केरल में स्वास्थ्य विभाग शिगेला  संक्रमण के प्रकोप से अलर्ट पर है। दूषित भोजन और पानी से फैलने वाले इस बैक्टीरियल संक्रमण के कारण राज्य में 6  लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इस साल अब तक 146 मामले सामने आ चुके हैं। इस संक्रमण ने केरल के स्वास्थ्य सूचकांक जैसे दावों की पोल खोल कर रख दी है । यह लेख इसी विषय पर है। 

स्वास्थ्य सूचकांकों में अव्वल केरल में शिगेला के बहाने सामने आई जल प्रबंधन की लाचारी

पंकज चतुर्वेदी

केरल में गंदे पानी से फैलने वाले शिगेला बैक्टीरिया के कारण केरल में छ लोगों की मौत और कई के बीमार होने से  राज्य की बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक जल वितरण प्रणाली की पोल खोल दी  है । शिगेला जैसी महामारियां केवल एक चिकित्सा चुनौती नहीं हैं, बल्कि यह हमारे बदलते पारिस्थितिक तंत्र, अनियंत्रित शहरीकरण और जल प्रबंधन की विफलताओं का एक सीधा और डरावना परिणाम हैं। केरल जैसे आधुनिक, प्रबुद्ध और प्रगतिशील राज्य में, जो अपनी उच्च साक्षरता, बेहतरीन स्वास्थ्य सूचकांकों और दुनिया भर में सराहे गए ‘केरल मॉडल’ के लिए जाना जाता है, यदि वहां इस साल अब तक 146 मामले और छह  मौतें दर्ज की जा चुकी हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि अदृश्य माइक्रोबियल दुनिया और हमारे पर्यावरण के बीच का संतुलन कहीं न कहीं बहुत गहरे स्तर पर गड़बड़ा गया है। यह विडंबना ही है कि मानव विकास के कई पैमानों पर देश का नेतृत्व करने वाला राज्य आज गंदे और दूषित पानी से फैलने वाली एक बुनियादी बीमारी के सामने लाचार नजर आ रहा है।

शिगेला को वैज्ञानिक दृष्टि से समझना इस लड़ाई का पहला कदम है। यह मुख्य रूप से ‘एंटरोबैक्टीरियासी’ परिवार से ताल्लुक रखने वाला एक ग्राम-निगेटिव, रॉड के आकार का बैक्टीरिया है, जो इंसानों की आंतों पर हमला करता है। जब यह शरीर में प्रवेश करता है, तो यह आंतों की परत को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर देता है, जिससे तीव्र पेचिश, पेट में मरोड़, तेज बुखार और कभी-कभी मल के साथ खून आने लगता है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को ‘शिगेलोसिस’ कहा जाता है। इस बैक्टीरिया की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह बेहद संक्रामक है; इसकी बहुत मामूली मात्रा, यानी महज 10 से 100 बैक्टीरिया भी एक स्वस्थ इंसान को गंभीर रूप से बीमार करने के लिए काफी होते हैं। वैज्ञानिकों ने शिगेला की चार प्रमुख प्रजातियों की पहचान की है, जिनमें शिगेला डिस्सेंट्री को सबसे घातक माना जाता है क्योंकि यह ‘शिगा टॉक्सिन’ नामक एक शक्तिशाली जहर पैदा करता है, जो गुर्दों को फेल कर सकता है। अन्य प्रजातियों में शिगेला फ्लेक्सनेरी, शिगेला ब्वॉइडी और शिगेला सोनई शामिल हैं, जिनमें से अंतिम प्रजाति अक्सर उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहां स्वच्छता की स्थिति थोड़ी बेहतर होती है लेकिन फिर भी संक्रमण फैल जाता है।

इस बैक्टीरिया के प्रसार के पीछे की पारिस्थितिकी और पर्यावरण विज्ञान को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध हमारे जल स्रोतों की गुणवत्ता से है। शिगेला का प्राथमिक स्रोत संक्रमित मानव का मल होता है और इसका फैलाव पूरी तरह से गंदे और दूषित पानी पर निर्भर करता है। उल्लेखनीय है कि केरल में कोच्चि , अलेपूझा  जैसे कई  शहर पानी के कमी से तो जूझ ही रहे हैं यहाँ शहरों में सुरक्षित जल आपूर्ति का प्रतिशत महज 55 है । इसके अलावा अधिकांश बड़े शहरों में सीवर व्यवस्था पुरानी या नाकाफ़ी है । इसी के चलते शिगेला को यहाँ पैर जमाने में मदद मिली। हालांकि  यह बैक्टीरिया पर्यावरण में स्वतंत्र रूप से लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता, लेकिन अगर इसे दूषित पानी या नमी वाले भोजन का सहारा मिल जाए, तो यह तेजी से फैलता है। केरल के संदर्भ में, जहां मानसूनी बारिश और उथले भूजल स्तर के कारण कुओं और अन्य जल स्रोतों का नेटवर्क आपस में बहुत संवेदनशील तरीके से जुड़ा हुआ है, वहां सीवेज या सेप्टिक टैंकों से होने वाला रिसाव सीधे पीने के पानी को दूषित कर देता है। जब कोई व्यक्ति इस दूषित पानी का सेवन करता है, या इस पानी से धोए गए फल और सब्जियां खाता है, तो वह अनजाने में इस संक्रमण का शिकार हो जाता है। इसके अलावा, होटल, रेस्तरां और शादियों जैसे सामूहिक भोज में खाद्य स्वच्छता की अनदेखी, जैसे कि संक्रमित रसोइयों या फूड हैंडलर्स द्वारा बिना हाथ धोए खाना परोसना, इस बैक्टीरिया को एक बड़ा ‘सुपर-स्प्रेडर’ इवेंट बनने का मौका दे देता है।

यदि हम शिगेला के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि इंसानी सभ्यता और युद्धों के इतिहास के साथ इसका गहरा और दर्दनाक नाता रहा है। इस बैक्टीरिया की खोज का श्रेय जापानी चिकित्सक और जीवाणुविज्ञानी कियोशी शिगा को जाता है, जिन्होंने साल 1897 में जापान में फैली एक विनाशकारी पेचिश महामारी के दौरान इस सूक्ष्मजीव को पहली बार अलग किया था। उस महामारी में हजारों लोगों की जान चली गई थी, और डॉक्टर शिगा की इस खोज के सम्मान में ही इस बैक्टीरिया का नाम ‘शिगेला’ रखा गया। ऐतिहासिक रूप से, शिगेला को ‘युद्धों की बीमारी’ भी कहा जाता रहा है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब सैनिक खंदकों और शिविरों में बेहद अस्वच्छ परिस्थितियों में रहते थे, तब शिगेला संक्रमण के कारण गोलियों से ज्यादा मौतें पेचिश से हुई थीं। अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान भी इस बैक्टीरिया ने दोनों पक्षों की सेनाओं को पंगु बना दिया था। इतिहास गवाह है कि जब-जब मानवीय बस्तियों में स्वच्छता का बुनियादी ढांचा ढहा है, चाहे वह युद्ध के कारण हो, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के कारण हो, या फिर आधुनिक समय के अनियोजित शहरीकरण के कारण, शिगेला ने महामारी का रूप अख्तियार किया है।

केरल जैसे राज्य के लिए यह स्थिति एक बड़ी चेतावनी  है क्योंकि यह विरोधाभास आधुनिकता की चकाचौंध के पीछे छिपी हमारी पर्यावरण प्रबंधन की कमियों को उजागर करता है। वैश्विक तापमान में वृद्धि और अप्रत्याशित मौसम चक्र सीधे तौर पर जलजनित बैक्टीरिया के व्यवहार को प्रभावित कर रहे हैं। भारी बारिश और अचानक आने वाली बाढ़ के कारण बाढ़ का पानी सीवेज प्रणालियों को ओवरफ्लो कर देता है, जिससे मल में मौजूद बैक्टीरिया पीने के साफ पानी के स्रोतों में मिल जाते हैं। इसके विपरीत, गर्मियों के दिनों में जब सूखे जैसी स्थिति बनती है और पानी की कमी होती है, तब लोग मजबूरन असुरक्षित जल स्रोतों का रुख करते हैं, जो शिगेला को फैलने का मुफीद माहौल देता है। उच्च तापमान बैक्टीरिया के तेजी से दोगुना होने की दर को भी बढ़ा देता है, जिससे भोजन बहुत जल्दी दूषित हो जाता है।

एक और गंभीर वैज्ञानिक चिंता एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति इस बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता यानी ‘एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ को लेकर है। अतीत में, शिगेलोसिस का इलाज सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं से आसानी से हो जाता था, लेकिन आधुनिक समय में दवाओं के अत्यधिक और अंधाधुंध उपयोग के कारण शिगेला की कई प्रजातियां अब ‘सुपरबग’ में तब्दील हो रही हैं। केरल के मौजूदा संकट में मौतों का एक कारण यह भी हो सकता है कि पारंपरिक दवाएं इस बैक्टीरिया पर बेअसर साबित हो रही हों। यह स्थिति चिकित्सा विज्ञान के लिए एक रेड अलर्ट है, क्योंकि यदि बुनियादी एंटीबायोटिक काम करना बंद कर देंगी, तो एक साधारण सी दिखने वाली पेचिश भी जानलेवा महामारी का रूप ले लेगी।

केरल का यह संकट हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति और पर्यावरण के बुनियादी नियमों को भूलते जा रहे हैं। प्रचुर वर्षा और समृद्ध प्राकृतिक संपदा वाले इस आधुनिक राज्य में अगर लोग आज भी गंदे और दूषित पानी को पीने के कारण जान गंवा रहे हैं, तो यह हमारे जल संरक्षण, शहरी नियोजन और अपशिष्ट प्रबंधन की नीतियों पर एक बड़ा सवालिया निशान है। यह चुनौती साबित करती है कि बुनियादी ढांचा चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, यदि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों विशेषकर जल निकायों की शुद्धता बनाए रखने में विफल रहे, तो प्रकृति हमें आदिम दौर की बीमारियों की तरफ धकेल देगी। होटल उद्योग में कड़े स्वच्छता मानकों को लागू न करना और सार्वजनिक जल स्रोतों की नियमित क्लोरीनीकरण व जैविक जांच में ढिलाई बरतना इस बैक्टीरिया को खुला निमंत्रण देने जैसा है।

इस समस्या का समाधान केवल अस्पतालों में मरीजों को दवाएं देने तक सीमित नहीं हो सकता। हमें एक ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और हमारे पर्यावरण की सुरक्षा को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। जब तक हम अपने जल निकायों को सीवेज के प्रदूषण से मुक्त नहीं करेंगे, जब तक हम हर नागरिक के लिए सुरक्षित और शुद्ध पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करेंगे, और जब तक जमीनी स्तर पर स्वच्छता को एक बुनियादी नागरिक चेतना नहीं बनाया जाएगा, तब तक शिगेला जैसे बैक्टीरिया बार-बार लौटकर हमारी आधुनिक व्यवस्था को चुनौती देते रहेंगे। केरल की ये पांच मौतें महज आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र के बिगड़ते संतुलन की एक गंभीर चेतावनी हैं, जिसे यदि अब भी नजरअंदाज किया गया तो इसके परिणाम भविष्य में और भी भयानक हो सकते हैं।

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