आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने अठारह सौ इक्यासी से लेकर वर्ष दो हजार पच्चीस तक के छत्तीस हजार से अधिक भूकंपीय आंकड़ों का वैज्ञानिक और सांख्यिकीय विश्लेषण करके एक विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस अध्ययन से यह बात सामने आई है कि अंडमान के नीचे सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटों की सीमाओं के बीच लगातार जबरदस्त घर्षण और दबाव बढ़ रहा है। शोध के अनुसार, इस क्षेत्र में भविष्य में आठ या उससे अधिक तीव्रता के विनाशकारी भूकंप आने की आशंका बहुत अधिक है। ऐसे स्थान पर भारी निर्माण कार्य बड़ी तबाही ला सकते हैं , वैसे भी अंडमान निकोबार जलवायु परिवर्तन को ले लार बेहद संवेदनशील है – यह लेख इसी विषय  

पर है   साथ में रिसर्च पेपर भी है 

भूकंप से काँपते अंडमान में निर्माण कार्य तबाही लाएंगे

पंकज चतुर्वेदी

भारत का बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के मिलन स्थल पर स्थित अंडमान और निकोबार द्वीप समूह अपनी प्राकृतिक सुंदरता, अनूठी जैव विविधता और प्राचीन जनजातीय संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। लेकिन यह रमणीय द्वीपसमूह आज एक अभूतपूर्व और आसन्न पर्यावरणीय व भौगोलिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के भूविज्ञान और भूभौतिकी विभाग के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक ताजा और व्यापक शोध अध्ययन ने इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर गंभीर और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। यह शोध स्पष्ट करता है कि समूचा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह एक अत्यधिक संवेदनशील और नए उच्च भूकंप संभावित क्षेत्र के दायरे में आता है। इसके बावजूद, केंद्र सरकार द्वारा इस नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र में अंधाधुंध निर्माण कार्यों और हजारों करोड़ रुपये की मेगा-विकास परियोजनाओं को थोपने की जिद ने इस संकट को और अधिक गहरा कर दिया है।

आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने अठारह सौ इक्यासी से लेकर वर्ष दो हजार पच्चीस तक के छत्तीस हजार से अधिक भूकंपीय आंकड़ों का वैज्ञानिक और सांख्यिकीय विश्लेषण करके एक विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस अध्ययन से यह बात सामने आई है कि अंडमान के नीचे सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटों की सीमाओं के बीच लगातार जबरदस्त घर्षण और दबाव बढ़ रहा है। शोध के अनुसार, इस क्षेत्र में भविष्य में आठ या उससे अधिक तीव्रता के विनाशकारी भूकंप आने की आशंका बहुत अधिक है। दो हजार चार के हिंद महासागर के ऐतिहासिक और भीषण सुनामी हादसे की यादें अभी ताज़ा ही थीं कि इस नए शोध ने रेखांकित कर दिया है कि पूरा द्वीप समूह अत्यधिक उच्च तीव्रता के साथ जमीन के हिलने और भयानक झटकों के खतरे की चपेट में है। इस क्षेत्र में ज़मीन के भीतर अभूतपूर्व भूगर्भीय तनाव जमा हो रहा है।

एक तरफ जहां वैज्ञानिक और भूगर्भशास्त्री बार-बार यह चेतावनी दे रहे हैं कि अंडमान-निकोबार एक अत्यधिक संवेदनशील भू-भाग है, वहीं दूसरी तरफ नीति निर्माताओं और प्रशासन की ओर से वहां भारी-भरकम निर्माण कार्यों की बाढ़ ला दी गई है। ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित विशाल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह परियोजना, बड़े शहरी विकास प्रोजेक्ट, पावर प्लांट और पर्यटन आधारित निर्माण कार्य इस बात का प्रमाण हैं कि पर्यावरण और प्राकृतिक चेतावनियों को पूरी तरह दरकिनार किया जा रहा है। जब किसी उच्च भूकंपीय और सुनामी-संभावित क्षेत्र में सीमेंट-कंक्रीट के जंगल खड़े किए जाते हैं, तो आपदा के समय जनहानि और संपत्ति का नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। भारी बहुमंजिला इमारतें, बंदरगाह और परिवहन नेटवर्क इस नाज़ुक द्वीप की सहनशक्ति से परे हैं। एक तरफ ज़मीन के भीतर प्लेटें सुलग रही हैं, और दूसरी तरफ भारी मशीनों और विस्फोटकों से पहाड़ों और जंगलों को काटा जा रहा है। यह स्थिति किसी कृत्रिम महाविनाश को खुला निमंत्रण देने जैसी है।

भूकंपीय और भूगर्भीय संकटों के अलावा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर जलवायु परिवर्तन का भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे तटीय क्षेत्र डूबने की कगार पर हैं। विकास के नाम पर हो रहे इन अंधाधुंध निर्माण कार्यों से क्षेत्र की समृद्ध वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का बड़े पैमाने पर संहार हो रहा है। ग्रेट निकोबार के प्राचीन उष्णकटिबंधीय वर्षावनों, मैंग्रोव वनों और अनूठी मूंगा चट्टानों को नष्ट किया जा रहा है। यह जैव विविधता न केवल भारत बल्कि पूरी पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन के लिए अमूल्य है। वनों के कटने से द्वीप की प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था ध्वस्त हो रही है और भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ गया है।

इस तथाकथित विकास का सबसे बड़ा खामियाजा वहां के स्थानीय निवासियों और विशेषकर जारवा, ओंगे, शोपेन और निकोबारी जैसी आदिम जनजातियों को भुगतना पड़ रहा है। सदियों से प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर रहने वाले ये समुदाय अपनी संस्कृति, ज़मीन और आजीविका से बेदखल हो रहे हैं। बाहरी लोगों के प्रवेश और व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने से इन संवेदनशील जनजातियों के स्वास्थ्य और सांस्कृतिक अस्तित्व पर भी गंभीर आंच आई है। स्थानीय मछुआरे और आम नागरिक अपनी जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा को लेकर भयभीत हैं। किसी भी संभावित भूकंप या आपदा की स्थिति में सबसे पहले यही स्थानीय लोग मौत के मुंह में धकेले जाएंगे, क्योंकि प्रशासन के पास इतनी दूरदराज के द्वीपों पर तत्काल प्रभावी राहत पहुंचाने के सीमित साधन हैं।

अंडमान-निकोबार में चलाई जा रही कई हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं की उपयोगिता, औचित्य और वित्तीय-पर्यावरणीय पारदर्शिता पर पहले भी देश के जाने-माने वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, पूर्व नौकरशाहों और शोधकर्ताओं द्वारा गंभीर सवाल उठाए जा चुके हैं। आलोचकों का सवाल रहा है कि जिस क्षेत्र में एक मामूली प्राकृतिक झटका या भूकंप पूरी अर्थव्यवस्था को नेस्तनाबूद कर सकता है, वहां इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धन झोंकना किस प्रकार की आर्थिक समझदारी है? पूर्व में इन परियोजनाओं के लिए किए गए पर्यावरण प्रभाव आकलन की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर भारी सवाल उठे हैं। आरोप है कि कागजी खानापूर्ति करके इतनी संवेदनशील योजनाओं को जल्दबाजी में मंजूरी दी गई। सरकार द्वारा इन परियोजनाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक महत्व का नाम देकर जायज ठहराया जाता है, लेकिन इसके आड़ में हो रहे अंधाधुंध व्यावसायिक पर्यटन और बंदरगाह विकास का असल फायदा कॉर्पोरेट घरानों को मिलना तय है, जबकि आपदा का पूरा जोखिम स्थानीय जनता और पर्यावरण को उठाना पड़ेगा।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और नीति निर्माता अपनी जबरिया विकास की जिद को त्यागें। विकास का वह मॉडल जो प्रकृति को रौंदकर और इंसानी जिंदगियों को दांव पर लगाकर आगे बढ़ता है, कभी भी टिकाऊ या कल्याणकारी नहीं हो सकता। मुख्यधारा के विकासात्मक एजेंडे को सुदूर और पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील द्वीपों पर जबरन थोपना अहंकार और अदूरदर्शिता का परिचायक है। आईआईटी खड़गपुर के इस नए और पुख्ता वैज्ञानिक शोध ने सरकार के तर्कों की हवा निकाल दी है। अब यह अकादमिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि सरकार इस रिपोर्ट का संज्ञान ले और अपनी योजनाओं की समीक्षा करे। यदि समय रहते इन विनाशकारी निर्माण कार्यों पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में अंडमान-निकोबार में किसी भी बड़े भूकंप या आपदा से होने वाली मानवीय और पारिस्थितिक क्षति की भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत का रणनीतिक और प्राकृतिक मुकुट है, न कि पूंजीपतियों के मुनाफे का अखाड़ा। वैज्ञानिक चेतावनियां चीख-चीखकर कह रही हैं कि धरती के भीतर का भूगर्भीय तनाव अपनी चरम सीमा पर है। ऐसे में, पर्यावरण को ताक पर रखकर हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं को आगे बढ़ाना आत्मघाती है। स्थानीय समाज की पुकार, वन्यजीवों की रक्षा और विज्ञान की चेतावनियों का सम्मान करते हुए सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। विकास ऐसा होना चाहिए जो जीवन बचाए, विनाश का पैगाम न लाए।

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