हिमालय पर्वत की गोद में बीएसई आठ राज्यों में ग्लेशियर के पिघलने- झीलें बनने ने चुनोटी खड़ी कर दी है ।

नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से हुई तबाही ने भारत को सतर्क आकर दिया है । हिमालय पर्वत की गोद में बीएसई आठ राज्यों में ग्लेशियर के पिघलने- झीलें बनने ने चुनोटी खड़ी कर दी है । ऐसे में जरूरी है की हमारे देश में ग्लेशियर विकास प्राधिकरण की तरह कोई संस्था गठित हो, जो ग्लेशियर के खतरों को ले कर काम कर रही अलग अलग बहुत सी संसतहों के आँकड़े, आकलन यदि को एकीकृत रूप से निदान के साथ पेश कर सके । यह लेख इसी मुद्दे पर है । 

पंकज चतुर्वेदी

हिमालय की गोद में पल रहा एक खामोश खतरे से निबटने को चाहिए ग्लेशियर विकास प्राधिकरण

पिछले कुछ वर्षों में जब भी उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश या नेपाल के किसी दूरदराज गांव से अचानक आई बाढ़ की खबर आती है, तो पहला सवाल यही उठता है कि आखिर बादल फटा या कुछ और हुआ। मगर वैज्ञानिकों की मानें तो इनमें से कई घटनाओं के पीछे बादल फटना नहीं, बल्कि ऊंचाई पर मौजूद किसी ग्लेशियर झील का अचानक फट जाना असली वजह होता है। यह विषय अब महज एक वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं रह गया है, बल्कि हिमालयी राज्यों में रहने वाले लाखों लोगों के जीवन और आजीविका से सीधे जुड़ा हुआ एक गंभीर संकट बन चुका है। चूंकि हमारे देश में  भी भी हमारे  ग्लेशियर के नियमित अध्ययन , अवलोकन , दूरगामी निष्कर्ष पर एकीकृत रूप से काम नहीं  हो रहा है जबकि पहाड़ों पर बढ़ती गर्मी से  प्रवाहों के अनियमित रहने की बहुत सी घटनाएं सामने  आ रही हैः,  सो जरूरी लगता है की एक व्यवस्थित “ग्लेशियर विकास प्राधिकरण “  का गठन हो ।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने हाल ही में जो सैटेलाइट अध्ययन जारी किया है, वह चिंता बढ़ाने वाला है। इस रिपोर्ट के अनुसार हिमालय क्षेत्र में करीब ढाई हजार बड़ी ग्लेशियर झीलें चिह्नित की गई हैं, जिनमें से एक सौ तीस झीलें ऐसी हैं जिनका आकार खतरनाक स्तर तक बढ़ चुका है। यदि छोटी-बड़ी सभी झीलों को जोड़ लिया जाए तो यह संख्या आठ हजार से भी ऊपर पहुंच जाती है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि वर्ष 1990 के बाद कम से कम एक हजार नई ग्लेशियर झीलें अस्तित्व में आ चुकी हैं। यानी जिस रफ्तार से हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उसी रफ्तार से उनके नीचे और आसपास नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें फैलती जा रही हैं। सिंधु बेसिन में पैंसठ, ब्रह्मपुत्र बेसिन में अट्ठावन और गंगा बेसिन में सात ऐसी झीलें पाई गई हैं जिन्हें उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा गया है। हिमाचल प्रदेश की गेफांग घाट झील का आकार तो सर्वाधिक एक सौ अठहत्तर प्रतिशत तक बढ़ चुका है, और उसका कुल क्षेत्रफल अब सौ हेक्टेयर से भी ज्यादा हो गया है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हिमालयी क्षेत्र में करीब दस लाख लोग ऐसी ग्लेशियर झीलों के दस किलोमीटर के दायरे में रहते हैं, जो कभी भी बम की तरह फट सकती हैं।

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल में स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट बताती है कि नेपाल के कोशी प्रांत में कुल दो हजार उनहत्तर ग्लेशियर झीलों में से बयालीस झीलें ऐसी हैं जो गंभीर रूप से अस्थिर हो चुकी हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा खतरा तल्लोपोखरी ग्लेशियल झील से बताया गया है, जो करीब तीन किलोमीटर लंबी और दो सौ छह मीटर गहरी है। जब किसी ग्लेशियर के पास बनी झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है, तो नीचे की घाटियों में पानी, बर्फ, चट्टानों और कीचड़ का रौद्र रूप बेहद कम समय में कई किलोमीटर तक फैल जाता है। न तो चेतावनी देने का समय मिलता है और न ही भागने का, और मिट्टी-चट्टानों के मलबे में शव तक ढूंढ पाना मुश्किल हो जाता है। पूरा का पूरा गांव कुछ ही मिनटों में मानचित्र से गायब हो सकता है।

आखिर ये झीलें अचानक इतनी खतरनाक क्यों होती जा रही हैं, इसे समझना जरूरी है। ग्लेशियर झीलें दरअसल पिघलते हुए ग्लेशियरों के पानी से बनती हैं, जो अक्सर बर्फ, मिट्टी और पत्थरों से बने एक कमजोर प्राकृतिक बांध के पीछे इकट्ठा होती रहती हैं। इस तरह के बांध में कोई ठोस आधार नहीं होता, इसलिए जैसे-जैसे झील में पानी बढ़ता है, बांध पर दबाव भी बढ़ता जाता है। बढ़ता तापमान, भारी बारिश, बादल फटना, हिमस्खलन या भूकंप जैसी घटनाएं इस दबाव को उस हद तक ले जाती हैं जहां बांध टूट जाता है और पूरी झील का पानी पल भर में नीचे की ओर बह निकलता है। जलवायु परिवर्तन ने इस पूरे चक्र को और तेज कर दिया है। जिस रफ्तार से हिमालयी ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उसे देखते हुए वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो सदी के अंत तक हिमालय के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल चुके होंगे। जाहिर है, जितने ग्लेशियर पिघलेंगे, उतनी ही नई झीलें बनेंगी और मौजूदा झीलें उतनी ही तेजी से फैलेंगी।

उत्तराखंड में करीब बारह सौ छियासठ ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जिनमें से अब तक साढ़े चार सौ के आसपास झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन हो सका है। इनमें से पच्चीस झीलें ऐसी मानी गई हैं जो कभी भी फट सकती हैं और जिन पर लगातार निगरानी जरूरी है। साल 2013 की केदारनाथ त्रासदी के पीछे चोराबाड़ी ग्लेशियर झील के फटने और भारी बर्फ पिघलने को बड़ी वजह माना जाता है। 2021 में चमोली जिले की ऋषिगंगा घाटी में ग्लेशियर टूटने और झील फटने से करीब दो सौ लोगों की जान चली गई थी, और तपोवन बांध पूरी तरह तबाह हो गया था। हाल ही में 2025 में उत्तरकाशी के धराली गांव में आई भीषण बाढ़ के पीछे भी विशेषज्ञों ने ग्लेशियर झील के फटने को ही असली कारण बताया, क्योंकि उस समय बारिश इतनी नहीं हुई थी कि बादल फटने की घटना मानी जा सके। यही पैटर्न बार-बार दोहराया जा रहा है, और हर बार नुकसान का दायरा पहले से बड़ा होता जा रहा है। उत्तराखंड में आज कुल ग्लेशियर झीलों की संख्या बारह सौ से भी ज्यादा हो चुकी है, और नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने इनमें से तेरह झीलों को खासतौर पर खतरनाक चिह्नित किया है, जो प्रदेश के पांच जिलों चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और टिहरी में फैली हैं। चमोली की वसुधारा झील सहित वहां तीन और झीलें इस सूची में हैं, उत्तरकाशी की केदार ताल, बागेश्वर की नागकुंड, पिथौरागढ़ की मबांग, पियुंग सहित चार अन्य झीलें और टिहरी की मासुरी ताल भी इसी उच्च जोखिम वाली श्रेणी में शामिल हैं। वसुधारा झील का अध्ययन कर चुकी टीम के अनुसार यह झील करीब नौ सौ मीटर लंबी और छह सौ मीटर चौड़ी है और फिलहाल दो जगहों से इसका पानी रिस रहा है, जिसे कुछ हद तक राहत की बात माना जा रहा है। पिथौरागढ़ की उच्च जोखिम वाली चार झीलों के अध्ययन के लिए जल्द टीमें गठित की जाएंगी और मानसून खत्म होने के बाद यह काम शुरू होगा, जिसमें उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ-साथ वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, आईआईटी रुड़की और आईआईआरएस देहरादून जैसे संस्थानों के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। राज्य सरकार अब इन झीलों की निगरानी के लिए एक स्थायी तंत्र भी विकसित करना चाहती है, ताकि भविष्य में बनने वाली नई झीलों का भी समय रहते अध्ययन हो सके।

राहत की बात यह है कि सरकार और वैज्ञानिक संस्थान इस खतरे को लेकर पूरी तरह अनजान नहीं हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अब आपदा के बाद राहत कार्य तक सीमित रहने की बजाय पहले से जोखिम कम करने की दिशा में कदम उठा रहा है। अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तराखंड में विशेष रूप से एक राष्ट्रीय परियोजना चलाई जा रही है। केंद्रीय जल आयोग अब सैटेलाइट इमेजरी के जरिए हिमालय क्षेत्र की नौ सौ से अधिक ग्लेशियर झीलों पर नजर रख रहा है, और बादलों से घिरे मानसून के महीनों में भी झीलों के आकार में बदलाव पकड़ने के लिए रडार तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन जिस रफ्तार से नई झीलें बन रही हैं, उसे देखते हुए यह प्रयास अभी भी अपर्याप्त लगते हैं।

असल समस्या यह है कि हिमालय जैसा दुर्गम इलाका है, वहां हर झील पर लगातार नजर रखना आसान काम नहीं। सैकड़ों झीलें साढ़े चार हजार मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित हैं, जहां गर्मियों के छोटे से मौसम में ही सर्वेक्षण संभव हो पाता है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि निगरानी तंत्र को और मजबूत किया जाए, संवेदनशील झीलों के आसपास बसे गांवों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाने वाली आधुनिक तकनीक लगाई जाए, और नदी घाटियों में होने वाले निर्माण कार्यों में इस खतरे को ध्यान में रखा जाए। साथ ही भारत, नेपाल और चीन के बीच सीमा-पार चेतावनी व्यवस्था को भी मजबूत करना जरूरी है, क्योंकि हिमालय की नदियां किसी एक देश की सीमा में बंधी नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन को थामना भले ही एक लंबी लड़ाई हो, लेकिन समय रहते सतर्कता बरतने और आपदा प्रबंधन को मजबूत करने से निचली घाटियों में बसे लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है। पहाड़ खामोश रहते हैं, मगर उनकी गोद में पल रही ये झीलें अब खामोश नहीं रहने वाली, इसलिए बेहतर यही होगा कि हम उनकी चेतावनी को समय रहते सुन लें।

हालांकि अलग अलग बहुत  सी संस्थाएं ग्लेशियर के बारे में चेतावनी, अध्ययन आदि के आँकड़े  साझा कर रहे हैं  लेकिन यदि ग्लेशियर विकास प्राधिकरण जैसा कोई संस्थान शुरू होता है तो हम बड़े संभावित खतरे से बचने की बेहतर योजना बना सकते हैं ।

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