पंकज चतुर्वेदी
भारत में करोड़ों लोगों को घर की ज़रूरत है और इसे टाला नहीं जा सकता। लेकिन घर बनाते समय यह भी देखना होगा कि वह कहाँ बन रहा है, वहाँ का मौसम कैसा है और जलवायु परिवर्तन के दौर में कौन-से ख़तरे बढ़ रहे हैं। लेह-लद्दाख में कंक्रीट के मकान सर्दियों में ठंड और ईंधन पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है। मैदानी इलाकों में लू के दिन बढ़ रहे हैं और भूकंप के जोखिम का दायरा भी बड़ा आँका जा रहा है। ऐसे में निर्माण सामग्री का चुनाव केवल लागत या दिखावे का नहीं, जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा का प्रश्न है।
2011 की जनगणना में देश में करीब 17.7 लाख लोग बेघर दर्ज हुए थे, यानी लगभग 4.49 लाख परिवार। इनमें 9.42 लाख शहरों में थे और 8.35 लाख गाँवों में। स्वतंत्र अनुमान इससे कहीं ऊँचे हैं, क्योंकि फुटपाथों और पुलों के नीचे रहने वालों की गिनती हमेशा अधूरी रहती है। 2012 में शहरी आवास की कमी का सरकारी अनुमान 1.878 करोड़ मकानों का था, जिसमें 56 प्रतिशत से ज़्यादा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के परिवार थे। जनगणना के मुताबिक़ शहरी परिवारों में से 17.4 प्रतिशत, यानी करीब 1.39 करोड़, झुग्गियों में रहते थे। प्रधानमंत्री आवास योजना ने इस कमी को पाटने में बड़ी भूमिका निभाई है। ग्रामीण योजना में अगस्त 2026 तक 3.12 करोड़ मकान पूरे हो चुके हैं और शहरी योजना में जुलाई 2026 तक करीब 99 लाख। यह उपलब्धि छोटी नहीं है। पर अब सवाल यह भी है कि जो घर बने, वे उनमें रहने वालों के कितने काम आए।
हमारे समाज में “पक्का मकान” सम्मान और सुरक्षा का पर्याय बन गया है और “कच्चा” पिछड़ेपन का। ग्रामीण योजना में राज्यों को स्थानीय रूप से उपयुक्त डिज़ाइन और सामग्री देने की गुंजाइश तो है, पर आम धारणा में “पक्का” का मतलब ईंट, सीमेंट और सरिया ही बना हुआ है। नतीजा यह कि मिट्टी, पत्थर, बाँस, लकड़ी और चूने जैसी सदियों में परखी सामग्री और तकनीकें छूट रही हैं, चाहे इलाका रेगिस्तान का हो, हिमालय का या ब्रह्मपुत्र के बाढ़ग्रस्त मैदान का। जबकि पर्यावास देश, काल, परिस्थिति और मौसम पर निर्भर करता है। मवेशी पालने वाले परिवार के लिए पक्का मकान अक्सर बेमानी है और भूकंप-संभावित पहाड़ी इलाकों में भारी सीमेंट-पत्थर के मकान ख़तरा बढ़ा सकते हैं।
इसकी सबसे तीखी मिसाल लेह है। छह अगस्त 2010 को बादल फटने के बाद आई बाढ़ में सबसे ज़्यादा तबाही कंक्रीट के पक्के मकानों की हुई, क्योंकि इनमें से अधिकतर उन सूखी जलधाराओं के रास्ते में खड़े कर दिए गए थे जो बरसों सूखी रहती हैं पर ऊपर ज़्यादा बर्फ़ पिघलने पर अचानक उफान पर आ जाती हैं। पानी को अपने पुश्तैनी रास्ते में रुकावट दिखी तो उसने उन्हें ढहा दिया। पारंपरिक घर स्थानीय मिट्टी और रेत की धूप में पकी ईंटों से बनते थे और तीन मंज़िला होते थे: नीचे मवेशी, बीच में परिवार और सबसे ऊपर पूजाघर। कई मठ और मंदिर सदियों से खड़े हैं। लेह में सरकारी इमारतें सर्दियों में गर्मियों के मुक़ाबले करीब पाँच गुना ऊर्जा खर्च कर रही हैं और गर्मी के लिए ईंधन पर निर्भरता के कारण साँस की बीमारियों का जोखिम बढ़ता है। अब स्थानीय लोग ख़ुद सीमेंट के मकान तुड़वाकर पारंपरिक मकानों की ओर लौट रहे हैं। फिर भी पुराने घर को ज्यों का त्यों लौटाना समाधान नहीं है, क्योंकि पारंपरिक घर भी सर्दी में बहुत ठंडे रहते हैं। रास्ता पारंपरिक सामग्री को निष्क्रिय सौर-ऊष्मा (पैसिव सोलर) डिज़ाइन से जोड़ने का है। लद्दाख में ऐसे सौर घरों में सर्दियों में भी कमरे का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है और ईंधन की खपत करीब दो-तिहाई घट गई है। इस मॉडल से 350 से ज़्यादा परिवार लाभ ले चुके हैं।
यह चिंता सिर्फ़ लद्दाख की नहीं है। 2024 में अप्रैल से जून के बीच देश में 536 हीटवेव दिन दर्ज हुए, जो 14 साल में सबसे ज़्यादा थे। सामान्य साल में इस मौसम में इलाके-वार चार से सात दिन ही लू चलती है। सरकारी आँकड़ों में उस साल लू लगने के 41,789 संदिग्ध मामले और 143 मौतें दर्ज हुईं। खराब डिज़ाइन के कंक्रीट और टिन की छत वाले मकान दिन भर गर्मी सोखकर रात में छोड़ते हैं, जिससे रात का तापमान भी नहीं गिरता और शरीर को राहत नहीं मिलती। जिन परिवारों के पास पंखे-कूलर का भी भरोसा नहीं, उनके लिए यह जानलेवा हो सकता है। मोटी दीवारों, आँगन, जालियों और ऊँची छतों वाले राजस्थान और कच्छ के पारंपरिक घर इसी गर्मी का जवाब थे।
भूकंप का सवाल भी उतना ही गंभीर है। नवंबर 2025 में भारतीय मानक ब्यूरो ने भूकंपीय नक्शा संशोधित कर पूरे हिमालयी क्षेत्र को नए, सबसे ऊँचे जोखिम वाले “ज़ोन VI” में रखा था। नए आकलन में देश की करीब 61 प्रतिशत भूमि मध्यम से उच्च जोखिम में आती थी। लेकिन आवासन मंत्रालय की आपत्तियों के बाद, जिनमें निर्माण-लागत में 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी और परामर्श की कमी शामिल थी, यह संहिता 3 मार्च 2026 को वापस ले ली गई। अब 2016 की संहिता लागू है, जिसमें चार ज़ोन हैं और देश का करीब 59 प्रतिशत हिस्सा मध्यम से उच्च जोखिम में माना जाता है। नक्शा बदले या नहीं, हिमालय की धरती के नीचे का तनाव नहीं बदलता। भारी और बिना मज़बूत इंजीनियरिंग वाले ढाँचे जोखिम घटाते नहीं, बढ़ा सकते हैं। इसके उलट कश्मीर की “ढज्जी-दीवारी”, हिमाचल-उत्तराखंड की “काठ-कुनी” और असम का बाँस-लकड़ी का चांग घर झटके सोखने और बाढ़ से बचने की समझ से बने थे। कच्छ के गोलाकार भूंगा घर 2001 के भूकंप में कई जगह टिके रहे।
सामग्री की एक पर्यावरणीय कीमत भी है। विभिन्न अध्ययन सीमेंट उद्योग को दुनिया के कार्बन उत्सर्जन के लगभग पाँच से आठ प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक है और वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत है। सीमेंट के साथ मिलाई जाने वाली रेत के बेतहाशा उत्खनन ने नदियों, भूजल और तटबंधों को कमज़ोर किया है। जिस जलवायु संकट से बचने के लिए हमें घर चाहिए, उसी को हम घर बनाते हुए और गहरा कर रहे हैं।
इसका मतलब अतीत में लौटना नहीं है। कंक्रीट हर जगह ग़लत नहीं है, पर उसे एकमात्र मानक बना देना ग़लत है। रास्ता परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के मेल से निकलेगा। मिट्टी, बाँस, पत्थर और चूने की तकनीकों का वैज्ञानिक परीक्षण हो, उन्हें भूकंप-सुरक्षा मानकों में जगह मिले और उन पर बने घरों को “पक्के” की परिभाषा और गृह-ऋण की पात्रता में गिना जाए। आवास योजनाओं में लाभार्थी को अपने इलाके की जलवायु के अनुरूप डिज़ाइन और सामग्री चुनने की वास्तविक छूट मिले। पारंपरिक कारीगरों का प्रशिक्षण और प्रमाणन हो, ताकि स्थानीय कौशल को सम्मान और रोज़गार मिले। और सबसे ज़रूरी, घर का नक्शा किसी दफ़्तर में नहीं, रहने वालों से पूछकर बने।
“सबको घर” का अर्थ “सबको एक जैसा घर” नहीं हो सकता। लद्दाख की ठंड, असम की बाढ़, राजस्थान की तपिश और हिमालय के भूकंप के लिए एक ही नक्शा बेमानी है। जो घर अपनी जगह की मिट्टी, मौसम और जोखिम को समझकर बना हो, वही टिकाऊ भी होगा और किफ़ायती भी। विश्व आवास दिवस पर हमें यही याद रखना चाहिए।