पूर्वोत्तर पर तिब्बत में चीनी बांध का पहरा
पंकज चतुर्वेदी
तिब्बत के पठार से निकलकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जीवन देने वाली यारलुंग त्साँगपो यानी ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की जलविद्युत महत्वाकांक्षाएं अब धरातल पर पूरी तरह उतर चुकी हैं। तिब्बत के ग्यात्सा काउंटी में 510 मेगावाट क्षमता और 116 मीटर ऊंचे जांगमु जलविद्युत परियोजना के औपचारिक रूप से पूर्ण होने की घोषणा ने भारत, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश और असम में, एक नई और गंभीर चिंता को जन्म दे दिया है। हालांकि चीन इसे एक सामान्य जलविद्युत परियोजना बताकर दुनिया की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास कर रहा है, लेकिन भू-राजनीतिक विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के वैश्विक शोध इस बात की तस्दीक करते हैं कि यह परियोजना भारत की सुरक्षा, जल संप्रभुता और पर्यावरण के लिए एक शांत खतरे की दस्तक है। ब्रह्मपुत्र नदी पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रीढ़ है, इसलिए ऊपरी प्रवाह में होने वाली किसी भी बड़ी हलचल का सीधा और दूरगामी असर हमारी सीमावर्ती आबादी पर पड़ना तय है।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले तिब्बत के संवेदनशील भूगोल और चीन की मंशा को समझना होगा। तिब्बत का यह पूरा क्षेत्र अत्यधिक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र में आता है, जहाँ 8 से अधिक तीव्रता वाले विनाशकारी भूकंप आने का खतरा हमेशा बना रहता है। इतने नाजुक और खतरनाक भूगर्भीय क्षेत्र में विशालकाय कंक्रीट के ढांचे खड़े करना प्रकृति से सीधा खिलवाड़ है। चूंकि जांगमु बांध अब पूरी तरह तैयार हो चुका है और संचालित है, इसलिए भविष्य में किसी बड़े भूकंप या बड़े पैमाने पर होने वाले भूस्खलन के कारण इस ढांचे को कोई भी नुकसान पहुंचता है, तो यह निचले इलाकों के लिए तबाही का सबब बनेगा। इसके अलावा, किसी सामरिक तनाव या युद्ध की स्थिति में यदि चीन राजनीतिक दुर्भावना के तहत अचानक इस बांध से भारी मात्रा में पानी छोड़ता है, तो यह अरुणाचल प्रदेश के लिए एक मानव-निर्मित जल-बम की तरह काम करेगा। इसके परिणामस्वरूप आने वाली विनाशकारी और अप्रत्याशित अचानक बाढ़ चंद घंटों में पूरे पूर्वोत्तर को अपनी आगोश में ले सकती है, जिससे जान-माल का ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई नामुमकिन होगी।
दूसरी बड़ी चिंता पानी की उपलब्धता और उसके प्रवाह के तौर-तरीकों को लेकर है। चीन लगातार यह दलील देता रहा है कि उसकी यह परियोजना नदी के स्वाभाविक बहाव पर आधारित है और वह पानी का भंडारण नहीं कर रहा है। लेकिन जल विज्ञान के जानकारों का कहना है कि बिजली उत्पादन की अपनी दैनिक जरूरतों और पीक ऑवर्स की मांग को पूरा करने के लिए नदी के पानी को दिन के कुछ घंटों में रोकना और फिर अचानक छोड़ना चीन की तकनीकी मजबूरी होगी। सर्दियों के शुष्क मौसम में, जब नदी में पानी का प्राकृतिक प्रवाह वैसे ही बेहद कम हो जाता है, तब इस तरह के व्यवधान से निचले इलाकों में पानी का पूरा चक्र और उपलब्धता बुरी तरह प्रभावित होगी। इसके कारण अरुणाचल प्रदेश के सियांग जिले और असम के मैदानी इलाकों में सर्दियों के दिनों में अचानक कृत्रिम सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। कृषि, घरेलू उपयोग और पशुधन के लिए पानी का यह संकट पूर्वोत्तर के ग्रामीण जीवन को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर देगा।
पर्यावरणीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक और गंभीर संकट नदी के साथ बहकर आने वाली उपजाऊ गाद का रुक जाना है। यारलुंग त्साँगपो तिब्बत के पहाड़ों को काटते हुए अपने साथ भारी मात्रा में पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी लेकर आती है, जो असम और अरुणाचल के मैदानों को अविश्वसनीय रूप से उपजाऊ बनाती है। इस विशाल बांध के पूरी तरह क्रियान्वयन में आने से अब यह आवश्यक गाद तिब्बत की सीमाओं के भीतर, बांध के पीछे ही जमा होने लगेगी। जब बिना गाद का यह साफ और तेज पानी अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं में प्रवेश करेगा, तो जल विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार इसकी गतिज ऊर्जा बहुत अधिक होगी। यह बिना मिट्टी वाला पानी नदी के किनारों और तलों का तेजी से कटाव करेगा। इसके परिणामस्वरूप नदी अप्रत्याशित रूप से अपना रास्ता बदलने पर मजबूर होगी, जिससे तटीय बस्तियां डूब जाएंगी और पूर्वोत्तर की विशाल कृषि भूमि धीरे-धीरे बंजर होने लगेगी।
यह केवल इंसानी आबादी के विस्थापन या खेती के नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवीय हस्तक्षेप पूर्वोत्तर की उस अनूठी और समृद्ध जैव-विविधता को भी स्थायी नुकसान पहुंचाएगा जो काजीरंगा जैसे विश्व प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों और अत्यंत दुर्लभ जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास है। ब्रह्मपुत्र का पारिस्थितिकी तंत्र एक नाजुक संतुलन पर टिका है। पानी के तापमान में मामूली बदलाव, ऑक्सीजन के स्तर में गिरावट और प्रवाह की अनिश्चितता के कारण नदी में पाए जाने वाले जीवों, विशेषकर लुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन और विभिन्न स्थानीय मछलियों की प्रजातियों का अस्तित्व ही दांव पर लग जाएगा।
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू भू-राजनीतिक और कूटनीतिक है। भारत और चीन के बीच पानी के बंटवारे को लेकर कोई औपचारिक और बाध्यकारी जल-साझाकरण संधि अस्तित्व में नहीं है। भारत पूरी तरह से चीन द्वारा सद्भावना के तहत साझा किए जाने वाले आंकड़ों पर निर्भर रहा है। लेकिन चीन का ट्रैक रिकॉर्ड इस मामले में बेहद अविश्वसनीय रहा है। वर्ष 2017 के डोकलाम विवाद के समय चीन ने स्थापित द्विपक्षीय समझौतों और स्थापित प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर भारत के साथ मानसून के दौरान साझा किया जाने वाला जल-सांख्यिकी डेटा अचानक बंद कर दिया था। बिना किसी पूर्व चेतावनी और सटीक आंकड़ों के, हमारे स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभागों के लिए सीमा पार से आने वाली बाढ़ या सूखे का सटीक पूर्वानुमान लगाना लगभग असंभव हो जाता है। चीन की यह डेटा कूटनीति स्पष्ट करती है कि वह पानी को एक सामान्य प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि भारत के खिलाफ एक रणनीतिक और सामरिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की दीर्घकालिक योजना पर काम कर रहा है।
इस चीनी जल-आक्रामकता और वर्चस्व का प्रभावी मुकाबला करने के लिए भारत को अपनी पुरानी रक्षात्मक रणनीति को त्यागकर एक बेहद आक्रामक और बहु-आयामी राष्ट्रीय रणनीति अपनानी होगी। केवल कूटनीतिक विरोध दर्ज कराने से चीन के इरादे बदलने वाले नहीं हैं। इस दिशा में भारत सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश की ऊपरी सिआंग नदी पर 10,000 मेगावाट क्षमता वाले एक विशाल जलाशय के निर्माण की योजना पर काम शुरू करना एक सही कदम है। यह प्रस्तावित बहुउद्देशीय परियोजना भारत के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी, जो चीन द्वारा ऊपरी प्रवाह से अचानक छोड़े गए अतिरिक्त और अनियंत्रित पानी को अपने भीतर सोखने की क्षमता रखेगी और साथ ही शुष्क मौसम में पानी की निरंतर आपूर्ति बनाए रखेगी।
इसके साथ ही भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को पूरी ताकत और मुखरता के साथ उठाना होगा। वैश्विक समुदाय के सामने यह बात मजबूती से रखनी होगी कि एक ‘अपर राइपेरियन‘ यानी ऊपरी छोर पर स्थित देश होने के नाते चीन निचले देशों के जीवन और पर्यावरण को खतरे में नहीं डाल सकता। भारत को ब्रह्मपुत्र बेसिन के अन्य देशों जैसे बांग्लादेश को भी इस विमर्श में शामिल करना चाहिए ताकि चीन पर एक पारदर्शी, जवाबदेह और बहुपक्षीय जल-साझाकरण तंत्र के दायरे में आने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। जांगमु बांध का पूरा होना केवल चीन की एक इंजीनियरिंग उपलब्धि या बिजली बनाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत के अस्तित्व, सुरक्षा और संप्रभुता के लिए अब तक की सबसे बड़ी भौगोलिक चुनौती है। इस चुनौती से निपटने के लिए अब तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर दीर्घकालिक, ठोस और कड़े रणनीतिक कदमों की तत्काल आवश्यकता है, अन्यथा आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।