दाल उत्सव , परंपरा, पोषण और खाद्यस्वराज का संगम

राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के आदिवासी अंचलों में खेती कभी केवल अनाज उगाने की क्रिया नहीं रही। यह जीवन जीने का एक पूरा दर्शन है  इसमे ऐसी व्यवस्था जिसमें  जल , जंगल, जमीन,  जानवर , बीज, श्रम और भोजन के बीच एक अटूट रिश्ता है इन क्षेत्रों के किसान परिवारों के खेतों में मूंग, चना, उड़द जैसी दलहनी फसलें उगती थीं और उनका पहला हक परिवार की थाली पर होता था, बाजार पर नहीं। घरों में महिलाएं पत्थर की चक्की  जिसे स्थानीय भाषा में ‘घटी’ या ‘घट्टी’ कहते हैं  पर दाल तैयार करती थीं। यह प्रक्रिया केवल भोजन बनाने की नहीं थी, बल्कि स्थानीय ज्ञान की परंपरा थी जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्त्रियों के हाथों से होती हुई आगे बढ़ती थी। घटी  खाद्य स्वराज का प्रतीक थी।

लेकिन समय ने करवट बदली। आधुनिकता की लहर के साथ मशीनी प्रसंस्करण का चलन बढ़ा, बाजार की मांगों ने खेती की दिशा बदल दी और दलहनें जो कभी घर के पोषण की रीढ़ थीं, वे अब नकदी फसल बन गईं। खेतों में उगी दाल मंडियों तक पहुंचने लगी, घरों तक नहीं। महिलाओं की वह केंद्रीय भूमिका जो वे खाद्य उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण तक निभाती थीं  धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई। इसी रिक्तता को भरने के लिए वागधारा  संस्था, कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन और ‘माही महिला किसान मंच’ ने मिलकर एक असाधारण पहल की  ‘दाल उत्सव’। यह नाम जितना सरल है, इसके भीतर की भावना उतनी ही गहरी। यह आयोजन का उदेश्य , आदिवासी समुदाय की उस विरासत को पुनर्जीवित करने का संकल्प था ।

दाल उत्सव का संदेश बिल्कुल स्पष्ट था  खेत में उगाई गई फसल का पहला अधिकार परिवार के पोषण पर होना चाहिए, बाजार पर नहीं। यही खाद्य स्वराज की मूल आत्मा है। और इस संदेश को जिन महिलाओं ने सबसे गहराई से समझा, जो गांवों की स्त्रियां जो दशकों से अपनी मेहनत का फल किसी और के हाथों में जाते देखती रही थीं।

कार्यक्रम का आयोजन विभिन्न ब्लॉकों में हुआ और उसकी गूंज दूर-दूर तक पहुंची। छोटी बड़वास, अमलीपाड़ा, बिलुड़ा, जेतपुरा, मटिया, टामटिया, वंडा, गणेशपुरा, रायपुरा, नानी ढढेली, बिजोर और महापुरा राठौड़ जैसे गांवों में महिलाएं अपने खेतों की मूंग और अन्य दलहनें लेकर आईं। वे आईं तो केवल दाल बनाने नहीं, बल्कि अपनी पहचान को फिर से पहचानने। उन्होंने घटी संभाली, उसे घुमाया और उस पूरी प्रक्रिया को फिर से जीवंत किया जो उनकी माओं और नानियों की स्मृति में थी। कुल 1,398 महिलाओं ने इस उत्सव में सक्रिय भागीदारी की  और सामूहिक जागरण की अभिव्यक्ति थी।

सैकड़ों महिलाएं एक साथ बैठी हैं, हाथ घटी पर हैं, बातें हो रही हैं,  अनुभव साझा हो रहे हैं और दाल बन रही है  घटी चलाने में जो धैर्य चाहिए, जो लय चाहिए, जो सहजता चाहिए  वह सब उस दिन उन महिलाओं के हाथों में जीवंत थी। बड़ी पीढ़ी की महिलाएं युवतियों को सिखा रही थीं, युवतियां देख-देखकर सीख रही थीं और बच्चे यह सब देखकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ रहे थे। यही तो पारंपरिक ज्ञान का जीवंत हस्तांतरण है।

इस उत्सव का परिणाम केवल आत्मिक नहीं, भौतिक भी था। सामूहिक श्रम से लगभग 2868  किलोग्राम दाल पारंपरिक तरीके से तैयार की गई। इसके साथ 131 किलोग्राम दाल चूरी और 49 किलोग्राम भूसा भी मिला जो पशुपालन और घरेलू उपयोग के काम आया। तैयार दाल में से 497 किलोग्राम का विक्रय किया गया और शेष दाल महिलाएं अपने घरों के लिए ले गईं। बाजार में दालों की जो कीमत है, उसे देखते हुए इन परिवारों की जो खाद्य बचत हुई, वह उल्लेखनीय है। जो पैसा दाल खरीदने में जाता, वह अब परिवार की दूसरी जरूरतों के लिए उपलब्ध हुआ।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो दाल उत्सव ने महिलाओं के सामने एक नई संभावना खोल दी। आदिवासी क्षेत्रों में महिलाएं खेती में अपना पूरा परिश्रम लगाती हैं लेकिन उनकी मेहनत का आर्थिक मूल्यांकन अक्सर नहीं होता। वे उत्पादन करती हैं पर उत्पाद का मूल्य पुरुषों के माध्यम से या बाजार के जरिए ही प्राप्त होता है। दाल उत्सव ने यह श्रृंखला तोड़ी। जब महिलाओं ने स्वयं दाल प्रसंस्कृत की  इस अनुभव ने उनके भीतर एक नई सोच जगाई जो इस पहल के दूरगामी प्रभाव का संकेत है।

पोषण की दृष्टि से भी यह उत्सव अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। आदिवासी अंचलों में कुपोषण, एनीमिया और प्रोटीन की कमी आज भी एक गंभीर चुनौती है। दालें प्रोटीन का सबसे सस्ता और सुलभ स्रोत हैं, लेकिन जब वे बाजार के रास्ते घर आती हैं तो उनकी पहुंच सीमित हो जाती है। दाल उत्सव ने इस दूरी को पाट दिया। परिवारों तक शुद्ध, ताजा और स्थानीय दालें पहुंचीं  वे दालें जो रासायनिक प्रसंस्करण से नहीं गुजरी थीं, जिन पर किसी बड़ी मिल की मुहर नहीं थी, बल्कि जिन पर था एक किसान स्त्री के हाथों का स्पर्श और उसके खेत की माटी की महक। महिलाओं ने स्वयं कहा कि घर पर बनी दाल और बाजार की दाल में जो फर्क है, वह स्वाद में तो है ही, विश्वास में भी है।

इस  दाल उत्सव कार्यक्रम ने खाद्य सुरक्षा के उस आयाम को भी उजागर किया जो अक्सर नीतिनिर्माताओं की नजर से ओझल रहता है  खाद्य विविधता। आज जब वैश्विक खाद्य प्रणालियां कुछ गिनी-चुनी फसलों पर निर्भर होती जा रही हैं, स्थानीय दलहनों का संरक्षण और उपयोग एक गहरी पारिस्थितिकीय और सामाजिक जरूरत बन जाती है। दाल उत्सव ने इस जरूरत को सामुदायिक उत्सव का रूप दिया।

यह उत्सव एक बड़ा सवाल भी सामने रखता है  विकास का अर्थ क्या है? क्या विकास का मतलब केवल बड़े कारखाने, मशीनें और तकनीकें हैं? या विकास वह भी है जो  इन महिलाओ के हाथों में घटी थामने से शुरू होता है और उसके परिवार की थाली तक पहुंचता है? दाल उत्सव ने यह सिद्ध किया कि सबसे टिकाऊ विकास वही है जो स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी पर खड़ा हो। उसमें किसी बाहरी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं, बल्कि उन महिलाओं के ज्ञान की जरूरत है जो सदियों से यह काम करती आई हैं।माही महिला किसान मंच की इस पहल ने यह भी दर्शाया कि मंच  तब सबसे प्रभावशाली होते हैं जब वे समुदाय की अपनी शक्ति को पहचानकर उसे मंच देते हैं, उनके लिए कुछ करने के बजाय उनके साथ मिलकर। इस कार्यक्रम में महिलाएं केवल उपस्थित नहीं थीं  वे आयोजक थीं,  उत्पादक  थीं। यह भूमिकाओं का यह समन्वय ही स्त्री नेतृत्व की वास्तविक परिभाषा है।जलवायु परिवर्तन, बाजार की अस्थिरता और कुपोषण की त्रिकोणीय चुनौती के इस दौर में दाल उत्सव जैसी पहलें एक वैकल्पिक मार्ग दिखाती हैं। यह मार्ग आत्मनिर्भरता का है, सांस्कृतिक गर्व का है और उस सामूहिक बुद्धिमत्ता का है जो आदिवासी स्त्री के हाथों की लकीरों में छिपी है।  1,398  महिलाओं का यह संकल्प, 1515 किलोग्राम दाल का यह उत्पादन और सैकड़ों परिवारों तक पहुंचा यह पोषण  ये सब मिलकर एक ऐसे भविष्य की नींव रखते हैं जहां खाद्य स्वराज केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकता होगी।–

विकास परसराम मेश्राम

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