सियांग: नदी को समझे बगैर बांधने की जिद पंकज चतुर्वेदी

सियांग: नदी को समझे बगैर बांधने की जिद

प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना 11,000 मेगावाट की है। इसका बांध लगभग 300 मीटर ऊँचा होगा, जो एशिया महाद्वीप में अपनी तरह का सबसे ऊँचा बताया जाता है। सरकार इसे ऊर्जा, रोज़गार और जल सुरक्षा की परियोजना कहती है। साथ ही रणनीतिक तर्क भी है: तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो पर चीन के लगभग 60,000 मेगावाट के प्रस्तावित बांध के मुकाबले भारत को अपनी स्थिति मज़बूत करनी है। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने खुद ऊपरी इलाकों से अचानक आने वाले तेज़ बहाव और सूखे महीनों की किल्लत को इस क्षेत्र की दोहरी चुनौती बताया है। सरकार यह भी कहती है कि पीएफआर केवल प्रारंभिक तकनीकी आकलन है। पर 2017 में नीति आयोग के प्रस्ताव के बाद से सात साल बीत चुके हैं और ग्रामीणों के विरोध के कारण अब तक सर्वे भी ठीक से नहीं हो पाया है। जब सर्वे की मशीनों के साथ अर्धसैनिक बल आएँ और विरोध करने वाले दो स्थानीय वकील केंद्रीय मंत्री को ज्ञापन देने से पहले गिरफ़्तार कर लिए जाएँ, तो “सिर्फ़ सर्वे” का आश्वासन लोगों को खोखला लगता है।

असुरक्षा की जड़ में पहली चीज़ हिमालय की भूगर्भीय प्रकृति है। सियांग घाटी दुनिया के सबसे युवा और भूकंप के लिहाज़ से सबसे संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में आती है। यहाँ चट्टानें कमज़ोर हैं, ढलान खड़ी हैं और बारिश तेज़ होती है। 1950 का असम-तिब्बत भूकंप, जिसकी तीव्रता 8.6 के आसपास आँकी गई, इसी पट्टी में आया था। उसने पहाड़ों को दरका दिया और भूस्खलन से नदियाँ कई जगह रुक गईं। जब ये अवरोध टूटे तो नीचे के इलाकों में भीषण बाढ़ आई। वर्ष 2000 में तिब्बत की यिगोंग घाटी में भूस्खलन से बनी झील फटी थी और सियांग में उसकी बाढ़ आई थी। स्थानीय लोग उसे आज भी नहीं भूले हैं। जिस घाटी में प्रकृति खुद नदी को बाँधती और खोलती रही हो, वहाँ 300 मीटर ऊँची दीवार और अरबों घन मीटर पानी का भार जोड़ना भूगर्भ विज्ञान की दृष्टि से बड़ा जुआ है। जलाशय के वज़न से भूकंपीय गतिविधि भड़कने की आशंका को दुनिया भर के वैज्ञानिक गंभीरता से लेते हैं।

जलवायु परिवर्तन ने इस जोखिम को और बढ़ा दिया है। सियांग को पानी तिब्बत के हिमनदों और बर्फ़ से मिलता है, जो तेज़ी से पिघल रहे हैं। हिमनद झीलों के फटने से आने वाली अचानक बाढ़ अब हिमालय की सच्चाई है। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में तीस्ता-3 का चुंगथांग बांध ऐसी ही बाढ़ में बह गया। बांधों की रूपरेखा बीते दशकों के जल-आँकड़ों पर बनती है, जबकि आने वाले दशकों की नदी उन आँकड़ों जैसी नहीं रहेगी। इसलिए जब आंदोलनकारी स्वतंत्र भूवैज्ञानिक, भूकंपीय और आपदा-जोखिम आकलन माँगते हैं तो वे कोई अनुचित शर्त नहीं रखते। वे वही माँग रहे हैं जो किसी भी ज़िम्मेदार परियोजना की पहली शर्त होनी चाहिए।

दूसरी चिंता गाद की है, जो पर्यावरण की दृष्टि से शायद सबसे कम समझी गई है। ब्रह्मपुत्र दुनिया की सबसे ज़्यादा गाद ढोने वाली नदियों में है, और सियांग उसमें बड़ा योगदान देती है। यह गाद नदी की उपजाऊ विरासत है। असम के बाढ़ मैदान, नदी के बीच बने द्वीप, माजुली और काज़ीरंगा के घास के मैदान, सब इसी गाद पर टिके हैं। बांध इसे जलाशय में रोक लेगा। इससे जलाशय अनुमान से जल्दी भरेगा, और नीचे बहने वाला साफ़ पानी तटों और तलहटी को काटेगा। तटबंधों की जड़ें खोखली होंगी और खेत कटेंगे। माजुली और असम के कटाव-पीड़ित गाँव इसकी कीमत पहले ही चुका रहे हैं। बांध इस संकट को घटाएगा नहीं।

तीसरा पहलू बहाव की प्रकृति है। जलविद्युत परियोजनाएँ बिजली की माँग के हिसाब से पानी छोड़ती हैं, यानी शाम की ऊँची माँग में बहाव बढ़ाती हैं और रात में घटाती हैं। नदी घंटों के भीतर चढ़ती-उतरती है, जो उसके प्राकृतिक चक्र से उलट है। इससे रेतीले तटों पर अंडे देने वाली मछलियों और पक्षियों के घोंसले बह जाते हैं और तटवर्ती खेत डूबते हैं। नदी पार करने वाले लोग और मवेशी भी खतरे में पड़ते हैं। मुख्यमंत्री ने अचानक तेज़ बहाव को समस्या कहा है, पर बांध इस समस्या का इलाज होने के बजाय उसका नया स्रोत भी बन सकता है। सूखे महीनों की किल्लत इस पर निर्भर करेगी कि जलाशय का पानी बिजली के लिए रोका जाता है या नीचे के लोगों के लिए छोड़ा जाता है। दोनों हितों में टकराव स्वाभाविक है।

नदी का जीवन सिर्फ़ पानी और गाद से नहीं बनता। सियांग पूर्वी हिमालय के उस जैव-विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है जो दुनिया के सबसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्रों में गिना जाता है। यहाँ के घने जंगल और ढलानें अनगिनत प्रजातियों का घर हैं, जिनमें कई अब भी ठीक से दर्ज नहीं हुईं। महसीर जैसी मछलियाँ प्रजनन के लिए ऊपरी धाराओं की ओर प्रवास करती हैं, और बांध की दीवार उनका रास्ता काट देगी। नीचे ब्रह्मपुत्र की गंगा डॉल्फ़िन जैसी प्रजातियाँ भी बदले बहाव और घटी गाद से प्रभावित होंगी। जलाशय के लिए जंगल कटेंगे, और डूबी वनस्पति के सड़ने से मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैस निकलती है। जिस परियोजना को स्वच्छ ऊर्जा बताया जा रहा है, उसका कार्बन-बहीखाता भी साफ़ नहीं है।

फिर संचयी प्रभाव का प्रश्न है। सियांग बेसिन में अब तक 29 पनबिजली परियोजनाओं को मंज़ूरी मिल चुकी बताई जाती है। भारत ने इस क्षेत्र में कुल 18,326 मेगावाट की परियोजनाओं को हरी झंडी दी है। हर परियोजना का पर्यावरण आकलन अलग-अलग होता है, जबकि पूरी घाटी पर उनका सम्मिलित असर कभी साझा तौर पर नहीं आँका जाता। एक नदी कितने बांध झेल सकती है, इसका कोई घाटी-स्तरीय जवाब नहीं दिया गया है। उधर सरकार की दिशा भी चिंता बढ़ाती है। वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 के तहत अंतरराष्ट्रीय सीमा से सौ किलोमीटर के दायरे में सामरिक परियोजनाओं के लिए वन विभाग की मंज़ूरी ज़रूरी नहीं रही। पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार अपर सियांग परियोजना को सामरिक श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ यह है कि जंगल कटने से पहले वह कानूनी जाँच ही कमज़ोर हो सकती है जो कभी जंगलों की ढाल थी।

इस नदी की कीमत सबसे पहले वे लोग चुकाएँगे जिनकी ज़मीन डूबेगी। अरुणाचल प्रदेश के सियांग ज़िले में प्रस्तावित 12,000 मेगावाट जलविद्युत परियोजना पर एक फैक्ट फाइंडिग कमेटी ने कहा कि 20 से अधिक गांव पूरी तरह डूब सकते हैं, जबकि 50 से अधिक गांव सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं. इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन, कृषि भूमि का नुकसान और पारंपरिक आजीविका पर असर पड़ने की आशंका है.डीडब्ल्यू से बात करते हुए पारोंग गाँव के मुखिया ने बताया कि उनके गाँव के 116 परिवारों में 43 के घर पूरी तरह डूब जाएँगे और बाकी विस्थापित हो जाएँगे। आंदोलनकारियों का कहना है कि आदी जनजाति के लगभग एक लाख लोग भूमिहीन हो सकते हैं। सियांग इंडीजीनस फ़ार्मर्स फ़ोरम पंद्रह वर्षों से इलाके की परियोजनाओं के विरुद्ध आंदोलन करता आ रहा है। ह्यूमन राइट्स ऑफ़ अरुणाचल ने भी सरकार से परियोजना की समीक्षा और प्रभावित समुदायों से व्यापक संवाद की माँग की है। “तीन सौ से अधिक गाँव” का आँकड़ा आंदोलनकारियों का है, आधिकारिक नहीं, और इसी पर सरकार को सबसे पहले पारदर्शिता दिखानी चाहिए। जब तक पुनर्वास योजना, पर्यावरण आकलन और समझौतों के दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं होते, हर संख्या विवादित रहेगी।

चीन के बांध का तर्क भी ठोस जाँच माँगता है। यह मान लेना कठिन है कि भारत की ओर बना जलाशय तिब्बत से आने वाले पानी को नियंत्रित करने की गारंटी देगा। इसका जवाब कंक्रीट के दूसरे ढाँचे से ज़्यादा पारदर्शी जल-आँकड़ों के आदान-प्रदान और कूटनीतिक समझौतों में मिलेगा। एक जोखिम भरे ढाँचे के जवाब में उसी भूकंपीय पट्टी में दूसरा जोखिम खड़ा करना सुरक्षा नहीं बढ़ाता। इससे दोनों तरफ़ की जोखिम-रेखा एक ही नदी पर टिक जाती है, जिसकी कीमत सियांग के आदिवासी और नीचे बसे असम-बांग्लादेश के किसान चुकाएँगे।

मुख्यमंत्री खांडू ने पिछले चुनाव अभियान में आश्वासन दिया था कि कोई भी परियोजना लोगों की सहमति से ही लागू होगी। इस बार भी उन्होंने कहा है कि परियोजना तकनीकी रूप से अव्यावहारिक निकली तो आगे नहीं बढ़ेगी और लोगों की इच्छा के विरुद्ध नहीं थोपी जाएगी। इस वादे की असली परीक्षा अब है। रास्ता सीधा है। सर्वे और ड्रिलिंग तब तक रुकें जब तक स्वतंत्र संस्थाएँ भूगर्भीय, भूकंपीय, जल-वैज्ञानिक और जैव-विविधता आकलन पूरा न कर लें, और उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक हो। गाँवों से सुरक्षा बलों की तैनाती घटे, और ग्रामसभाओं की सहमति औपचारिकता न रहकर निर्णय की असली शर्त बने। इसके बाद भी यह सवाल बचा रहेगा कि क्या देश को इतनी बड़ी बिजली इसी कीमत पर चाहिए, जबकि छोटी विकेंद्रित परियोजनाओं और सौर ऊर्जा के विकल्प मौजूद हैं।

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