जैव विविधता का विनाश केवल वन्यजीवों का संकट नहीं है। यह हमारे भोजन, पानी, स्वास्थ्य और जीवन के भविष्य पर मंडराता खतरा है।
धीरेंद्र कुमार त्रिपाठी, सहायक संपादक, इंडिया क्लाइमेट चेंज डॉट कॉम
प्रकृति में मधुमक्खियों से लेकर विशालकाय व्हेल तक, हर जीव की अपनी भूमिका है। इंसान की आंतों में रहने वाले सूक्ष्म जीव हों या समुद्र की गहराइयों में विचरण करने वाली विशाल व्हेल, पृथ्वी पर मौजूद जीवन के तमाम रूप मिलकर जैव विविधता का निर्माण करते हैं। यही विविधता प्रकृति की असली ताकत है।
प्रकृति को एक ऐसी टीम की तरह समझा जा सकता है, जिसमें हर सदस्य का अपना काम है। पेड़-पौधे, जीव-जंतु और सूक्ष्मजीव मिलकर जलवायु का संतुलन बनाए रखते हैं, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, पानी को स्वच्छ करते हैं और खाद्य उत्पादन में मदद करते हैं। प्रकृति की ये सेवाएं ही मानव जीवन का आधार हैं।
प्रकृति संरक्षण संगठन वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की मुख्य वैज्ञानिक रेबेका शॉ कहती हैं, “यह एक अमूर्त अवधारणा लग सकती है, लेकिन हम हर दिन इसका अनुभव करते हैं। जब प्रकृति ठीक ढंग से काम कर रही होती है, तब हम शायद ही कभी उसके महत्व के बारे में सोचते हैं।”
लेकिन अब प्रकृति का यही तंत्र गंभीर संकट से गुजर रहा है। जैव विविधता में तेजी से आ रही गिरावट के कारण वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ रही है। गहन कृषि, जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल, प्लास्टिक और रासायनिक प्रदूषण जैसी मानवीय गतिविधियां पारिस्थितिकी तंत्र को विनाश की ओर धकेल रही हैं।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की हालिया ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट’ के अनुसार, पिछले 52 वर्षों में निगरानी किए गए कशेरुकी जीवों की आबादी में औसतन 73 प्रतिशत की गिरावट आई है। मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति और भी खराब है, जहां यह गिरावट 85 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
अन्य अध्ययनों में भी चेतावनी दी गई है कि यदि प्रकृति पर मानवीय दबाव कम नहीं हुआ, तो दुनिया भर में लगभग 10 लाख पशु और पौधों की प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं।
रेबेका शॉ के मुताबिक, यह गिरावट बेहद चिंताजनक है। यह संकेत है कि प्रकृति संकट में है और जीवन का वह ताना-बाना टूट रहा है, जिस पर हमारी स्वच्छ हवा, पेयजल और भोजन की निर्भरता है।
इसी संकट से निपटने के लिए लगभग 200 देशों के प्रतिनिधि आर्मेनिया की राजधानी येरेवान में संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता सम्मेलन कॉप-17 में जुट रहे हैं। सम्मेलन का उद्देश्य 2030 तक प्रकृति के विनाश को रोकने और उसकी भरपाई करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना है। हालांकि, अब तक की प्रगति लक्ष्यों के अनुरूप नहीं है। पर्याप्त धन जुटाना और तय योजनाओं को जमीन पर लागू करना बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
प्रकृति का विनाश सीधे हमारे जीवन को प्रभावित करता है
जैव विविधता के नुकसान का असर केवल जंगलों और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। यह हमारे पीने के पानी, भोजन और स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।
आर्द्रभूमियों का उदाहरण लें। दलदल, झीलों के आसपास के नम क्षेत्र और अन्य आर्द्रभूमियां प्राकृतिक जल शुद्धिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अनुमान है कि वर्ष 1700 से 2000 के बीच दुनिया की लगभग 85 प्रतिशत आर्द्रभूमियां नष्ट हो गईं।
कनाडा की वाटरलू यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार, दक्षिणी ओंटारियो के दलदली क्षेत्र हर वर्ष लगभग 4.2 अरब कनाडाई डॉलर मूल्य की जल शुद्धिकरण सेवाएं प्रदान करते हैं। ये पानी में मौजूद फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों को हटाकर पेयजल स्रोतों को साफ रखने में मदद करते हैं।
जब ऐसे प्राकृतिक क्षेत्र नष्ट होते हैं, तो पानी की गुणवत्ता गिरती है और उसे पीने योग्य बनाने पर होने वाला खर्च बढ़ जाता है। यानी जिस काम को प्रकृति मुफ्त में करती है, उसके लिए इंसान को बाद में भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
खाद्य उत्पादन पर भी जैव विविधता के क्षरण का सीधा असर पड़ता है। दुनिया की 75 प्रतिशत से अधिक खाद्य फसल किस्में किसी न किसी रूप में मधुमक्खियों, चमगादड़ों और दूसरे जीवों द्वारा किए जाने वाले परागण पर निर्भर हैं। इन जीवों की संख्या घटने का अर्थ है फसलों के उत्पादन पर बढ़ता खतरा।
दूसरी ओर, मिट्टी का क्षरण, पारिस्थितिकी तंत्र की कमजोरी, लू और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसमी घटनाएं भी फसलों को नुकसान पहुंचा रही हैं।
ब्रिटेन सरकार की एक रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वहां के सभी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विनाश की दिशा में बढ़ रहे हैं। इससे वैश्विक खाद्य आपूर्ति और देशों के बीच राजनीतिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
लंदन की जूलॉजिकल सोसायटी की शोधकर्ता लुईस मैकरे कहती हैं कि ब्रिटेन सहित कई देश अपनी खाद्य जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। इसलिए वहां की खाद्य सुरक्षा भी दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रकृति की स्थिति से जुड़ी हुई है।
यह समस्या किसी एक देश तक सीमित नहीं है। आज वैश्विक व्यापार और खाद्य आपूर्ति की व्यवस्था ऐसी है कि एक क्षेत्र में पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने का असर दूसरे क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
प्रकृति की गोद में छिपी हैं भविष्य की दवाएं
प्रकृति मानव स्वास्थ्य के लिए भी अनमोल है। आधुनिक चिकित्सा की अनेक दवाएं प्राकृतिक पदार्थों से प्राप्त हुई हैं या उनसे प्रेरित होकर बनाई गई हैं।
पेनिसिलिन इसका प्रमुख उदाहरण है। पहली एंटीबायोटिक के रूप में पहचानी गई पेनिसिलिन एक प्रकार की फफूंद से प्राप्त हुई थी। अनुमान है कि इसने 50 करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई है। इसकी खोज से पहले मामूली घाव भी गंभीर संक्रमण और मृत्यु का कारण बन सकता था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कैंसर की लगभग 70 प्रतिशत दवाएं प्राकृतिक पदार्थों से प्राप्त होती हैं या ऐसे कृत्रिम यौगिकों पर आधारित हैं, जिनकी प्रेरणा प्रकृति से मिली है।
जहरीले मेंढकों सहित अनेक जीवों में ऐसे रासायनिक पदार्थ हो सकते हैं, जिनसे भविष्य में नई दवाएं विकसित की जा सकें। लेकिन जब कोई प्रजाति विलुप्त हो जाती है, तो उसके साथ उसकी जैविक विशेषताओं और संभावित औषधीय उपयोगों को जानने का अवसर भी हमेशा के लिए खो सकता है।
इसलिए जैव विविधता का विनाश केवल वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाली चिकित्सा संबंधी खोजों के लिए भी खतरा है।
एक प्रजाति के गायब होने से बिगड़ सकता है पूरा तंत्र
प्रकृति में कुछ प्रजातियां ऐसी होती हैं, जिनकी भूमिका उनके आकार या संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। वैज्ञानिक इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र की प्रमुख या आधारभूत प्रजातियां कहते हैं। इनके लुप्त होने से कई दूसरी प्रजातियों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है।
सीप इसका एक उदाहरण है। दुनिया भर में प्राकृतिक सीपों की आबादी तेजी से घटी है और उनकी चट्टानी संरचनाओं का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है।
एक वयस्क सीप प्रतिदिन लगभग 50 गैलन पानी छान सकता है। इस प्रक्रिया से पानी में मौजूद कुछ कण और पदार्थ हटते हैं तथा जल की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है।
रेबेका शॉ कहती हैं कि सीप को देखकर शायद ही कोई सोचे कि वह प्रकृति के लिए कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन उसके नष्ट होने से पानी को साफ रखने की प्राकृतिक क्षमता घट सकती है। साथ ही, अनेक दूसरे जीवों का आवास भी समाप्त हो सकता है।
सीप और दूसरे समुद्री जीव लाखों लोगों के भोजन और आजीविका का आधार हैं। सीपों की चट्टानें तटीय इलाकों को समुद्री लहरों के प्रभाव से बचाने में भी मदद करती हैं। उनके विनाश का अर्थ तटीय समुदायों की प्राकृतिक सुरक्षा को कमजोर करना भी है।
किसी प्रजाति का कम होना बीमारियों के प्रसार को भी प्रभावित कर सकता है। एक अध्ययन में उत्तरी अमेरिका में लाल लोमड़ियों की घटती आबादी और लाइम रोग के प्रसार के बीच संबंध का संकेत मिला है। यह बीमारी किलनी के काटने से फैलती है और मनुष्यों को भी प्रभावित करती है।
इस तरह प्रकृति के किसी एक हिस्से में आया बदलाव दूरगामी परिणाम पैदा कर सकता है। एक प्रजाति का महत्व केवल उसके अपने अस्तित्व तक सीमित नहीं होता; वह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन से जुड़ी होती है।
क्या पृथ्वी छठे सामूहिक विलुप्ति संकट से गुजर रही है?
पृथ्वी के इतिहास में प्रजातियों का विलुप्त होना कोई नई घटना नहीं है। प्राकृतिक कारणों से भी अनेक जीव समाप्त हुए हैं। लेकिन पृथ्वी पर अब तक पांच बड़ी सामूहिक विलुप्ति घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें अपेक्षाकृत कम भूवैज्ञानिक समय में बड़ी संख्या में प्रजातियां खत्म हो गई थीं।
आज वैज्ञानिकों को आशंका है कि पृथ्वी छठे सामूहिक विलुप्ति संकट के दौर से गुजर रही है। इस बार सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्रजातियों के तेजी से गायब होने के पीछे मानवीय गतिविधियों की प्रमुख भूमिका है।
प्रकृति पर बढ़ता दबाव, प्राकृतिक आवासों का विनाश, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन इस संकट को गंभीर बना रहे हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि इन आंकड़ों को केवल भय और निराशा पैदा करने वाले संकेतों के रूप में नहीं देखना चाहिए। इन्हें कार्रवाई की जरूरत समझने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
लुईस मैकरे के अनुसार, वैश्विक स्थिति की दिशा चिंताजनक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन आंकड़ों का उद्देश्य लोगों को निराश करना नहीं, बल्कि बदलाव के लिए प्रेरित करना है।
प्रकृति संरक्षण के प्रयासों की सफलता के उदाहरण बताते हैं कि समय रहते कदम उठाए जाएं, तो हालात सुधारे जा सकते हैं।
समुद्री कछुओं की वापसी बताती है कि सुधार संभव है
हरे समुद्री कछुओं की आबादी में कभी भारी गिरावट आई थी। लेकिन उनके अंडे देने वाले समुद्र तटों की रक्षा, संरक्षण के वैश्विक प्रयासों और मछली पकड़ने के तरीकों में बदलाव के कारण उनकी संख्या में सुधार हुआ है।
मछली पकड़ने के दौरान कछुओं के अनजाने में जाल में फंसने की घटनाओं को कम करना इस सफलता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
समुद्री ऊदबिलावों की वापसी भी ऐसा ही उदाहरण है।
उन्नीसवीं सदी में उत्तरी अमेरिका के प्रशांत तट पर समुद्री ऊदबिलावों का उनके फर के लिए बड़े पैमाने पर शिकार किया गया। उनकी संख्या इतनी घट गई कि वे लगभग विलुप्त होने की स्थिति में पहुंच गए।
समुद्री ऊदबिलाव समुद्री अर्चिन नामक कांटेदार जीवों को खाते हैं। जब ऊदबिलावों की संख्या घट गई, तो अर्चिन के प्राकृतिक शिकारी कम हो गए। उनकी संख्या बढ़ने से उन्होंने समुद्र में फैले केल्प वनों को भारी नुकसान पहुंचाया।
केल्प बड़ी समुद्री शैवाल प्रजातियां हैं, जो समुद्र के भीतर जंगलों जैसी संरचनाएं बनाती हैं। ये अनेक जीवों को आवास देती हैं, तटों को समुद्री लहरों से बचाने में मदद करती हैं और कार्बन को अवशोषित करती हैं। इस तरह वे जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
व्यावसायिक शिकार पर रोक लगने के बाद समुद्री ऊदबिलावों की आबादी में सुधार हुआ। इससे केल्प वनों को भी उबरने का अवसर मिला।
यह उदाहरण बताता है कि किसी एक प्रजाति की रक्षा का लाभ केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। उसके लौटने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र सुधर सकता है।
लुईस मैकरे के अनुसार, इस बदलाव का असर स्पष्ट रूप से देखा और मापा जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रकृति के विनाश की प्रक्रिया को पलटा जा सकता है।
जैव विविधता और जलवायु संकट का साझा समाधान
जैव विविधता का विनाश और जलवायु परिवर्तन अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और एक-दूसरे के नुकसान को बढ़ाती हैं।
जंगलों, आर्द्रभूमियों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों के नष्ट होने से कार्बन को प्राकृतिक रूप से अवशोषित करने की क्षमता घटती है। दूसरी ओर, बढ़ता तापमान, चरम मौसमी घटनाएं और बदलती जलवायु अनेक प्रजातियों के अस्तित्व को खतरे में डालती हैं।
इसलिए इन दोनों संकटों से निपटने के प्रयासों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। प्राकृतिक आवासों की रक्षा, क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, प्रदूषण में कमी और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने जैसे कदम दोनों समस्याओं के समाधान में योगदान दे सकते हैं।
रेबेका शॉ कहती हैं कि छोटे स्तर पर प्रकृति को फिर से बहाल करने के तरीके सीखे जा रहे हैं। अब असली चुनौती इन प्रयासों को बड़े पैमाने पर लागू करने की है, ताकि उनका असर वैश्विक स्तर पर भी दिखाई दे।
प्रकृति को बचाना अपने भविष्य को बचाना है
पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़े असंख्य जीवों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर है। मधुमक्खियों का परागण, आर्द्रभूमियों का जल शुद्धिकरण, जंगलों का कार्बन अवशोषण और समुद्री जीवों द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखना—ये सभी प्रक्रियाएं मानव जीवन को संभव बनाती हैं।
इनमें से किसी एक कड़ी के कमजोर होने का असर दूसरी कड़ियों पर भी पड़ सकता है। इसलिए जैव विविधता का संकट केवल वन्यजीवों या पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंता का विषय नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और मानव सभ्यता के भविष्य का प्रश्न है।
पृथ्वी के इतिहास में पहले भी जीवन ने बड़े संकटों का सामना किया है। आज भी प्रकृति को बचाने और उसके क्षतिग्रस्त हिस्सों को बहाल करने के अवसर मौजूद हैं। समुद्री कछुओं और ऊदबिलावों की वापसी इसके प्रमाण हैं।
लेकिन इसके लिए स्थानीय प्रयासों को वैश्विक स्तर तक ले जाना होगा। सरकारों को अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करनी होंगी, संरक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने होंगे और विकास की ऐसी दिशा अपनानी होगी, जो प्रकृति के विनाश पर आधारित न हो।
छठे सामूहिक विलुप्ति संकट की आशंका मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि प्रकृति से हमारा रिश्ता केवल संसाधन लेने का नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाकर जीने का है। प्रकृति बचेगी, तभी मानव जीवन का आधार सुरक्षित रहेगा।