भारत में कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी ढांचागत चुनौती जोतों का घटता आकार है।   छोटे रकवे के कारण खेती लाभ का सौदा है नहीं । इसका क्या निराकरण है। यह लेख इसी विषय पर है । 

कम होता  खेत का आकार और घाटे के खेती

पंकज चतुर्वेदी

बीते एक दशक के दौरान विभिन्न सरकारी योजनाओं के बावजूद  खेती-किसानी लाभ का सौदा बन नहीं पाई । खेती की लागत तो बढ़ी लेकिन मौसमी जोखिम, बीज-खाद के बढ़ते दाम और मंडी में मनमानी के चलते किसान  कर्जे में ही दबा रहा । बारीकी से आकलन करें तो देखते हैं कि घटती जोत या खेत का आकार किसानी को कर्जे से उबरने नहीं दे रही । बढ़ती आबादी और परिवारों में होते बंटवारे के चलते खेतों के लगातार छोटे टुकड़े हो रहे हैं जिससे खेत छोटे होते जा रहे हैं । जब खेत का आकार छोटा है तो यदि अत्याधुनिक मशीनरी का प्रयोग करेंगे तो लागत तो बढ़ेगी लेकिन फसल अपेक्षित मात्रा में हगी नहीं । कागजों पर खेत और किसान बढ़ रहे है लेकिन खेती घट रही है । भारतीय खेती-किसानी की इस चुनौती के लिए व्यापक सामाजिक और सहकारी क्रांति के जरूरत है वरना कम होते रकबा किसी दिन खेती को शून्य कर देंगे ।

जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम ने खेती के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है । गांवों में खेती के साथ पशु पालन या ऐसे ही कुटीर उद्योग  की बात तो होती है लेकिन क्या किसान और उसके परिवार के पास इसके लिए समय और संसाधन होते हैं ?  इस पर गंभीरता से विचार न करने के चलते कागजों पर दमकती योजनाएं जमीनी धरातल पर बिसूरती दिखती हैं । सीमांत किसानों के पास एक एकड़ से भी कम खेती रह गई है। देश के किसानों के खेत का आकार सवा दो हेक्टेयर से घटकर एक हेक्टेयर रह गया है। इसमें साल दर साल गिरावट दर्ज की जा रही है।

देश में किसानों की कुल संख्या 14.57 करोड़ हो चुकी है, जो पांच साल पहले 13.83 करोड़ थी। इनमें लघु व सीमांत किसानों की संख्या 86 फीसद है । वे किसान जिनके पास कृषि योग्य भूमि 1 हेक्टेयर (लगभग 2.5 एकड़) से कम होती है, वे सीमांत  और 1 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर (लगभग 5 एकड़) वाले किसान लघु कहलाते हैं ।  पिछले एक दशक में सीमांत किसानों की संख्या साढ़े तीन करोड़ से बढ़कर हुई दस करोड़ हो गई । उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और कृषि निर्भर राज्य में लघु व सीमांत किसान 92 फीसद से भी अधिक है ।  विदित हो वर्ष 1970-71 में सीमांत किसानों की संख्या 3.62 करोड़ थी, जो 2015-16 में बढ़कर 9.98 करोड़ पहुंच गई। जबकि बड़े किसान 27.66 लाख थे, उनकी संख्या घटकर 8.31 लाख रह गई है। एक बात  देखी गई कि    जिन राज्यों में भूमि सुधार सही तरीके से नहीं हुए वहाँ बड़े किसानों की संख्या सर्वाधिक है। जैसे कि हरियाणा जैसे छोटे राज्य में बड़े किसानों की संख्या 41 हजार है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मात्र 23 हजार बड़े किसान हैं जबकि उत्तर प्रदेश में लघु व सीमांत किसान 93 फीसद हैं। इन किसानों के लिए खेती के दम पर दो वक्त का भोजन जुटाना भी असंभव होता  है और ये मजबूरी में बड़े शहरों में अनियोजित श्रम सेक्टर में काम करते हैं । अब तो देश में बड़े किसानों की कुल संख्या 8.31 लाख ही बची है ।

आज जरूरत है कि छोटे किसान मिल-जुल कर कुछ प्रयास करें । जब एक अकेला छोटा किसान बाजार में जाता है, तो न तो वह खाद-बीज सस्ते दाम पर खरीद पाता है और न ही अपनी फसल को सही दाम पर बेच पाता है। इसका समाधान ‘समूह की शक्ति’ में है। किसान उत्पादक संगठनों (एफ पी ओ ) के माध्यम से जब 100-200 किसान एक साथ आते हैं, तो वे सामूहिक रूप से इनपुट खरीद सकते हैं और सीधे बड़ी कंपनियों या मंडियों से मोलभाव कर सकते हैं। इससे लागत कम होती है और मुनाफे में वृद्धि होती है। केवल पारंपरिक फसलों (जैसे गेहूं, धान) पर निर्भर रहकर छोटे खेतों से परिवार का खर्च नहीं चलाया जा सकता। छोटे किसानों को एकीकृत कृषि मॉडल अपनाना होगा। इसके तहत खेत के एक हिस्से में अनाज, एक हिस्से में उच्च मूल्य वाली सब्जियां, और साथ में डेयरी, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन या मशरूम उत्पादन जैसी गतिविधियां जोड़नी होंगी। यदि किसी कारणवश एक फसल खराब भी होती है, तो दूसरी गतिविधि से किसान की दैनिक आय सुनिश्चित रहती है।

हालांकि हमारे गांवों में व्याप्त जाती-धर्म और व्यक्तिगत विद्वेषों की गहरी परंपरा के बीच यह दूर की कौड़ी है । समझना होगा कि मुमकिन नहीं है। इसके लिए गांवों में ‘कस्टम हायरिंग सेंटर्स’ (यंत्र बैंक) को बढ़ावा देना जरूरी है, जहां से किसान किराए पर आधुनिक मशीनें ले सकें। इसके अलावा, आपसी सहमति से खेतों की कटीली तारें या मेढ़ें हटाकर सहकारी खेती करने से मशीनों का उपयोग आसान होता है और खेती की लागत में कमी आती है। हालांकि हमारे देश में ही गुजरात के आनंद जिले का गंभरा  गाँव सामूहिक खेती का सबसे पुराना और सफल उदाहरण है। यहाँ 1950 से यह काम हो रहा है । इसके अलावा केरल का कुटुम्बश्री मिशन दुनिया के सबसे बड़े महिला सशक्तिकरण और सामूहिक खेती के मॉडलों में से एक है।  यहाँ लाखों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों (एस एच जी) के माध्यम से ‘जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप्स’ (जे एल जी ) बनाती हैं। वे परती पड़ी या पट्टे  पर ली गई ज़मीन पर सामूहिक रूप से जैविक खेती करती हैं। इस तरह  आज केरल में हज़ारों एकड़ ज़मीन पर ये महिलाएं धान, सब्जियां और फल उगा रही हैं। इससे न केवल उनकी आय बढ़ी है, बल्कि वे बाजार की अनिश्चितताओं से भी सुरक्षित हुई हैं।

महाराष्ट्र के नासिक में  सह्याद्रि फार्म्स भी छोटे किसानों का आधुनिक एफ पी ओ  मॉडल है । यहाँ के छोटे किसानों ने ‘किसान उत्पादक कंपनी’  बनाकर वैश्विक बाजार तक पहुँच बना ली । इसमें लगभग 8,000 से अधिक छोटे किसान (जिनके पास औसतन 1-2 हेक्टेयर ज़मीन है) जुड़े हैं । इन्होंने सामूहिक रूप से आधुनिक कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और निर्यात की सुविधाएं खड़ी की हैं। जो छोटे किसान पहले अपनी अंगूर या टमाटर की फसल स्थानीय व्यापारियों को सस्ते में बेचते थे, आज वे सीधे यूरोप जैसे देशों में निर्यात कर रहे हैं।

इसी तरह का एक सफल मॉडल तेलंगाना का  डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी है । इसमें तेलंगाना के मेडक जिले में दलित और सीमांत महिला किसानों ने मिलकर अपनी बंजर ज़मीन को उपजाऊ बनाया है। इन्होंने पारंपरिक मोटे अनाजों “मिलेट्स” की सामूहिक खेती पर ध्यान दिया। इन्होंने अपना खुद का बीज बैंक और सामुदायिक रेडियो तक बनाया है ताकि ज्ञान का आदान-प्रदान हो सके।

इसमें कोई शक नहीं पारंपरिक रासायनिक खेती में खाद और कीटनाशकों का खर्च लगातार बढ़ रहा है, जो छोटे किसानों का बजट बिगाड़ देता है। ऐसे में देश के इन सफल समूडाइक खेती मॉडल का प्रचार और उन पर विश्वास स्थापित करना अनिवार्य होत जा रहा है । सामुदायिक  प्राकृतिक खेती  या जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाकर लागत को न्यूनतम किया जा सकता है। साथ ही, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर) के प्रयोग से पानी और खाद की बर्बादी रुकती है, जिससे सीमित संसाधनों में भी उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।

छोटे रकबे की खेती को लाभ का सौदा बनाने के लिए नीतिगत प्रयासों और किसानों की सोच में बदलाव, दोनों की समान आवश्यकता है। जमीन का आकार बढ़ाना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन उस सीमित जमीन के प्रबंधन और विपणन  के तरीकों को बदलकर छोटे किसानों की तकदीर यकीनन बदली जा सकती है।

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