोरिद्म और मॉडल-आर्किटेक्चर का नहीं है  यह पानी, न्याय और लैंगिक समानता का भी सवाल है। पानी की बुनियादी ज़रूरत को सर्वप्रथम प्राथमिकता देनी होगी। ज़िम्मेदार तकनीक वही होगी जो इस सत्य को स्वीकार करेगी और अपनी हर नई विस्तार योजना में पानी और उससे जुड़े लोगों को केंद्र में रखेगी।

विकास परसराम मेश्राम

मु+पो, झरपड़ा, ता. अर्जुनी/मोर, ज़िला गोंदिया

मोबाइल नंबर – 7875592800

vikasmeshram04@gmail.com

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