पंकज चतुर्वेदी
भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। दूध ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण, महिला रोजगार और छोटे किसानों की आय का महत्त्वपूर्ण आधार है। भारत में अधिकांश दुग्ध उत्पादन छोटे और सीमांत किसानों से आता है, जिनके पास प्रायः दो से पाँच पशु होते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन का असर केवल पशुओं के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता; वह परिवारों की आय, बच्चों के पोषण, चारे की उपलब्धता और दूध की कीमतों को भी प्रभावित करता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में औसत तापमान बढ़ रहा है, हीटवेव अधिक तीव्र हो रही हैं, मानसून अनिश्चित हो रहा है और सूखा तथा बाढ़ जैसी चरम घटनाएँ बढ़ रही हैं। इन परिवर्तनों का सीधा प्रभाव गाय, भैंस, बकरी और अन्य दुधारू पशुओं की उत्पादकता पर पड़ता है। विशेष रूप से अधिक दूध देने वाली विदेशी नस्लों और संकर गायों में गर्मी सहने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।
भारत के दुग्ध क्षेत्र का महत्त्व
मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के *Basic Animal Husbandry Statistics 2024* के अनुसार, भारत में वर्ष 2023–24 के दौरान दूध उत्पादन लगभग **239.3 मिलियन टन** रहा। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग **3.8 प्रतिशत** अधिक था। देश के कुल दूध उत्पादन में भैंसों का योगदान बहुत बड़ा है, जबकि गाय का दूध भी तेज़ी से महत्त्वपूर्ण हो रहा है।
डेयरी क्षेत्र की खासियत यह है कि इसमें छोटे किसान, भूमिहीन परिवार और महिलाएँ बड़ी संख्या में शामिल हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अनुसार, भारत के दूध उत्पादन का बड़ा हिस्सा छोटे उत्पादकों से आता है। ऐसे परिवारों के लिए दूध की रोजाना बिक्री नकद आय का अपेक्षाकृत स्थिर स्रोत है। लेकिन जब पशु गर्मी, बीमारी या चारे की कमी से कम दूध देते हैं, तो यह आय सीधे घट जाती है।
गर्मी का तनाव: दूध घटने का प्रमुख कारण
दुग्ध उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव **हीट स्ट्रेस**, अर्थात गर्मी के तनाव, के रूप में दिखाई देता है। जब तापमान और आर्द्रता दोनों बढ़ते हैं, तब पशु अपने शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं कर पाते। इसे मापने के लिए वैज्ञानिक *Temperature Humidity Index* या **THI** का उपयोग करते हैं।
सामान्यतः जब THI 68–72 से ऊपर जाता है, तो अधिक उत्पादन देने वाली दुधारू गायों में गर्मी का तनाव शुरू हो सकता है। भारतीय परिस्थितियों में तापमान 35 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचने और रात में भी पर्याप्त ठंडक न मिलने पर समस्या और बढ़ जाती है। पशु तेज साँस लेने लगते हैं, अधिक पानी पीते हैं, कम चारा खाते हैं और धूप से बचने की कोशिश करते हैं।
कम चारा खाने का अर्थ है कि पशु के शरीर को दूध बनाने के लिए कम ऊर्जा मिलती है। गर्मी से बचने में भी पशु अतिरिक्त ऊर्जा खर्च करता है। परिणामस्वरूप दूध की मात्रा और कभी-कभी उसकी गुणवत्ता—जैसे वसा तथा ठोस पदार्थों का प्रतिशत—भी प्रभावित हो सकता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पशु पोषण एवं शरीर क्रिया विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु—**ICAR-NIANP**—के अध्ययनों ने दिखाया है कि गर्मी का तनाव दुधारू पशुओं की उत्पादकता, प्रजनन क्षमता और रोग-प्रतिरोधकता को कम करता है। शोधों में यह भी पाया गया है कि संकर और विदेशी नस्लों की गायें, जैसे होल्स्टीन फ्रिज़ियन आधारित पशु, ऊँचे तापमान से देशी नस्लों की तुलना में अधिक प्रभावित हो सकती हैं।
भैंसों पर विशेष प्रभाव
भारत में भैंसों का दुग्ध उत्पादन में बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन भैंस गर्मी के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होती है। इसका कारण यह है कि भैंसों की त्वचा गहरी होती है और उनमें पसीने की ग्रंथियाँ गायों की तुलना में कम प्रभावी होती हैं। इसलिए वे शरीर की गर्मी को आसानी से बाहर नहीं निकाल पातीं।
गर्मी के दिनों में भैंसों को तालाब, पानी की टंकी या कीचड़ में बैठना पसंद होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह पारंपरिक व्यवहार वास्तव में ताप-नियंत्रण का प्राकृतिक तरीका है। लेकिन जब पानी की कमी होती है, तालाब सूख जाते हैं या पशुओं को छाया नहीं मिलती, तब भैंसों में दूध उत्पादन कम होने का जोखिम बढ़ जाता है।
उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में भैंस पालन व्यापक है। मई-जून की तीव्र गर्मी या लंबे सूखे के दौरान पशुओं को ठंडा रखने की व्यवस्था न होने पर किसानों को प्रतिदिन के दूध उत्पादन में कमी दिखाई दे सकती है। छोटे डेयरी किसानों के लिए यह कमी आर्थिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।
अनिश्चित मानसून और चारे का संकट
जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। अनियमित मानसून, कम वर्षा, बाढ़ और सूखे से पशु चारे की उपलब्धता तथा कीमत प्रभावित होती है। हरा चारा, भूसा, मक्का, ज्वार, बाजरा और चारा फसलें वर्षा तथा तापमान पर निर्भर हैं। यदि वर्षा देर से हो, बहुत कम हो या कुछ दिनों में अत्यधिक हो जाए, तो चारा उत्पादन घट सकता है।
सूखे के समय किसान फसल अवशेषों पर अधिक निर्भर होते हैं, जिनकी पोषण गुणवत्ता सीमित हो सकती है। दूसरी ओर, बाढ़ के दौरान चारे की फसलें नष्ट हो सकती हैं, चारा भंडार भीगकर खराब हो सकता है और पशुओं तक चारा पहुँचाना कठिन हो जाता है। असम, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों में यह चुनौती अक्सर देखने को मिलती है।
चारे की कमी होने पर पशुओं को पर्याप्त प्रोटीन, ऊर्जा और खनिज नहीं मिलते। इसका प्रभाव दूध की मात्रा, पशुओं के वजन, बछड़ों की वृद्धि और प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। चारा महँगा होने पर किसान पशुओं को कम मात्रा में आहार देने लगते हैं, जिससे उत्पादन और घट सकता है।
जल संकट और पशु स्वास्थ्य
दूध देने वाले पशुओं को पर्याप्त स्वच्छ पानी चाहिए। गर्मी के दौरान पानी की जरूरत और बढ़ जाती है। एक वयस्क दुधारू पशु को मौसम, शरीर के आकार और दूध उत्पादन के आधार पर प्रतिदिन कई दर्जन लीटर पानी की आवश्यकता हो सकती है। जल संकट वाले क्षेत्रों में पशुओं को पर्याप्त पानी न मिलना दूध उत्पादन घटने का बड़ा कारण बनता है।
जलवायु परिवर्तन से रोगों का जोखिम भी बदल सकता है। गर्म और नम मौसम में कुछ कीट, मक्खियाँ, मच्छर तथा परजीवी अधिक फैल सकते हैं। लंपी स्किन डिजीज जैसे रोगों का प्रसार कई कारकों से जुड़ा है, जिनमें पशुओं की आवाजाही, टीकाकरण की स्थिति और कीट वाहक शामिल हैं। जलवायु परिस्थितियाँ रोग फैलाने वाले कीटों के लिए अनुकूल वातावरण बना सकती हैं।
पशुओं में हीट स्ट्रेस होने पर रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो सकती है। इससे मास्टाइटिस, खुरपका-मुँहपका रोग के प्रभाव, परजीवी संक्रमण और प्रजनन संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। बीमारी होने पर दूध उत्पादन तो घटता ही है, उपचार का खर्च भी बढ़ता है।
प्रजनन क्षमता पर असर
गर्मी का तनाव पशुओं के प्रजनन को प्रभावित करता है। अधिक तापमान में गाय और भैंस में हीट के लक्षण स्पष्ट नहीं दिखते, गर्भधारण की संभावना कम हो सकती है और गर्भपात का जोखिम बढ़ सकता है। यदि पशु समय पर गर्भधारण नहीं करता, तो उसका अगला ब्यांत देर से होता है। इसका मतलब है कि दूध देने का चक्र बिगड़ता है और किसान को लंबे समय तक कम आय मिलती है।
यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल एक मौसम की दूध-हानि नहीं है। प्रजनन में देरी, कमजोर बछड़े, कम चारा, बीमारी और उपचार खर्च मिलकर डेयरी व्यवसाय की दीर्घकालिक लाभप्रदता को प्रभावित कर सकते हैं।
उदाहरण: 2024 की हीटवेव और डेयरी किसान
वर्ष 2024 में भारत के कई हिस्सों में लंबी और तीव्र हीटवेव देखी गई। राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में तापमान कई दिनों तक सामान्य से अधिक रहा। अनेक स्थानीय रिपोर्टों में डेयरी किसानों ने बताया कि पशुओं का चारा सेवन कम हुआ, वे सुस्त रहे और दूध की मात्रा में गिरावट आई।
हालाँकि हर क्षेत्र में दूध-हानि का एक जैसा आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह अनुभव वैज्ञानिक निष्कर्षों से मेल खाता है: अधिक तापमान और आर्द्रता से पशु की ऊर्जा दूध उत्पादन के बजाय शरीर को ठंडा रखने में खर्च होने लगती है। जिन किसानों के पास पंखे, छायादार शेड, कूलर, फॉगिंग या पानी में नहलाने की सुविधा थी, उनके पशुओं पर गर्मी का प्रभाव अपेक्षाकृत कम देखा गया।
समाधान और अनुकूलन के उपाय
जलवायु परिवर्तन के बीच डेयरी उत्पादन सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक उपाय जरूरी हैं। सबसे पहले पशुओं के लिए पेड़ों या टीन-शेड के बजाय बेहतर हवादार, ऊँचे और छायादार आवास बनाए जाने चाहिए। छत पर इन्सुलेशन, पंखे, फॉगर्स और स्प्रिंकलर गर्म क्षेत्रों में उपयोगी हो सकते हैं।
भैंसों के लिए स्वच्छ पानी में स्नान या वॉलोइंग की व्यवस्था, तथा सभी दुधारू पशुओं के लिए पर्याप्त साफ पेयजल आवश्यक है। गर्मी के समय चारा सुबह और शाम जैसे ठंडे घंटों में देना, हरे चारे तथा संतुलित आहार का उपयोग करना और खनिज मिश्रण देना लाभदायक हो सकता है।
लंबी अवधि में गर्मी-सहिष्णु देशी नस्लों के संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन पर ध्यान देना होगा। साहीवाल, गिर, थारपारकर और रेड सिंधी जैसी देशी नस्लें भारतीय जलवायु के अनुकूल मानी जाती हैं। उनका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु में पशुधन की सहनशीलता बनाए रखना भी होना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत में जलवायु परिवर्तन दुग्ध उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है। बढ़ता तापमान, हीटवेव, चारे और पानी की कमी, बाढ़, सूखा तथा रोगों का बदलता जोखिम पशुओं और किसानों दोनों को प्रभावित कर रहा है। दूध उत्पादन में कमी का सबसे तात्कालिक कारण गर्मी का तनाव है, जबकि चारा संकट और प्रजनन समस्याएँ दीर्घकालिक नुकसान बढ़ाती हैं।
भारत के डेयरी क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए पशु-आवास सुधार, जल प्रबंधन, चारा सुरक्षा, पशु स्वास्थ्य सेवाएँ, जलवायु-सहिष्णु नस्लें और समय पर मौसम चेतावनी आवश्यक हैं। यदि ये उपाय छोटे किसानों तक पहुँचते हैं, तो डेयरी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के बावजूद ग्रामीण आय और पोषण का मजबूत आधार बना रह सकता है।
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