मुकुंद/अभिमन्यु,
चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र
#चित्रकूट के रामघाट पर आज सन्नाटा है। वह सन्नाटा जो आरती की भीड़, मंत्रों की गूंज और भक्तों के चरणों की थाप से बनी हुई थी — वह सब मिट्टी और कीचड़ में दफन है। — जल प्रलय की गवाही
#भारत के मानस पटल पर चित्रकूट का नाम सुनते ही मन में अनेक लहरें उठती हैं — कभी भक्ति की निर्मल धारा, कभी तपस्या की गहरी गुफा, तो कभी मंदाकिनी नामक उस नदी की मधुर छवि, जो सदियों से इस तीर्थ की आत्मा रही है। मगर इस वर्ष अगस्त के अंतिम दिनों में उसी प्राणदायिनी मंदाकिनी ने एक ऐसा रूप दिखाया, जिसने नौ दशक पुरानी स्मृतियों को झकझोर दिया। इसे महज वर्षा का दौर नहीं समझें— इसे एक ऐसा जलप्रलय माने, जिसने देश में एक गहरा प्रश्न छोड़ दिया- क्या हमने सचमुच अपनी नदियों को पहचाना है, या सदियों की उनकी सहनशीलता को अपनी जीत समझ बैठे हैं?
#कल तक जहां हर संध्या आरती की लौ नदी की लहरों पर टिमटिमाती थी, जहां भक्तों के पग-चिह्न पावन धरती को मुग्ध करते थे — वही रामघाट आज जल में विलीन है। घाट की दुकानें, होटल, धर्मशालाएं, मठ — सब अचानक जल समाधि में चले गए। नदी ने अपना स्थापित किनारा छोड़कर उन स्थानों तक पानी फैलाया, जहां आम दिनों में सूखा रहता था। 400 से अधिक दुकानों की भाग्य-रेखा एक रात में मलबे और कीचड़ के नीचे दब गई।
#बुनकर, व्यापारी, पुजारी, होटल संचालक — सबके सपनों का एक साथ संगम हुआ…। और वह संगम आंसुओं में बह गया। घर एक मंजिल तक डूबे, और परिवारों को छतों की शरण लेनी पड़ी। घाट के नीचे से सती अनुसुइया तक, गुप्त गोदावरी से कामदगिरि परिक्रमा तक — पूरा तीर्थ क्षेत्र जलमग्न रहा। जहां सैकड़ों श्रद्धालु नित्य दर्शन के लिए आते रहे हैं, वहां अब सिर्फ सन्नाटा था। नौका संचालन ठप, पर्यटन ठप, आस्था के द्वार बंद। जो क्षेत्र आस्था का केंद्र रहा, वह एक विशाल जल खंड में तब्दील हो गया।
#इस आपदा ने सबसे प्रबल संकेत यह दिया है — नदी ने अपना वह मूल और स्वाभाविक रास्ता पकड़ लिया, जिसे हम शायद बहुत पहले भूल चुके थे। सरकारी अभिलेखों में मंदाकिनी की चौड़ाई कहीं चालीस तो कहीं 125 मीटर तक दर्ज है, पर जमीन पर वह साल-दर-साल संकरी होती रही। किनारों पर पसरता अतिक्रमण, अवैध निर्माण, और नदी की रेत भूमि पर खड़े भवनों ने उसकी सांस लेने की जगह ही छीन ली।
#जब इंसान नदी की जगह को अपना समझ बैठता है, तो उसके पास एक ही उत्तर होता है — वह अपना हक वापस मांगने के लिए उफनती है। #चित्रकूट में यही हुआ। राज्य के शीर्ष अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से स्वीकारा कि इस बाढ़ की विकरालता के पीछे सिर्फ वर्षा नहीं, बल्कि नदी-तटों पर बिना रोक-टोक हुआ निर्माण और अतिक्रमण भी है। यह बात अहम है, क्योंकि सालों की निगरानी और बयानों के बावजूद जो सीमांकन तय होना चाहिए, वह कागजों पर ही अटका रहा। विधानसभा में कई बार मसला उठा, नाप-तौल भी हुई, पंच भी बने — फिर भी जमीन पर स्थिति जस की तस रही। …और बाढ़ ने वह सच हमारे सामने रख दिया, जो रिपोर्टों में दबा था।
#कोई आपदा आंकड़ों में सिमटकर नहीं आती, लेकिन पैमाना समझने के लिए इतिहास की ओर देखना जरूरी हो जाता है। इस सदी की शुरुआत में, 2003 में मंदाकिनी का जलस्तर 134.50 मीटर दर्ज हुआ था। इस बार घड़ी ने उसे पार कर 134.65 मीटर की दहलीज पकड़ी — कुछ ही सेंटीमीटर का अंतर, पर विनाश का नक्शा कहीं अधिक विस्तृत। यह अंतर संयोग नहीं है। पानी की मात्रा सीमित थी, लेकिन उसे फैलने के लिए जो जगह चाहिए थी, वह पहले ही सिकुड़ चुकी थी। इसलिए आपदा का पैमाना नदी ने नहीं, हमने बढ़ाया — हर बार बाढ़-क्षेत्र में खड़ा होता कोई नया भवन उस विस्तार को और भयावह बनाता गया।
#बचाव-कार्य के दृश्य भी हृदय-विदारक रहे। सेना के हेलीकॉप्टरों ने उन जीवन को एयरलिफ्ट किया, जो जल से घिरी इमारतों की छतों पर टिके थे। जवानों ने नावों से सैकड़ों लोगों को बाहर निकाला। राहत की बात यह रही कि इस बार जान का नुकसान नहीं हुआ — प्रशासन ने रात में ही चेतावनी देकर बड़ी संख्या में लोगों को पहले सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया था। पर जीवन बचा, जीविका नहीं बची। घर, दुकान, फसल, मवेशी — उस रात ने न जाने कितनों का सब कुछ एक साथ छीन लिया। यह आपदा आंकड़ों में कम, अनुभवों में बहुत बड़ा है, और हर अनुभव के पीछे असंख्य चेहरे हैं।
#सच यह है कि यह सब अचानक नहीं हुआ। अतिक्रमण का खेल सालों से चल रहा था, लेकिन समस्या यह थी कि बाढ़ आने तक किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जब तक नदी शांत है, उसके किनारे की जमीन कीमती लगती है, उस पर निर्माण करना व्यापार की दृष्टि से बुद्धिमानी लगता है। मगर यही ‘समझदारी’ आपदा के समय हमारे विरुद्ध जाती है। परिणाम यह कि जिन लोगों ने नदी की गोद में अपना आशियाना बनाया, वे अब शासन की राहत पर निर्भर हैं।
#एक दूसरा पहलू भी है। चित्रकूट केवल एक शहर नहीं, एक विचार है — तपस्या, वनवास और भगवान श्रीराम की लीला से जुड़ी पावन भूमि। जब यहां धार्मिक-पर्यटन, विकास और आधुनिक आवश्यकताएं आईं, तो नदी के किनारे ऊंचे भवनों, पार्किंग, होटल और धर्मशालाओं ने उस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया, जिस पर यह पवित्र भूमि टिकी है। विकास स्वयं गलत नहीं है, मगर विकास जब नदी की जगह खा जाए, तो वह विकास नहीं, आपदा को न्योता देने की तैयारी है।
#जलस्तर घटने के साथ मलबा हटाने, सड़कें बहाल करने, पीने के पानी और बिजली की व्यवस्था सुधारने का काम शुरू हो चुका है। ये जरूरी काम हैं, और इन्हें होते रहना चाहिए। लेकिन स्थायी समाधान इनमें नहीं है। असली व्यवस्था यह होगी, जो अगली बाढ़ को आपदा न बनने दे। इसके लिए कुछ ठोस कदम अनिवार्य हैं-
#पहला — नदी की असली जगह तय करना। समय आ गया है कि पुराने नक्शों, भू-सर्वेक्षण और आधुनिक तकनीक की मदद से नदी के वास्तविक फ्लड प्लेन का वैज्ञानिक निर्धारण हो। जीपीएस, सेटेलाइट इमेजरी और गहन मैपिंग से यह तय होगा कि नदी किन-किन क्षेत्रों तक फैल सकती है, और तभी उस सीमा को आधिकारिक रूप से लागू किया जा सकेगा।
#दूसरा — बाढ़-क्षेत्र से अतिक्रमण की सफाई। जब तक नदी में घुसी दुकानें, होटल, धर्मशालाएं और अन्य संरचनाएं वहां खड़ी रहेंगी, हर बाढ़ तबाही ही लाएगी। इन्हें व्यवस्थित ढंग से और समयबद्ध योजना से हटाना होगा, ताकि नदी का पानी अपनी सीमा में ही बह सके। यह कठिन काम है, पर अनिवार्य है।
#तीसरा — शहरी विकास को नदी के अनुकूल बनाना। नए निर्माणों के लिए ऐसे नियम जरूरी हैं, जो नदी के निकट भवनों, पुलों और व्यावसायिक गतिविधियों पर व्यावहारिक प्रतिबंध लगाएं। पुरानी संरचनाओं की जांच कर यह सुनिश्चित हो कि वे बाढ़-सहनशीलता के मानक पर खरी उतरें, वरना उनकी सुरक्षा का प्रबंध हो।
#चौथा — पूर्व-चेतावनी और तैयारी। इस आपदा में सबसे बड़ी सफलता रही कि कोई जान नहीं गई — वजह पहले से जारी चेतावनी और शीघ्र बचाव-तैयारी। इसी प्रणाली को और मजबूत किया जाए, ताकि नदी के जलस्तर की सटीक निगरानी और आपदा-पूर्व सतर्कता हर बार हमें आगे रखे।
#पांचवां — संवेदनशील इलाकों का पुनर्वास। जो परिवार बार-बार बाढ़ झेलते हैं, उन्हें सुरक्षित स्थानों पर बसाने की दीर्घकालिक योजना बने। नाव का हर चक्कर और छत पर बिताई हर रात सिर्फ एक घटना नहीं — एक इंसान की जिंदगी और उसका सारा संसार बहाने वाला अनुभव है।
#छठा — नदी-प्रणाली का समग्र प्रबंधन। जलवायु परिवर्तन के दौर में पहाड़ी क्षेत्रों की बारिश, जलाशयों के स्तर और मैदानी बहाव को जोड़कर देखने वाली संपूर्ण रणनीति जरूरी है। नदी के ऊपरी हिस्से में जो होता है, उसका असर नीचे के नगरों पर पड़ता है — और इस समझ के बिना संतुलन नहीं बन सकता।
#नदी को फिर से मां बनने दीजिए
चित्रकूट की यह बाढ़ केवल एक स्थानीय आपदा नहीं, पूरे देश के लिए एक दर्पण है। हर नदी के किनारे किसी न किसी रूप में ऐसा ही अतिक्रमण होता है — कहीं तेज, कहीं धीमा। चित्रकूट ने वह सच सामने रखा है, जिसे हम जानते हुए भी टालते रहे, नदी को उसकी जगह दिए बिना आपदा का अंत संभव नहीं।
#मासूम लहरों की वह पावन नदी, जिसे हम मां कहकर पुकारते हैं, उसे हमने ही सीमाओं में कैद कर दिया। असली श्रद्धा केवल आरती तक सीमित नहीं होती — वह नदी की जगह बचाने, उसे साफ रखने और सम्मान देने में है। अगर इस पीड़ा भरी घड़ी से हम यह सबक नहीं लेते, तो मंदाकिनी के किनारे बहा हर घर, हर सपना और हर जीविका व्यर्थ चली जाएगी।
#स्थायी हल संभव है, पर उसके लिए ठोस इरादा चाहिए — विकास और आस्था दोनों को नदी के साथ संतुलन में रखने का। अगर आज हम नदी का वैज्ञानिक सीमांकन कर दें, उसके किनारों को साफ कर दें और आपदा-प्रबंधन को मजबूत कर लें, तो यह तबाही आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ एक इतिहास बन जाएगी — एक कड़वा सबक, न कि हर वर्षा में दोहराया जाने वाला संकट।
#अभी के लिए, जलस्तर घट रहा है, पर नई बारिश की चेतावनी के बीच प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। बह गया रामघाट – हनुमानधारा पुल पानी उतरने के बाद दोबारा बसाया जाएगा — जिसमें आठ से नौ महीने लग सकते हैं; दीपावली के आयोजन के लिए अस्थायी पुल की भी योजना है। आस्था की इस भूमि पर उम्मीद है कि इस बार के दर्द से हम सचमुच कुछ सीखेंगे — चाहे वह नदी की जगह लौटाना हो, चाहे आने वाले कल की बेहतर तैयारी।
(लेखक द्वय में अभिमन्यु का पूरा नाम अभिमन्यु सिंह है। उन्हें लोग अभिमन्यु भाई के नाम से सम्मान देते हैं। वह चित्रकूट ही नहीं देश के प्रमुख नदी कार्यकर्ता हैं।