हिमालयी सुरंगों के लिए “स्मार्ट टनल लाइफ-सेफ्टी सिस्टम” की जरूरत..

अजय सहाय

हिमालयी क्षेत्रों में बार-बार ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं कि सुरंग में अचानक पानी घुस गया, मलबा भर गया, सुरंग का हिस्सा धँस गया या श्रमिक अंदर फँस गए। समस्या केवल सुरंग की मजबूती की नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दुर्घटना शुरू होने और लोगों के फँसने के बीच बहुत कम समय मिलता है।

आज दुनिया में जल-रिसाव सेंसर, संरचनात्मक सेंसर, फाइबर आधारित निगरानी, सुरक्षित शरण-कक्ष, आपातकालीन निकास और समानांतर बचाव सुरंग जैसी तकनीकें अलग-अलग उपलब्ध हैं। आवश्यकता इन सभी तकनीकों को जोड़कर हिमालय के लिए एक स्वचालित, बहुस्तरीय जीवन-रक्षा प्रणाली विकसित करने की है।

1. दुर्घटना के बाद नहीं, दुर्घटना से पहले चेतावनी

सुरंग की सुरक्षा केवल सुरंग के अंदर से शुरू नहीं होनी चाहिए। सुरंग के ऊपर और आसपास के पूरे जलग्रहण क्षेत्र को सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

ऊपरी पहाड़ों पर स्वचालित वर्षामापी, नदी जलस्तर सेंसर, मिट्टी की नमी, भूजल दबाव, भूस्खलन सेंसर, भू-कंपन यंत्र और मौसम रडार लगाए जाएँ।

यदि ऊपर कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है, नदी अचानक बढ़ रही है या पहाड़ खिसकने के संकेत दे रहा है तो सुरंग के अंदर पानी पहुँचने का इंतजार नहीं किया जाए।

पहाड़ → जलग्रहण क्षेत्र → नदी → सुरंग

इन चारों को एक ही चेतावनी प्रणाली से जोड़ना होगा।

2. स्वचालित जलरोधी आपातकालीन दरवाजे

भविष्य की हिमालयी सुरंगों में सबसे महत्वपूर्ण नवाचार स्वचालित जलरोधी सुरक्षा-द्वार हो सकता है।

लंबी सुरंग को कई स्वतंत्र सुरक्षा खंडों में बाँटा जाए। प्रत्येक खंड के बीच अत्यधिक मजबूत जलरोधी दरवाजे हों।

यदि किसी हिस्से में अचानक भारी पानी, मलबा या असामान्य दबाव का पता चलता है तो सेंसर और नियंत्रण प्रणाली खतरे वाले हिस्से को बाकी सुरंग से अलग कर सकें।

लेकिन दरवाजा बंद होने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि कोई श्रमिक उसके बीच में न हो और कोई व्यक्ति खतरनाक हिस्से में बंद न हो जाए। इसलिए इसमें व्यक्ति पहचान सेंसर, कैमरे, रडार, अलार्म और मैनुअल नियंत्रण भी होना चाहिए।

इसे “स्मार्ट फ्लड आइसोलेशन गेट” के रूप में विकसित किया जा सकता है।

3. एक रास्ते वाली सुरंग नहीं—कई आपातकालीन रास्ते

किसी बड़ी हिमालयी सुरंग में केवल मुख्य प्रवेश और निकास पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।

यदि बीच में 50 या 100 मीटर हिस्सा धँस गया तो उसी रास्ते से लोगों को निकालना मुश्किल हो जाएगा।

इसलिए मुख्य सुरंग के समानांतर एक छोटी आपातकालीन जीवन-रक्षा सुरंग बनाई जानी चाहिए।

मुख्य सुरंग से निश्चित दूरी पर छोटे-छोटे क्रॉस-पैसेज इस सुरंग से जुड़े हों।

मुख्य सुरंग → आपातकालीन द्वार → क्रॉस-पैसेज → सुरक्षित सुरंग → बाहरी निकास

यदि मुख्य सुरंग का एक हिस्सा धँस जाए तो कर्मचारी निकटतम क्रॉस-पैसेज से दूसरी सुरक्षित सुरंग में पहुँचकर बाहर निकल सकें।

4. सुरंग के अंदर “लाइफ पॉड”

हर व्यक्ति दुर्घटना के समय बाहर नहीं निकल पाएगा। इसलिए लंबी सुरंगों में निश्चित अंतराल पर आपदा जीवन-कक्ष बनाए जाने चाहिए।

इनमें पर्याप्त समय के लिए स्वच्छ हवा या ऑक्सीजन व्यवस्था, पेयजल, प्राथमिक उपचार, आपातकालीन भोजन, संचार उपकरण, बैटरी, प्रकाश, तापमान नियंत्रण और व्यक्ति-स्थिति संकेतक उपलब्ध हों।

यदि दोनों तरफ के निकास बंद हो जाएँ तो कर्मचारी इस कक्ष में पहुँचकर बचाव दल की प्रतीक्षा कर सकें।

इन कक्षों को सामान्य आग से ही नहीं बल्कि पानी, कीचड़, बोल्डर और मलबे के दबाव से भी सुरक्षित बनाया जाना चाहिए।

5. सुरंग स्वयं बताए—“मैं कमजोर हो रही हूँ”

भविष्य की सुरंग को केवल कंक्रीट की संरचना नहीं बल्कि एक संवेदनशील स्मार्ट संरचना बनाना होगा।

सुरंग की दीवार और लाइनिंग के अंदर फाइबर आधारित सेंसर लगाए जाएँ।

यदि कहीं—

दरार बढ़े → चट्टान का दबाव बदले → लाइनिंग झुके → पानी का रिसाव बढ़े → असामान्य कंपन आए

तो प्रणाली तुरंत उस स्थान को पहचान सके।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता विभिन्न सेंसरों के आँकड़ों को जोड़कर बता सकती है कि सुरंग का कौन-सा हिस्सा सामान्य, सतर्कता या गंभीर खतरे की स्थिति में है।

इससे धँसाव होने के बाद पता चलने के बजाय धँसाव से पहले उसके संकेत पकड़ने की संभावना बढ़ेगी।

6. प्रत्येक कर्मचारी की स्थिति नियंत्रण कक्ष को पता हो

सुरंग दुर्घटना के बाद अक्सर सबसे बड़ा सवाल होता है—

“कितने लोग अंदर हैं और कहाँ फँसे हैं?”

यह स्थिति भविष्य में नहीं होनी चाहिए।

हर कर्मचारी के हेलमेट या जैकेट में एक छोटा सक्रिय स्थान-संकेतक लगाया जाए।

भूमिगत सुरंग में सामान्य उपग्रह आधारित स्थान प्रणाली पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसलिए सुरंग के भीतर स्थानीय बीकन और भूमिगत संचार नेटवर्क विकसित किया जाए।

नियंत्रण कक्ष की स्क्रीन पर हर समय जानकारी हो:

कुल कर्मचारी – 214

सुरंग के अंदर – 87

बाहर – 127

जीवन-कक्ष में – 19

संकट क्षेत्र में – 7

अंतिम ज्ञात स्थान – सुरंग खंड संख्या 7

तब बचाव दल को यह अनुमान लगाने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ेगा कि लोग कहाँ फँसे हैं।

7. तीन स्तर का “टनल अलार्म”

हिमालयी सुरंगों के लिए तीन स्तर की चेतावनी प्रणाली विकसित की जा सकती है।

पीला अलार्म: अत्यधिक वर्षा, भूजल दबाव बढ़ना, असामान्य कंपन या मामूली संरचनात्मक परिवर्तन। नए कर्मचारियों का प्रवेश रोक दिया जाए।

नारंगी अलार्म: पानी का रिसाव तेजी से बढ़ रहा हो, चट्टान की गतिविधि बढ़ रही हो या संरचनात्मक विकृति गंभीर हो। काम तत्काल बंद करके कर्मचारियों की निकासी शुरू हो।

लाल अलार्म: संभावित जल-प्रलय, भारी मलबा-प्रवाह या आसन्न धँसाव का संकेत। सुरक्षित खंडों का पृथक्करण, आवश्यक जलरोधी द्वार, आपातकालीन निकास और जीवन-कक्ष तत्काल सक्रिय किए जाएँ।

8. बिजली चली जाए तब भी सुरक्षा प्रणाली चलती रहे

जल-प्रलय या सुरंग धँसने के समय बिजली और सामान्य संचार भी समाप्त हो सकता है।

इसलिए सुरक्षा प्रणाली को मुख्य बिजली पर निर्भर नहीं रखना चाहिए।

हर महत्वपूर्ण सुरक्षा खंड में स्वतंत्र बैटरी, आपातकालीन ऊर्जा, स्थानीय नियंत्रण प्रणाली और वैकल्पिक संचार व्यवस्था हो।

मुख्य नियंत्रण कक्ष बंद हो जाने के बाद भी स्थानीय अलार्म, आपातकालीन प्रकाश, संचार और सुरक्षा-द्वार काम करते रहें।

अर्थात मुख्य कंप्यूटर बंद = सुरक्षा प्रणाली बंद, ऐसी स्थिति कभी नहीं होनी चाहिए।

9. सुरंग का “डिजिटल ट्विन”

प्रत्येक संवेदनशील हिमालयी सुरंग का एक वास्तविक समय डिजिटल प्रतिरूप बनाया जाना चाहिए।

नियंत्रण कक्ष की बड़ी स्क्रीन पर पूरी सुरंग का त्रि-आयामी नक्शा दिखाई दे।

उसमें लगातार दिखे—

पानी कहाँ रिस रहा है, भूजल दबाव कितना है, किस हिस्से में कंपन बढ़ा है, कहाँ संरचनात्मक विकृति हो रही है, कितने कर्मचारी अंदर हैं और कौन-सा आपातकालीन रास्ता सुरक्षित है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता इन सभी आँकड़ों को मिलाकर कुछ सेकंड में सुरक्षित निकासी का सर्वोत्तम रास्ता सुझाए।

10. आपदा के बाद जीवन खोजने की आधुनिक व्यवस्था

यदि फिर भी सुरंग धँस जाए तो भारी मशीन से तुरंत अंधाधुंध खुदाई शुरू नहीं होनी चाहिए।

पहले जीवन-खोज रडार, ध्वनि सेंसर, सूक्ष्म कैमरे, रोबोट और छोटे खोज उपकरणों से पता लगाया जाए कि लोग कहाँ मौजूद हैं।

फिर उसी दिशा में नियंत्रित बचाव मार्ग बनाया जाए।

इससे बचाव अभियान अधिक वैज्ञानिक और लक्ष्य आधारित हो सकता है।

11. सुरंग के भीतर आपातकालीन जल-निकासी क्षेत्र

जल-प्रलय वाली सुरंगों में केवल दरवाजे पर्याप्त नहीं होंगे। बड़ी क्षमता वाली जल-निकासी नालियाँ, भूमिगत जल-संग्रह कक्ष और उच्च क्षमता वाले स्वचालित पंप भी होने चाहिए।

सेंसर पानी बढ़ते ही पंप चालू कर दें।

अत्यधिक जल-प्रवाह होने पर अतिरिक्त पानी को कर्मचारियों वाले हिस्से से हटाकर विशेष जल-संग्रह क्षेत्र की ओर मोड़ने की इंजीनियरिंग व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

12. सुरंग के बाहर भी “सुरक्षा घेरा”

यदि सुरंग किसी हिमनद झील, नदी, खड़ी ढलान या संभावित मलबा-प्रवाह क्षेत्र के नीचे है तो खतरा कई किलोमीटर दूर से शुरू हो सकता है।

इसलिए सुरंग नियंत्रण कक्ष को केवल सुरंग के सेंसर से नहीं बल्कि ऊपरी पहाड़ के सेंसर से भी जानकारी मिलनी चाहिए।

यदि ऊपरी क्षेत्र में अचानक जल-प्रलय आने की आशंका हो तो पानी के सुरंग तक पहुँचने से पहले ही—

सायरन बजे → काम बंद हो → प्रवेश बंद हो → कर्मचारी निकलें → सुरक्षित खंड सक्रिय हों।

यही वास्तविक पूर्व चेतावनी होगी।

“हिमालयी स्मार्ट टनल लाइफ-सेफ्टी मिशन”

भारत, नेपाल और अन्य हिमालयी देशों को मिलकर “हिमालयी स्मार्ट टनल लाइफ-सेफ्टी मिशन” विकसित करना चाहिए।

इसका मूल सिद्धांत हो—

खतरे को पहाड़ पर पहचानो → सुरंग तक पहुँचने से पहले चेतावनी दो → प्रवेश रोक दो → कर्मचारियों को बाहर निकालो → खतरे वाले हिस्से को जलरोधी द्वार से अलग करो → मुख्य रास्ता बंद हो तो वैकल्पिक सुरंग से निकालो → दोनों रास्ते बंद हों तो लाइफ पॉड में सुरक्षित रखो → प्रत्येक व्यक्ति का स्थान बचाव दल को पता हो।

दुनिया को अब केवल मजबूत सुरंग नहीं, बल्कि बुद्धिमान और जीवन-रक्षक सुरंग की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

हिमालय जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में भविष्य की सुरंग ऐसी होनी चाहिए जो खतरे को महसूस करे, समय रहते अलार्म दे, प्रवेश स्वयं नियंत्रित करे, जल-प्रलय वाले हिस्से को अलग करे, कई आपातकालीन रास्ते उपलब्ध कराए और दुर्घटना होने पर भी लोगों को जीवित रहने का सुरक्षित स्थान दे।

*सुरंग निर्माण की सफलता केवल यह नहीं होनी चाहिए कि सुरंग कितनी लंबी और आधुनिक है; वास्तविक सफलता यह होगी कि सबसे बड़ी आपदा आने पर भी उसके अंदर काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सुरक्षित बाहर निकल सके। 

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