हिमालय की छाती चीरती सुरंगे और मौत का बढ़ता साया
पंकज चतुर्वेदी
लगता है हम अतीत के अनुभवों से कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं, तभी दुनिया के सबसे युवा और कच्ची पर्वतमाला के मर्म को समझे बगैर उसमें सुरंगे बना रहे हैं । बात अभी 13 अगस्त 2026, शाम करीब 6:10 से 6:45 बजे के बीच की है। हिमालय अपर्वत की गोद में भासे राज्य उत्तराखंड के चमोली जिले के मायापुर–पीपलकोटी क्षेत्र में टी एच डी एस इंडिया लिमिटेड की विष्णुगाड–पीपलकोटी हाइड्रो प्रोजेक्ट की तीन किलोमीटर लंबी टेल रेस टनल(सुरंग) के लगभग 1.5 किमी हिस्से में भू-धंसाव/मलबा व पानी आना शुरू हो गया । टनल के भीतर काम चल रहा था और अचानक सरिया वेल्डिंग/निर्माण कार्य के दौरान टनल के अंदर भारी भूस्खलन हुआ, जिससे पत्थर, मलबा और पानी टनल में घुस गया और मजदूर फंस गए। कुछ रिपोर्टों में पानी के तेज बहाव और सेवेज/सीपेज को भी कारण बताया गया है, जबकि सटीक कारण जांच के बाद तय किया जाएगा। कोई आठ मजदूर तो उसी समय मारे गए और बहुत से उसमें फंसे हुए हैं ।
हिमालय की छाती चीरती सुरंगे और मौत का बढ़ता साया: विकास की भारी कीमत
पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश के पहाड़ी राज्यों—विशेषकर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और सिक्किम—में सुरंगों के धंसने, पहाड़ दरकने और त्रासदियों की घटनाओं में खतरनाक तेजी आई है। उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग हो, जम्मू-कश्मीर का रामबन क्षेत्र हो, हिमाचल प्रदेश का मंडी हो या फिर सिक्किम की परियोजनाएं, हर तरफ से एक ही दर्दनाक कहानी सामने आ रही है। पहाड़ों के भीतर चल रहे इन विशाल निर्माण कार्यों के दौरान अचानक चट्टानें खिसक जाती हैं, भारी मलबा भर जाता है और दर्जनों मजदूर भीतर फंसकर अपनी जान गंवा बैठते हैं। इन हादसों ने देश की सबसे युवा और संवेदनशील पर्वतमाला की सुरक्षा और यहाँ चल रहे अंधाधुंध निर्माण कार्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है की विभिन्न भारतीय संस्थान शोध कर चेतावनी देते हैं लेकिन कथित विकास के हिमायती उन शोध के नतीजों को नजर अंदाज करते रहते हैं , अभी जून 26 में ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई आई टी ) मद्रास के शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है कि केदारनाथ क्षेत्र में बार-बार आने वाली आपदाएं और चारधाम मार्ग पर लगातार हो रहे भूस्खलन हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता की ओर संकेत करते हैं। अध्ययन के अनुसार भारतीय हिमालयी क्षेत्र के जिलों में पश्चिमी हिमालय, जिसमें उत्तराखंड भी शामिल है, पूर्वी हिमालय की तुलना में जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों के प्रति अधिक जोखिमग्रस्त पाया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो ) के वैज्ञानिकों के एक हालिया अध्ययन के अनुसार वर्ष 2025 में धराली गांव में आई आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) का कारण बर्फ के टुकड़ों वाले खुले क्षेत्र का अचानक ढहना था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह बाढ़ बादल फटने या हिमनदीय झील प्रस्फोट जनित बाढ़ (ग्लोफ़ ) की वजह से नहीं आई थी। बर्फ की यह परत श्रीकंठ हिमनद के ‘हिम-अपरदन क्षेत्र’ यानी निवेशन ज़ोन में स्थित था।
इसरो ने बताया की हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है , जिसके चलते हिमनदों का तेजी से पिघलकर पतला होना, वर्षा पैटर्न में बदलाव और बढ़ता तापमान मौसमी बर्फ की उस परत को कम कर देते हैं, जो सामान्यतः नीचे की बर्फ को सुरक्षित रखती है। इसके साथ ही हिमालय के राज्यों में तापीय एवं यांत्रिक अस्थिरता के चलते बर्फ के खुले व स्वतंत्र क्षेत्र तापमान में उतार-चढ़ाव और आंशिक हलचल के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया करती है। इससे इनके तेजी से पिघलने, टूटने और गुरुत्वाकर्षण की वजह से अचानक ढहने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे ही की शोध और चेतावनयां बताती हैं की हिमालय में अभी गहरी खुदाई खतरे से खाली नहीं ।
इन सभी दुर्घटनाओं के मूल में प्रकृति के अपने नियम और पृथ्वी के भीतर चल रही तीव्र भूवैज्ञानिक हलचल मुख्य रूप से जिम्मेदार है। वैज्ञानिक शोध और अध्ययन बताते हैं कि हिमालय दुनिया की सबसे नई और कच्ची पर्वत श्रृंखला है। भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच लगातार हो रही टक्कर के कारण यह पहाड़ लगातार ऊपर उठ रहा है और इसके भीतर भारी आंतरिक तनाव बना रहता है। इन पहाड़ों के भीतर कई ऐसी कमजोर जगहें होती हैं जहाँ चट्टानें पूरी तरह से जुड़ी नहीं होतीं। जब इन बेहद नाजुक, कच्ची और टूटी-फूटी चट्टानों के बीच भारी मशीनों और बारूदों से सुरंगें खोदी जाती हैं, तो पहाड़ों का नाजुक प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है।
विकास के नाम पर पहाड़ों के साथ हो रही भारी छेड़छाड़ इन आपदाओं को और अधिक विकराल बना रही है। अंधाधुंध वनों की कटाई और पहाड़ों के सीने पर धड़ल्ले से चल रही पेड़ों की कटाई के कारण मिट्टी की पकड़ कमज़ोर हो चुकी है। इसके अलावा, सुरंगों के निर्माण के लिए पहाड़ों के भीतर बड़े पैमाने पर किए जाने वाले शक्तिशाली बारूद के विस्फोटों से धरती कांप उठती है। इन लगातार होने वाले विस्फोटों से भीतर की कच्ची चट्टानें और दरारें अपनी जगह से खिसक जाती हैं, जिससे पहाड़ भीतर से खोखले और अस्थिर हो जाते हैं।
इसके साथ ही, पहाड़ों के पेट में पानी के छिपे हुए भंडार होते हैं। सुरंग खोदते समय जब इन गुप्त जल स्रोतों से अचानक पानी और दलदल का रिसाव शुरू होता है, या फिर चट्टानों के भीतर दबी जहरीली और विस्फोटक गैसों के भंडार फट जाते हैं, तो अंदर का पूरा ढांचा तबाह हो जाता है। उत्तरकाशी, चमोली और सिक्किम जैसी जगहों पर हादसों के दौरान यही देखा गया कि पानी और मलबे के अचानक आ जाने या गैस रिसाव से भयानक विस्फोट होने से बड़ी तबाही मची। ऊपर से जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र पूरी तरह बदल चुका है, और पहाड़ों पर बिना मौसम के अत्यधिक वर्षा तथा बादल फटने से ऊपरी सतह की मिट्टी ढीली होकर सुरंगों के मुहानों को बहा ले जाती है।
| पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी राज्यों में घटी प्रमुख सुरंग दुर्घटनाएं: भालुखोला रेलवे सुरंग, सिक्किम-पश्चिम बंगाल सीमा (17 जून 2021): लगातार मूसलाधार मानसून बारिश और भूस्खलन के कारण सुरंग का हिस्सा ढहा; इस हादसे में 2 मजदूरों की मौत हुई और अन्य फंसे रहे। रामबन (खूनी नाला) सुरंग, जम्मू-कश्मीर (मई 2022): राष्ट्रीय राजमार्ग पर निर्माणाधीन सुरंग का मुहाना और हिस्सा अचानक ढहने से हुए भीषण भूस्खलन में 10 मजदूरों की मौत हो गई। मंडी बाईपास सुरंग, हिमाचल प्रदेश (नवंबर 2022): सड़क मार्ग की निर्माणाधीन सुरंग का हिस्सा ढहने से बड़ा हादसा हुआ, जिसमें बड़े पैमाने पर मजदूर प्रभावित हुए। उत्तरकाशी (सिलक्यारा-बड़कोट) सुरंग, उत्तराखंड (12 नवंबर 2023): राष्ट्रीय राजमार्ग पर निर्माणाधीन सुरंग का लगभग सत्तावन मीटर हिस्सा अचानक भरभरा कर गिरा; सत्रह दिनों तक 41 मजदूर भीतर फंसे रहे, जिन्हें लंबे बचाव अभियान के बाद सुरक्षित निकाला गया । विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना, चमोली, उत्तराखंड (दिसंबर 2025 और अगस्त 2026): सुरंग के भीतर वाहनों की टक्कर और अगस्त 2026 में अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा घुसने से हुए हादसों में 9 मजदूरों की मौत दर्ज की गई। तीस्ता स्टेज-6 जलविद्युत परियोजना, सिक्किम (21 जुलाई 2026): नामची जिले में निर्माणाधीन सुरंग के भीतर चट्टानों के नीचे दबी जहरीली गैस के रिساव और भयानक विस्फोट के कारण हुए हादसे में 7 से 8 मजदूरों की मौत की पुष्टि हुई। इन गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए और भविष्य में ऐसी त्रादियां रोकने के लिए अब कड़े और पुख्ता कदम उठाने का समय आ गया है। सुरंग खोदने से पहले आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से पूरी ज़मीन की गहराई तक जांच होनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि अंदर चट्टानें कितनी कमजोर हैं या कहां विस्फोटक गैसें छिपी हैं। निर्माण के दौरान पहाड़ों के भीतर भारी बारूदों के इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए और ऐसी उन्नत तकनीकें अपनाई जानी चाहिए जो चट्टानों के खिसकने की चेतावनी पहले ही दे दें। इसके अलावा, पहाड़ों पर पेड़ों की कटाई रोककर बड़े पैमाने पर हरियाली लौटानी होगी और हर बड़ी सुरंग के साथ एक समानांतर निकास मार्ग का होना अनिवार्य किया जाना चाहिए। विकास देश की जरूरत है, लेकिन वह विकास किसी भी कीमत पर हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता और इंसान की जान पर भारी नहीं पड़ना चाहिए। |