यह लेख मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के बाजना क्षेत्र में वर्ष 2026 की भीषण गर्मी के दौरान उत्पन्न पेयजल संकट तथा उसके समाधान की प्रेरणादायक कहानी प्रस्तुत करता है। अठारह गांवों में चौंतीस हैंडपंप खराब होने से ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। इस समस्या के समाधान हेतु वागधारा द्वारा गठित कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन ने गांव-स्तर पर विस्तृत सर्वेक्षण कर खराब हैंडपंपों की सूची तैयार की तथा जनपद पंचायत बाजना को ज्ञापन सौंपा। संगठन की सतत पहल और प्रशासन की त्वरित कार्रवाई के परिणामस्वरूप लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने उनतीस हैंडपंपों की मरम्मत कर पेयजल व्यवस्था बहाल की। यह पहल दर्शाती है कि जनसहभागिता, साक्ष्य-आधारित पैरवी और प्रशासनिक संवेदनशीलता के समन्वय से ग्रामीण क्षेत्रों की मूलभूत समस्याओं का प्रभावी एवं स्थायी समाधान संभव है। यह अध्ययन समुदाय और प्रशासन के बीच सहयोग की एक प्रेरक मिसाल प्रस्तुत करता है।
मध्यप्रदेश के रतलाम जिले का बाजना क्षेत्र में इस वर्ष भीषण गर्मी ने ग्रामीण जीवन पर गहरा असर डाला, और सबसे अधिक पीड़ा उन परिवारों को झेलनी पड़ी जिनके गांवों के हैंडपंप महीनों से खराब पड़े थे। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता गया, पेयजल का संकट भी उतना ही गहराता चला गया। अठारह गांवों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक हो गई थी, जहां चौंतीस हैंडपंप बंद पड़े होने के कारण महिलाओं को कोसों दूर जाकर पानी लाना पड़ रहा था। इस जूझते हुए दैनिक संघर्ष ने ग्रामीणों के सामान्य जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था। खेतों में काम करने वाले पुरुष हों या घर संभालने वाली महिलाएं, हर किसी का अधिकांश समय अब पानी जुटाने में ही बीतने लगा था, जिसका सीधा असर उनकी आजीविका और स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा था।
इसी संकट को लेकर वागधारा द्वारा गठित कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन, बाजना ने अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाते हुए क्षेत्र में विस्तृत सर्वेक्षण करने का निर्णय लिया। संगठन के कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर हर एक हैंडपंप की स्थिति का बारीकी से जायजा लिया, तकनीकी खराबी की प्रकृति समझी, कहीं पाइप की कमी पाई गई तो कहीं अन्य पुर्जों की आवश्यकता सामने आई। इस सर्वे के आधार पर एक व्यवस्थित सूची तैयार की गई, जिसमें प्रत्येक गांव में मौजूद खराब हैंडपंपों का विवरण दर्ज किया गया। इस प्रयास के बाद संगठन ने चौबीस अप्रैल दो हजार छब्बीस को जनपद पंचायत बाजना के मुख्य कार्यपालन अधिकारी मनीष भंवर से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन सौंपा, जिसमें क्षेत्र में गहराते जल संकट की पूरी तस्वीर प्रस्तुत करते हुए खराब हैंडपंपों की तत्काल मरम्मत करने की मांग रखी गई। और स्थायी समाधान के लिए ठोस कदम उठाने का अनुरोध भी किया गया।
ज्ञापन सौंपने के इस अवसर पर कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन, बाजना क्षेत्र के पदाधिकारी उपस्थित रहे, जिनमें शंकरलाल मईड़ा, लालू हाड़ा, मनीराम डामोर, शांतिलाल, कालीबाई, रखिया, अंजना, कैलाश बुज गोविंद निनामा जैसे नाम प्रमुख थे। संगठन के साथ वागधारा ब्लॉक फैसिलिटेटर रेणुका पोरवाल और मोहन भूरिया भी इस पूरी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बने रहे। संगठन के पदाधिकारियों ने इस अवसर पर स्पष्ट किया कि इस जल संकट के समाधान के लिए प्रशासन को हर संभव सहयोग देने को तैयार हैं। ज्ञापन सौंपे जाने के बाद संगठन लगातार फालोअप लेते हुए प्रशासन के साथ संवाद बनाए रखा। इसी निरंतर प्रयास का परिणाम जून माह में सामने आया, जब बाजना क्षेत्र में सराहनीय पहल के रूप में प्रशासन की तत्परता और संगठन की सक्रियता तालमेल देखने को मिला। बाजना जनपद सीईओ मनीष भंवर ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए बिना विलंब किए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग और संबंधित तकनीकी अमले को आवश्यक निर्देश जारी कर दिए। इस विषय पर बात करते हुए मनीष भंवर ने कहा, “ग्रामीणों की पेयजल समस्या हमारी प्राथमिकता है और संगठन द्वारा सौंपे गए ज्ञापन तथा किए गए सर्वे ने हमें त्वरित निर्णय लेने में बड़ी मदद की। हमने विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए कि जहां भी हैंडपंप बंद हैं, वहां मरम्मत कार्य पूरा किया जाए, ताकि ग्रामीण आमजन को इस भीषण गर्मी में राहत मिल सके।
प्रशासनिक निर्देश जारी होते ही विभागीय टीमें तेजी से हरकत में आईं और चिन्हित गांवों में पहुंचकर मरम्मत कार्य आरंभ कर दिया। जिन हैंडपंपों में मामूली तकनीकी खराबी थी, उन्हें तत्काल ठीक कर दिया गया, जबकि जहां पाइप अथवा अन्य सामग्री की आवश्यकता थी, वहां आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराकर पेयजल व्यवस्था बहाल की गई। चौंतीस में से उनतीस हैंडपंप सफलतापूर्वक मरम्मत कर पुनः चालू कर दिए गए, इस राहत का लाभ केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि भीषण गर्मी में पानी के अभाव से जूझ रहे मवेशियों को भी इससे बड़ी राहत मिली और उनके लिए भी पर्याप्त जल उपलब्धता सुनिश्चित हो सकी।
इस सकारात्मक बदलाव पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए भूरी घाटी गांव के संगठन के पदाधिकारी शंकरलाल मईडा ने कहा, “हम वर्षों से इस समस्या से जूझ रहे थे, कई बार शिकायत भी की परंतु समाधान नहीं मिल पाया था। इस बार संगठन ने हमारी आवाज़ प्रशासन तक पहुंचाई और प्रशासन ने भी उतनी ही तेजी से काम किया, जिससे हमारे गांव का हैंडपंप फिर से चालू हो गया है। अब हमें दूर जाकर पानी नहीं लाना पड़ता।” तालिनखेड़ा गांव के लालू हाड़ा ने भी अपनी बात रखते हुए कहा, “पानी के लिए हमारी महिलाओं को जो कष्ट झेलना पड़ रहा था, अब हैंडपंप चालू होने से हमारे परिवारों को बड़ी राहत मिली है और हम संगठन तथा प्रशासन दोनों के आभारी हैं।”
मेवासा गांव के कैलाश भुज ने संगठन की भूमिका की सराहना करते हुए कहा, “संगठन के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह घर-घर जाकर हमारी समस्या को समझा और उसे प्रशासन तक पहुंचाया इस पूरी प्रक्रिया से हमें यह विश्वास हुआ कि यदि ग्रामीण संगठित होकर अपनी बात रखें, तो प्रशासन भी सकारात्मक रूप से जवाब देता है।” हालेवाडा गांव की लक्ष्मीबाई चरपोटा ने कहा, “गर्मी के इन दिनों में पानी की एक-एक बूंद के लिए हम तरस रहे थे, परंतु अब हैंडपंप चालू होने से हमारा जीवन फिर से सामान्य हो गया है।” संगठन के प्रतिनिधिमंडल में शामिल जम्बूलिया गांव के रमेश निनामा, सज्जनगढ़ गांव के प्रभू कटारा, हाटली गांव के राजू महेड़ा और देवड़ा गांव के ऊंकार देवड़ा सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने भी प्रशासन की त्वरित कार्रवाई के लिए आभार व्यक्त किया। इनके अतिरिक्त हावडी डामोर, ईश्वरलाल खड़िया और जीतू सहित क्षेत्र के अनेक जागरूक नागरिक भी इस पूरे अभियान में सक्रिय रूप से जुड़े रहे ।
इस कार्य से यह प्रतीत होता है की कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन की पहल एव प्रयास और सजग निगरानी से किस तरह जनसमस्याओं का समाधान संभव है। लगातार मिल रही शिकायतों के बाद जब संगठन के कार्यकर्ता गांव-गांव पहुंचे और खराब पड़े हैंडपंपों का विस्तृत सर्वे किया, सर्वे के आधार पर तैयार सूची और उस पर आधारित ज्ञापन ने प्रशासन को स्थिति की वास्तविकता समझने में मदद की, जिसके परिणामस्वरूप कार्रवाई में तेजी आई।
तलीनखेड़ा गांव के रमेश मईड़ा ने इस संदर्भ में कहा, “हमारे गांव में महीनों से हैंडपंप बंद था, जिसके कारण न केवल हमें बल्कि हमारे पशुओं को भी पानी की भारी किल्लत झेलनी पड़ रही थी। अब जाकर यह समस्या हल हुई है, भोजपुरा गांव की केहरिग मईड़ा ने कहा कि इस पहल से उनके गांव की महिलाओं को दूर जाकर पानी लाने की रोज़ाना की परेशानी से राहत मिली है। खराड़ीसेरा गांव की चंपाबाई खराड़ी और भोजपुरा गांव के दौलत सिंह कटारा ने भी इसी तरह की भावनाएं साझा करते हुए संगठन की सक्रियता की सराहना की। रामपुरिया गांव के शांतिलाल भूरिया ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया ने ग्रामीणों के मन में यह विश्वास जगाया है कि उनकी समस्याओं को सुना जा रहा है।भोजपुरा गांव की मीराबाई चरपोटा, कुंडल गांव के गोविंद निनामा, रेह्तकुआ गांव की कविता निनामा, छावनीजोडिया गांव की सुगना कटारा, मकनपूरा गांव की कालीबाई डोडियार, बगली गांव के दरिया मुनिया तथा गजेंद्र चरपोटा, और राजापूरा गांव के गौतम भाभोर सहित अनेक साथियों ने भी प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भविष्य में भी ग्रामीणों की मूलभूत समस्याओं को इसी तरह उठाया जाता रहेगा और जनहित से जुड़ा संगठन का यह अभियान निरंतर जारी रहेगा।
इस पूरे घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट हुआ कि जब स्थानीय स्तर पर संगठित प्रयास प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ते हैं, तो जनसमस्याओं का समाधान कहीं अधिक तेजी और प्रभावी ढंग से संभव हो पाता है। ग्रामीणों ने इस बात पर विशेष रूप से प्रसन्नता जताई कि जनपद पंचायत बाजना और संबंधित विभाग ने न केवल तत्काल कार्रवाई की, बल्कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सक्रिय संवाद भी बनाए रखा। इससे मौजूदा संकट का समाधान हुआ, और भविष्य में इसी तरह की समस्याओं के प्रति प्रशासनिक तत्परता का एक सकारात्मक उदाहरण भी स्थापित हुआ।कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन के पदाधिकारियों ने अंत में यह भी रेखांकित किया कि यह उपलब्धि केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं, बल्कि जनसहभागिता और सामाजिक जागरूकता की भी जीत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में भी जनहित, ग्रामीण विकास और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर प्रशासन इसी तत्परता और संवेदनशीलता के साथ काम करता रहेगा, ताकि बाजना क्षेत्र के ग्रामीणों को किसी भी मौसम में पेयजल जैसी बुनियादी आवश्यकता के लिए संघर्ष न करना पड़े। भीषण गर्मी के इस दौर में जो राहत ग्रामीणों को मिली, वह न केवल तात्कालिक समाधान थी बल्कि यह विश्वास भी थी कि संगठित समाज और संवेदनशील प्रशासन मिलकर किसी भी चुनौती का समाधान निकाल सकते हैं। बाजना तहसील के १८ गांव में लौटा पानी वास्तव में जनशक्ति और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के सामंजस्य का प्रमाण बनकर सामने आया है, जो आगे चलकर इसी प्रकार की पहलों के लिए एक प्रेरक उदाहरण के रूप में सदैव याद किया जाएगा।
लेखक परिचय
विकास मेश्राम स्वतंत्र पत्रकार हैं। उन्हें ग्रामीण विकास, आदिवासी आजीविका, जल प्रबंधन, सामाजिक उत्तरदायित्व, जनसहभागिता तथा विकास पत्रकारिता के क्षेत्र में 14 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल मंचों पर विकास, पर्यावरण, कृषि, जलवायु परिवर्तन और जनसरोकारों से जुड़े सैकड़ों लेख, फीचर और सफलता की कहानियाँ प्रकाशित की हैं। उनका उद्देश्य जमीनी स्तर के नवाचारों, सामुदायिक पहलों और सकारात्मक बदलावों को व्यापक समाज तक पहुँचाना है।
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